अगर कोई एक सवाल है जो हर विवेकशील व्यक्ति के सामने खड़ा है, तो वह है ‘आखिर यह हुआ कैसे…या फिर इन लोगों के साथ समस्या क्या है?’ यहां ‘इन लोगों’ से आशय दो व्यक्तियों से है एक अमेरिका में और दूसरा भारत में। एक किसी देश का राष्ट्रपति है और दूसरा एक राजनीतिक दल का वास्तविक नेतृत्वकर्ता। ये दो नाम हैं, डोनाल्ड ट्रंप और राहुल गांधी। आइए शुरुआत करते हैं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से। उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर प्रशंसा करते हुए संबंधों में नरमी का संकेत दिया। यह वही संबंध थे, जिनमें पिछले वर्ष उस समय खटास आ गई थी जब ट्रंप ने भारत पर भारी शुल्क (टैरिफ) लगा दिए थे।
उसी वर्ष ट्रंप की भारत यात्रा प्रस्तावित थी, लेकिन बढ़ते तनाव के कारण यह यात्रा रद्द हो गई। टैरिफ के अलावा कई अन्य मुद्दों ने भी तनाव बढ़ाया। इनमें ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ युद्धविराम भी शामिल था, जिसका श्रेय ट्रंप ने दोनों देशों के बीच संघर्ष रोकने के लिए खुद लिया था। भारत के इस स्पष्ट बयान कि युद्धविराम में किसी तीसरे पक्ष की कोई मध्यस्थता नहीं थी, से ट्रंप नाराज हुए और इसके बाद भारत-अमेरिका संबंधों में दूरी और बढ़ गई। इसके अलावा ब्राजील और चीन के साथ भारत की बढ़ती निकटता ने भी उस गर्मजोशी को प्रभावित किया, जो कभी ट्रंप और मोदी के रिश्तों में दिखाई देती थी।
ईरान युद्ध, भारतीय चालक दल वाले जहाजों को निशाना बनाए जाने और ओमान तट के पास अमेरिकी विमान के हमले में तीन भारतीयों की मौत जैसी घटनाओं ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया। हालांकि हाल ही में फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के इतर जब ट्रंप और मोदी की मुलाकात हुई, तो ऐसा लगा कि दोनों देशों के रिश्तों में नाटकीय बदलाव आ गया है। गौरतलब है कि ट्रंप इससे पहले वर्ष 2020 में भारत आ चुके हैं। उस समय उनका भव्य स्वागत हुआ था और देशभर में ‘नमस्ते ट्रंप के बैनर लगाए गए थे। भारत यात्रा के संकेतों के अलावा जो बात सबसे अधिक चर्चा में रही, वह थी प्रधानमंत्री मोदी के लिए ट्रंप की प्रशंसा। तनाव को कमतर बताते हुए ट्रंप ने कहा कि जब तक वह राष्ट्रपति हैं-भारत को व्हाइट हाउस में एक महान मित्र मिलेगा।
उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को महान नेता ‘बहुत मजबूत व्यक्ति, आकर्षक व्यक्तित्व वाला और बेहद दृढ़’ बताया तथा यह भी कहा कि अगर कोई भारत पर हमला करता है तो वह भारत के साथ खड़े होंगे। अगर यह भारत के लिए अच्छी खबर है और ट्रंप ने मोदी तथा भारत के प्रति अपनी एकजुटता पूरी ताकत से दिखाई, तो वहीं अमेरिका के सहयोगी देश इटली के मामले में उनका रवैया पूरी तरह असहज करने वाला रहा। यहीं से सवाल उठता है, आखिर उनके व्यवहार में समस्या क्या है? एक बार फिर जी-7 सम्मेलन की ओर लौटते हैं, जहां ट्रंप ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की।
उन्होंने कहा-उन्होंने मुझसे तस्वीर खिंचवाने की गुजारिश की। वह मेरे साथ तस्वीर चाहती थीं। मैं तस्वीर नहीं खिंचवाता लेकिन मुझे उनके लिए बुरा लगा। रिपोर्टों के अनुसार जी-7 बैठक के दौरान मेलोनी ने ट्रंप से कहा था कि उन्हें शिकायत करना बंद करना चाहिए और यह कहना बंद करना चाहिए कि पश्चिमी सहयोगियों ने उन्हें छोड़ दिया है। ट्रंप की -तस्वीर के लिए गिड़गिड़ाने’ वाली टिप्पणी क्या मेलोनी द्वारा उन्हें आईना दिखाने की प्रतिक्रिया थी, यह कहना मुश्किल है लेकिन ट्रंप की यह टिप्पणी किसी भी तरह उचित नहीं ठहराई जा सकती। बल्कि इसकी आलोचना होनी चाहिए।
इटली ने इसका जवाब दिया और मेलोनी ने खुद ट्रंप पर पलटवार किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो में कहा- डोनाल्ड ट्रंप के बयान पूरी तरह मनगढ़ंत हैं। मैं सचमुच हैरान हूं। मुझे समझ नहीं आता कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपने सहयोगियों के साथ इस तरह व्यवहार क्यों करते हैं। और यह पहली बार नहीं है। उन्होंने आगे कहा-एक बात उन्हें याद रखनी चाहिए न तो मैंने और न ही इटली ने कभी किसी से गिड़गिड़ाकर कुछ मांगा है। मेलोनी सरकार ने इससे भी आगे बढ़कर कदम उठाया। इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने ट्रंप की टिप्पणी से ऊपजे सरकारी आक्रोश को दर्शाते हुए अपनी प्रस्तावित अमेरिका यात्रा रद्द कर दी।
