रिसर्चर बताते हैं कि दिल्ली में कम से कम 18 साम्राज्य रहे हैं जिनके अवशेष दिल्ली में बिखरे पड़े हैं। शायद यही कारण है कि आज तक इसकी कोई एक पहचान नहीं है जैसे कोलकाता या मुम्बई की है। इस महानगर ने वह क्रूरता देखी है जो दूसरे शहरों ने नहीं देखी। बार- बार यह गिराई गई और दोबारा से खड़ी हुई। दिल्ली ने कभी किसी की परवाह नहीं की। न बादशाह की, न वायसराय की, न राजनेता की। शायर ने सही कहा है, पगड़ी सम्भालियेगा, यह कोई और बस्ती नहीं दिल्ली है। ग़रीबों और आम आदमी के हित को कुछ नहीं समझा। भयानक दंगे यहां होते रहते हैं।
प्रवासियों को जरूर जगह दी गई, पर उनके कल्याण की चिन्ता नहीं की गई, क्योंकि यह बड़े लोगों का शहर है इसलिए दिल्ली में वह अहंकार है जो बाक़ी शहरों में नहीं देखा जाता। जिसे लुटियंस की दिल्ली कहा जाता है, से बाहर की दिल्ली का कोई महत्व नहीं है। दिल्ली को 200-300 लोग चलाते हैं जो देश को भी चलाते हैं। (राहुल गांधी के अनुसार केवल छह लोग देश को चला रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख राजनेता है साथ है बड़े अफ़सर और बड़े उद्योगपति। इनका अदृश्य क्लब देश को बनाता और बिगाड़ता है।
पॉश कॉलोनियों से घिरी दिल्ली की बस्ती सत्य निकेतन में लड़कों के पेयिंग गेस्ट होस्टल की इमारत गिरने से 7 लोग जिनमें 5 छात्र थे, दबकर मर गए। पवन, अक्षत, अर्पित, अभिषेक और युवराज। जिनकी मौत हो गई बड़े परिवारों से नहीं थे, पर अपने-अपने परिवार के चिराग़ थे। बड़े सपने लेकर उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया था, पर उड़ान भरने से पहले ही जिसे अब ‘पेयिंग गेस्ट माफिया’ कहा जाता है, के लालच और क्रूर उदासीनता का शिकार हो गए।
यह बच्चे जो छोटे शहरों और क़स्बों से दिल्ली आए थे, के सपने महानगर के मलबे में दब गए। जिस इमारत में वह रह रहे थे उसे केवल भूतल और पहली मंज़िल की इजाज़त थी, पर 3 और मंज़िलें बना दी गईं। बेसमेंट में बिना परमिशन के खुदाई हो रही थी कि इमारत ढह गई। दिल्ली और लगभग हर शहर में अवैध निर्माण आम है। इसमें केवल बिल्डर ही दोषी नहीं, वह सरकारी अधिकारी भी दोषी हैं जो रिश्वत लेकर आंखें मूंद लेते हैं अगर सत्य निकेतन की इस इमारत में तीन मंजिलें अवैध थीं तो सरकारी अधिकारी क्या करते रहे जिनका काम निगरानी रखना है? रातों-रात तो यह खड़ी नहीं की गईं? क्या छोटे -मोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर ही मामला रफा-दफा कर दिया जाएगा?
जो बड़े मगरमच्छ हैं, जिन तक पैसा पहुंचाया जाता है उन पर कोई कार्यवाही नहीं होगी? स्थानीय पार्षद और विधायक और सांसद किस मर्ज़ की दवा हैं? उनकी कोई जवाबदेही नहीं बनती? लुटियंस की दिल्ली अत्यंत खूबसूरत जगह है। बड़े-बड़े आम और जामुन के पेड़ हैं। चौड़ी साफ़-सुथरी सड़कें हैं। विदेशी मेहमानों को भी यहां तक ही दिखाया जाता है, क्योंकि इसके बाहर और गेटेड कालोनियों के बाहर एक और दिल्ली भी है जो बदसूरत है और जहां सत्य निकेतन जैसी भीड़ भरी असुरक्षित इमारतें हैं।
सिर्फ़ यह इमारत ही नहीं गिरी, जवाबदेही भी मलबे में दब गई है। सरकारें बदलती रहती ही हैं, पर हालत नहीं बदलते अगर आप वीआईपी नहीं हो या पैसा नहीं है तो आप कुछ नहीं हो, जैसे यह छात्र थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के पास पर्याप्त कमरे नहीं हैं इसलिए छात्रों को असुरक्षित इमारतों में रहना पड़ता है। विश्वविद्यालय के उपकुलपति ने स्वीकार किया है कि वह हर छात्र को कमरा नहीं दे सकते। वह कम से कम ईमानदार तो हैं।
दुनिया में कई कालेज और विश्वविद्यालय हैं जहां होस्टल नहीं हैं और छात्रों को बाहर कमरा लेकर रहना पड़ता है, पर उन्हें असुरक्षित इमारतों में नहीं धकेला जाता। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का कहना है कि उनकी सरकार छात्रों के लिए 10,000 कमरे बनाएगी। कहते हैं कि खुशी से मर न जाते जो एतबार होता! सरकार का काम कमरे बनाना नहीं है। न ही यह होगा, अगर होगा तो भ्रष्टाचार और निम्न निर्माण की शिकायतें आएंगी जैसे राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान आई थी। ज़रूरत यह देखने की है कि जो मौजूदा निर्माण है वह वैध हो और स्तर का हो ताकि और हादसे न हों। क्या रेखा जी की सरकार यह ज़रूरी काम करेगी?
