‘ब्रिक्स’ में महिला नेतृत्व और भारत का नज़रिया

Summary :

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” यह शाश्वत भारतीय ज्ञान उस सच को दर्शाता है जिसे दुनियाभर में स्वीकार किया गया है : महिला सशक्तिकरण केवल एक सामाजिक उद्देश्य नहीं है, बल्कि संवहनीय विकास, आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रगति की आधारशिला है। सदियों से भारतीय सभ्यता ने महिलाओं को ज्ञान की रचयिता, नेतृत्वकर्ता और परिवर्तन की शक्ति के रूप में सराहा है। वेद विदुषी गार्गी और मैत्रेयी से लेकर अहिल्याबाई होल्कर, रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले और सरोजिनी नायडू तक महिलाओं की अनेक पीढ़ियों ने भारत की बौद्धिक, सामाजिक और राजनीतिक यात्रा को आकार दिया है। आज जब भारत 2026 में…

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”
यह शाश्वत भारतीय ज्ञान उस सच को दर्शाता है जिसे दुनियाभर में स्वीकार किया गया है : महिला सशक्तिकरण केवल एक सामाजिक उद्देश्य नहीं है, बल्कि संवहनीय विकास, आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रगति की आधारशिला है। सदियों से भारतीय सभ्यता ने महिलाओं को ज्ञान की रचयिता, नेतृत्वकर्ता और परिवर्तन की शक्ति के रूप में सराहा है। वेद विदुषी गार्गी और मैत्रेयी से लेकर अहिल्याबाई होल्कर, रानी लक्ष्मीबाई, सावित्रीबाई फुले और सरोजिनी नायडू तक महिलाओं की अनेक पीढ़ियों ने भारत की बौद्धिक, सामाजिक और राजनीतिक यात्रा को आकार दिया है।

आज जब भारत 2026 में ‘ब्रिक्स’ का नेतृत्व करने के साथ ‘विकसित भारत 2047’ का सपना पूरा करने की दिशा में बढ़ रहा है, वैसे में सभ्यता की इस परंपरा को महिलाओं के नेतृत्व में विकास में आधुनिक अभिव्यक्ति मिल रही है। जैसा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने जोर देकर कहा है, “महिलाओं का विकास समाज, राष्ट्र और मानवता के विकास की ओर ले जाता है। महिला-नेतृत्व वाला विकास ही भारत के भविष्य की नींव है।’’ यह केवल एक नीतिगत आकांक्षा नहीं है बल्कि यह एक राष्ट्रीय मिशन है जो भारत की विकास यात्रा और साथ ही दुनिया के साथ उसके जुड़ाव का मार्गदर्शन कर रहा है।

आज, व्यापक रूप से यह स्वीकार किया जाता है कि समावेशी, न्यायसंगत और संवहनीय विकास को हासिल करने के लिए महिला सशक्तिकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करना कि महिलाएं सम्मान के साथ जी सकें, अपने फ़ैसले खुद ले सकें और राष्ट्र-निर्माण में बराबर की भागीदार बन सकें, न केवल उनके साथ न्याय करता है बल्कि आर्थिक प्रगति की एक अनिवार्य शर्त भी है। भारत ने ‘विकसित भारत 2047’ के अपने दृष्टिकोण में ‘नारी शक्ति’ को केंद्र में रखा है, जबकि वैश्विक स्तर पर महिला-नेतृत्व वाले विकास की गति लगातार बढ़ रही है। इस संदर्भ में ब्रिक्स का विशेष महत्व है।

ब्रिक्स देशों में दुनिया की लगभग 49.5 प्रतिशत आबादी रहती है और इस आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग आधी है। इसलिए ब्रिक्स देशों में महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा देने से लैंगिक समानता, समावेशी विकास और संवहनीय विकास की दिशा में तेज़ी आ सकती है। ब्रिक्स देशों में महिलाओं की प्रगति केवल एक क्षेत्रीय प्राथमिकता नहीं है-यह वैश्विक विकास के लिए एक अनिवार्य कदम है।
‘ब्रिक्स महिला कार्य समूह’ और ‘ब्रिक्स महिला व्यवसाय समूह’ के माध्यम से सदस्य देश अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सहयोग बढ़ा रहे हैं, बेहतरीन तौर-तरीके साझा कर रहे हैं और ऐसे समाधान ढूंढ रहे हैं जिन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके।