दूसरे शब्दों में अगर मान भी लिया जाए कि मेलोनी ट्रंप के साथ तस्वीर खिंचवाना चाहती थीं, तो भी वह किसी सरकार प्रमुख के लिए ऐसी अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं? अगर वह खुद को सर्वशक्तिमान समझना पसंद करते हैं, तो क्या उन्हें यह अधिकार दूसरों की कीमत पर मिलना चाहिए? क्या कोई राजनीतिक बढ़त हासिल करना या पलटवार करनाजैसा कि ट्रंप अक्सर करते हैं क्या मर्यादा की सीमा से नीचे गिरने जैसा नहीं है? क्या दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति को अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर नहीं करना चाहिए? क्या ट्रंप जैसे नेता के लिए विश्व के अन्य नेताओं पर व्यक्तिगत टिप्पणियां करना और उनका अपमान करना उचित है? इसका उत्तर केवल एक शब्द में है, नहीं। और वह भी बड़े अक्षरों में।
भारत में भी एक अलग तरह का नाटक सामने आ रहा है ऐसा नाटक, जिसमें श्रद्धालुओं की भावनाओं के अनुसार देखें तो देवी-देवताओं का भी अपमान हो रहा है। कांग्रेस के प्रमुख नेता राहुल गांधी का 56वां जन्मदिन था। स्वाभाविक रूप से जश्न की तैयारियां होनी थीं। लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने इस अवसर को एक अलग दिशा दे दी और एक स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बताने वाले नेता को धार्मिक पहचान देने की कोशिश की। युवा कांग्रेस के नेताओं ने गांधी की तस्वीर लगाकर उसका पूजन किया और उस चित्र पर दूध चढ़ाया। इससे भी आगे बढ़ते हुए राहुल गांधी को भगवान परशुराम के रूप में दर्शाया गया एक हाथ में फरसा और दूसरे हाथ में संविधान की प्रति। यानी धर्म और राजनीति को एक साथ जोड़ दिया गया।
रिकॉर्ड के लिए परशुराम भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं और उन्हें ऋषि, योद्धा के रूप में वर्णित किया गया है। उन्हें अपना फरसा भगवान शिव से प्राप्त हुआ था। वे युद्धकला और अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हैं। महाभारत में उन्होंने भीष्म, द्रोण और कर्ण सहित कई योद्धाओं को शिक्षा दी थी। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो 2024 के आम चुनावों में राहुल गांधी ने भारतीय संविधान को प्रमुख मुद्दा बनाया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि यदि भाजपा सत्ता में आती है तो वह संविधान को बदलने और दोबारा लिखने का प्रयास करेगी। गांधी जिस छोटी प्रति वाले संविधान को हर जगह अपने साथ रखते थे, उसने राजनीतिक संदेश के रूप में व्यापक प्रभाव पैदा किया।
भाजपा के ‘400 पार’ के दावे के बावजूद वह लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर सकी। लेकिन इन सबके बावजूद अब राजनीतिक तलवारें खिंच गई हैं। राहुल गांधी को भगवान के रूप में प्रस्तुत किए जाने को लेकर भारी विवाद खड़ा हो गया है। भाजपा नेता शहजाद पूनावाला ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने ‘हिन्दू आस्था का अपमान’ किया है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा -हिन्दुओं का अपमान करो और वोट बैंक से तालियां हासिल करो, यही उनकी राजनीति रही है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस से करोड़ों हिंदुओं की भावनाएं आहत करने के लिए माफी मांगने की मांग की। भाजपा के अन्य नेताओं ने भी आरोप लगाया कि कांग्रेस ने भगवान परशुराम का अपमान किया है। इन सब से अलग हटकर देखें तो कांग्रेस जैसे अनुभवी राजनीतिक दल द्वारा किया गया यह कृत्य पूरी तरह अनुचित है।
आज स्थिति यह है कि भारत में हिंदू और मुसलमान भले ही साथ रहते हैं, लेकिन कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों समुदाय एक-दूसरे के खिलाफ खड़े किए जा रहे हैं। यह वही मुद्दा है, जिस पर राहुल गांधी अक्सर बोलते रहे हैं। याद कीजिए उनका ‘मोहब्बत की दुकान’ वाला नाराए जो काफी लोकप्रिय हुआ था। ऐसे में सवाल उठता है कि जब उनकी ही पार्टी उन्हें भगवान के रूप में प्रस्तुत कर रही है और उनकी तस्वीर पर धार्मिक अनुष्ठान किए जा रहे हैं, तो क्या राहुल गांधी को ऐसे कृत्यों की निंदा नहीं करनी चाहिए? या फिर उन्हें अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को भाजपा की धर्म आधारित राजनीति के रास्ते पर चलने की अनुमति देनी चाहिए? समय की मांग है कि राजनीति प्रतीकों से ऊपर उठे और देश के सामने एक रचनात्मक एजेंडा रखे। नेताओं को भगवान के रूप में प्रस्तुत करने में समय और ऊर्जा नष्ट करने के बजाय देश के वास्तविक मुद्दों और भविष्य की दिशा पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।


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