छात्र शिकायत करते हैं कि वह डिब्बे जैसे कमरों में रहने को मजबूर हैं। कोई सुविधा नहीं टेबल और सामान रखने तक की जगह मुश्किल से मिलती है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक छात्र ने मीडिया को अपना 10×10 फुट कमरे को दिखाते हुए बताया कि किराया 30,000 रुपए मासिक है। उसका कहना था कि मालिक उन्हें इंसान नहीं समझते। दिल्ली की एमसीडी मुम्बई की बीएमसी की ही तरह भ्रष्टाचार का अड्डा है। आज से नहीं दशकों से ऐसा है।
अतीत में ऐसे हादसों के बाद जो जांच बैठाई गई सब ने नियामक असफलता, लापरवाही और कई सरकारी विभागों द्वारा चूक को इसके लिए दोषी ठहराया है, पर दंडात्मक कार्रवाई केवल जूनियर अधिकारियों और इंजीनियरों पर ही की गई अगर पहले हुए हादसों से उचित सबक लिया जाता तो इन बच्चों की जान न जाती। मई में साकेत मैट्रो स्टेशन के पास बिल्डिंग गिरने से 6 लोग मारे गए। इसी महीने विवेक विहार की चार मंजिली इमारत में आग लगने से 9 लोग मारे गए। उससे भी भयानक जून में मालविया नगर की एक इमारत का हादसा है जहां झुलस कर 23 लोग मारे गए। इनमें अधिकतर विदेशी थे जो पास के अस्पतालों में इलाज के लिए आए थे।
मालिक को केवल 6 कमरों की अनुमति थी, पर 26 बना लिए। बाहर निकलने का एक ही दरवाज़ा था जिस कारण लोग फंस गए। बीबीसी ने टिप्पणी की है, “दिल्ली में लगी कई भयानक आग ने काग़ज़ पर लिखे सुरक्षा के नियमों और ज़मीन पर उनके पालन, के बीच जो फ़ासला है उसे साफ़ कर दिया है”। ऐसे हादसे होते रहेंगे जबतक हम यह नहीं समझते कि देश में नगर-शासन ही ढह रहा है। देश में हर प्रकार का नियम है, हर प्रकार का क़ानून है। समस्या पालन करने की है और समस्या पालन करवाने वालों से है। यह मामले सुर्खियों में हैं क्योंकि राजधानी में हुए हैं। राजधानी के बाहर हालत और ख़राब है। मुम्बई से लेकर शिमला तक हर मानसून में इमारतें गिरती हैं। लोग जर्जर और ख़तरनाक इमारतों में रहने को मजबूर हैं।
आईटी कैपिटल बंगलूरू हर बार पानी में डूब जाती है। जिसे कभी गार्डन सिटी कहा जाता था अब भीड़ भरा बदसूरत शहर बन चुका है। देश में अक्सर नए बने पुल गिरते रहते हैं, नए हाईवे में गड्ढे पड़ते रहते हैं और अस्पतालों से आग लगने के समाचार मिलते रहते हैं यहां तो जवाबदेही ही ध्वस्त हो चुकी है क्योंकि उच्चस्तरीय मिलीभगत है।
दिल्ली का एक और क्रूर रूप है। यह लड़ने-झगड़ने को तैयार रहती है। दिल्ली के किलोकरी इलाक़े में 54 वर्षीय मणिपुरी संगीतकार चोगथाम विक्रम सिंह की इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि उन्होंने अपने फ्लैट के बाहर शोर मचा रहे लड़कों को शराब पीने और उधम मचाने से रोका था।
वह जब उन्हें रोकने गए तो 8 लोग उनके पीछे आ गए और तीसरी मंज़िल के कॉरिडोर में पीट-पीट कर मार डाला। यह देश इतना हिंसक क्यों हो रहा है? रोज़ ख़बरें मिलती हैं कि मामूली घटना पर भी लोग मारने-पीटने के लिए तैयार रहते हैं। चोगथाम विक्रम सिंह 25-30 वर्षों से दिल्ली में रह रहे थे। उतने ही दिल्ली वाले थे जितना कोई और है पहले भी कई बार उत्तर-पूर्व के लोगों पर हमले हो चुके हैं। इन्हें ‘चिनकी’ कह कर चिढ़ाया जाता है जबकि वह अत्यंत देशभक्त हैं, प्रतिभाशाली है और सर्विस उद्योग के प्रति भारी योगदान है। एक बार तो दिल्ली से उतर-पूर्व के लोगों का सामूहिक पलायन होने वाला था।
वह पूर्व को जाती ट्रेन पर चढ़ गए थे कि स्थिति को सम्भाल लिया गया। वह कहते हैं कि हम भी बराबर के भारतीय हैं पर इस देश से बर्दाश्त ख़त्म होती जा रही है। हम दूसरों के बारे शिकायत करते हैं, पर हम भी किसी से कम नस्लवादी नहीं हैं। खानपान, रहन-सहन, जाति-धर्म को लेकर तनाव बढ़ रहा है। विशेष तौर पर अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी और उत्तर-पूर्व के लोगों के प्रति नफ़रत जो कई बार हिंसा का रूप ले लेती है, बढ़ती जा रही है।
हमारे देश में, हमारी राजधानी में इंसानी ज़िन्दगी इतनी सस्ती क्यों है? विश्व गुरु बनने का सपना छोड़कर अंदर झांकने की ज़रूरत है। दिल्ली ही इतनी बेदिल क्यों है? हम कैसा लड़ाका समाज बनते जा रहे हैं? इस तरह तो 2047 तक विकसित भारत का सपना, सपना ही रह जाएगा। वह हिंसा, नफ़रत, अविश्वास और विद्वेष के मलबे में दब जाएगा।


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