नीतिगत संवाद, नवाचार और ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देकर ‘ब्रिक्स महिला ट्रैक’ एक ऐसे महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभर रहा है जो यह सुनिश्चित करता है कि महिलाएं केवल विकास की लाभार्थी न रहें, बल्कि एक अधिक समावेशी, मज़बूत और संवहनीय भविष्य के निर्माण में अग्रणी और साझीदार भी बनें। भारत का अनुभव दिखाता है कि महिलाओं की ज़्यादा भागीदारी से शासन व्यवस्था ज़्यादा समावेशी, जवाबदेह और विकास-उन्मुख बनती है। ऐतिहासिक ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ से इस प्रगति को और मज़बूती मिलेगी, क्योंकि इससे संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी।

भारत का महिलाओं के नेतृत्व वाला विकास मॉडल तेज़ी से मापने योग्य आर्थिक परिणामों में दिखाई दे रहा है। ‘लखपति दीदी’ पहल ने 3 करोड़ से ज़्यादा महिलाओं को सालाना 1 लाख रुपये से ज़्यादा की घरेलू आय अर्जित करने में मदद की है और इसका राष्ट्रीय लक्ष्य 6 करोड़ लखपति दीदियां बनाना है। इन कोशिशों को आगे बढ़ाते हुए ‘नमो ड्रोन दीदी’ जैसी पहल महिलाओं को खेतीबाड़ी के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी-सक्षम उद्यमी बनने के लिए सशक्त बना रही है। इस बदलाव में वित्तीय समावेशन की अहम भूमिका रही है। फरवरी 2026 तक प्रधानमंत्री जन- धन योजना के तहत 32.17 करोड़ महिलाएं लाभार्थी रही हैं और लगभग 89 प्रतिशत महिलाएं अपना बैंक खाता खुद संचालित करती हैं।

‘प्रधानमंत्री मुद्रा योजना’ के माध्यम से संस्थागत ऋण तक पहुंच का विस्तार हुआ है, जिसके तहत 2015 से अब तक 40 लाख करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 57 करोड़ से अधिक ऋण स्वीकृत किए गए हैं। खास बात यह है कि सभी मुद्रा ऋण खातों में से लगभग 60 प्रतिशत खाते महिलाओं के हैं जिससे यह महिला उद्यमियों को सहायता प्रदान करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा कार्यक्रम बन गया है। डिजिटल क्रांति ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए नए रास्ते खोले हैं। पिछले पांच वर्षों में इंटरनेट तक महिलाओं की पहुंच में 31 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। इसके साथ ही डिजिटल समावेशन के साथ-साथ डिजिटल सुरक्षा भी ज़रूरी है।

उभरती हुई प्रौद्योगिकियों ने साइबर उत्पीड़न, ऑनलाइन दुर्व्यवहार और एआई आधारित दुष्प्रचार जैसी नई चुनौतियां पैदा की हैं। यह मानते हुए कि महिलाओं की गरिमा और राष्ट्र-निर्माण में उनकी भागीदारी के लिए एक सुरक्षित डिजिटल वातावरण आवश्यक है। विकासशील देशों के प्रगति के एजेंडे को आकार देने में ब्रिक्स का किरदार बड़ा हो रहा है। लिहाजा, महिला सशक्तीकरण उसके समावेशी और संवहनीय विकास के नजरिए के केंद्र में होना चाहिए। ब्रिक्स देशों का अनुभव दिखाता है कि महिलाओं में निवेश से प्रगति, नवोन्मेष, संस्थागत दृढ़ता और सामाजिक परिवर्तन को बल मिलता है।

भारत के अनुभव दिखाते हैं कि वित्तीय समावेशन, उद्यमिता, बुनियादी प्रशासन, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और मानव पूंजी में निवेश से बड़े पैमाने पर महिलाओं के नेतृत्व में विकास को आगे बढ़ाया जा सकता है। भारत की 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता के अंतर्गत महिलाओं का सशक्तीकरण विकास सहयोग के केंद्र में लैंगिक समानता को रखे जाने की साझा प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करता है। मौजूदा समय में हमारा देश विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ रहा है। इसी दौरान ब्रिक्स भी एक ज्यादा समावेशी वैश्विक व्यवस्था के लिए काम कर रहा है। ऐसे समय में साझा समृद्धि, संवहनीय विकास और न्याय संगत प्रगति प्राप्त करने के लिए महिलाओं के नेतृत्व में विकास अपरिहार्य होगा। इक्कीसवीं सदी सिर्फ महिला सशक्तीकरण की गवाह ही नहीं होगी, बल्कि इसे महिलाओं के नेतृत्व से परिभाषित किया जाएगा। इसे महिलाओं के नेतृत्व में विकास की सदी के रूप में याद किया जाएगा।

Team Desk