हर सप्ताह नए प्रश्न और नई समस्याएं सामने आती हैं। कभी-कभी ऐसी, जो मन को झकझोर देने वाली होती हैं। यह भी एक ऐसा ही मामला है। निःसंदेह यह अत्यंत विचलित करने वाला है, क्योंकि भारत सरकार ने उन प्रत्येक लोगों को चौंका दिया है जिन्हें अब तक भारतीय होने पर गर्व था। इसका प्रमाण था वह पासपोर्ट, जिसमें स्पष्ट रूप से व्यक्ति की राष्ट्रीयता अर्थात उसकी पहचान दर्ज होती थी। कम से कम अब तक स्थिति यही थी लेकिन सरकार की हालिया घोषणा ने न केवल भारतीय पासपोर्ट की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है, बल्कि प्रत्येक भारतीय के अस्तित्व, पहचान और नागरिकता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
अचानक हर व्यक्ति के सामने एक गंभीर और प्रासंगिक प्रश्न खड़ा हो गया मैं कहां का हूं? मेरा देश कौन सा है? मेरी भूमि कौन सी है? जिस भारतीय मिट्टी को मैंने जीवनभर अपना माना और जिसकी शपथ ली, क्या वास्तव में वह मेरी है। विडंबना यह है कि अब इसके प्रमाण के लिए दस्तावेजों और कागज़ात की आवश्यकता होगी। यह स्थिति विदेश मंत्रालय के उस कथन के बाद उत्पन्न हुई है, जिसमें कहा गया कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं, बल्कि केवल एक ‘यात्रा दस्तावेज’ है। मंत्रालय के एक अधिकारी के शब्दों में, पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का दस्तावेज नहीं।
विदेश यात्रा के दौरान भी पासपोर्ट आपकी राष्ट्रीयता की पुष्टि करता है लेकिन यह आपकी नागरिकता का प्रमाण नहीं है। एक स्तर पर सरकार को इस आधार पर दोष मुक्त माना जा सकता है कि वह केवल उस स्थिति को स्पष्ट कर रही है जो कानून में स्पष्ट रूप से दर्ज है। वर्ष 2013 में बंबई उच्च न्यायालय ने कहा था कि यदि किसी व्यक्ति का जन्म 1 जुलाई 1987 के बाद हुआ है तो केवल जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट या यहां तक कि आधार कार्ड भी उसके भारतीय नागरिक होने को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते। इसके बाद न्यायालय ने एक व्यक्ति और तीन अन्य लोगों को राहत देने से इन्कार कर दिया था जिन पर अवैध प्रवासी होने का आरोप लगाया गया था।
अभियोजन पक्ष का कहना था कि आरोपी बांग्लादेशी नागरिक थे, जो अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर गए थे। यह झटका तब भी लगा जब आरोपियों ने स्वयं को भारतीय नागरिक सिद्ध करने के लिए पासपोर्ट, आधार कार्ड और जन्म प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए थे। यह तर्क दिया जा रहा है कि जन्म प्रमाणपत्र यह दर्शा सकता है कि किसी व्यक्ति का जन्म भारत में हुआ है और अन्य दस्तावेज यह प्रमाणित कर सकते हैं कि वह भारत में रह रहा है। लेकिन कानून इन्हें नागरिकता के प्रमाण के रूप में मान्यता नहीं देता।
हाल ही में बंबई उच्च न्यायालय ने बाबू अब्दुल सरकार बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में स्पष्ट रूप से कहा कि नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जांच नागरिकता कानून, 1955 के अंतर्गत ही की जानी चाहिए और इन्हें केवल पहचान संबंधी दस्तावेजों जैसे आधार, पैन या मतदाता पहचान पत्र के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने कहा- आज भारत में राष्ट्रीयता से जुड़े प्रश्नों के निर्धारण के लिए नागरिकता अधिनियम ही प्रमुख और नियंत्रक कानून है। इसलिए केंद्र सरकार ने जो कहा-वह केवल उस आधिकारिक और पहले से निर्धारित स्थिति को ही रेखांकित करता है। लेकिन इस पूरे मामले के पीछे दो प्रश्न हैं यह शुरू कैसे हुआ और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी। पहले प्रश्न अर्थात कैसे का उत्तर अपेक्षाकृत सरल है।
यह विवाद 14वें पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर उस समय शुरू हुआ जब विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज है और इसे नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। स्वाभाविक रूप से इसके बाद आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए और कई तरह के सवाल उठने लगे। लेकिन इससे पहले दूसरा प्रश्न अब क्यों? अर्थात इस विवाद का समय इतना महत्वपूर्ण क्यों है? सरकार पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वह मुख्य रूप से अयोध्या स्थित राम मंदिर में हुई चोरियों से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है।
राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सवाल उठाया कि यदि पासपोर्ट नागरिकता का वैध प्रमाण नहीं है तो फिर कौन-सा दस्तावेज प्रमाण माना जाएगा? गीतकार जावेद अख्तर ने विदेश मंत्रालय के बयान को ‘बेतुका’ बताते हुए सवाल किया कि क्या पासपोर्ट नागरिकता की पुष्टि किए बिना ही जारी किए जा रहे हैं। विपक्ष के अन्य नेताओं, जिनमें महुआ मोइत्रा और आदित्य ठाकरे शामिल हैं, ने भी सरकार पर भ्रम की स्थिति पैदा करने का आरोप लगाया। वहीं एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि वर्ष 2030 तक शायद नागरिकता का एकमात्र प्रमाण राजनीतिक दल की सदस्यता रह जाएगा।
इन सबके बीच एक महत्वपूर्ण और चिंताजनक प्रश्न सामने खड़ा है, यदि पासपोर्ट भी भारतीय नागरिकता को निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं करता है तो फिर कौन-सा दस्तावेज करेगा? पिछले वर्ष संसद में सरकार ने स्पष्ट किया था कि नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत किया जाता है। नागरिकता अधिनियम के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का जन्म 26 जनवरी 1950 या उसके बाद लेकिन 1 जुलाई 1987 से पहले भारत में हुआ है, तो वह जन्म के आधार पर भारतीय नागरिक माना जाएगा। जुलाई 1987 के बाद जन्म लेने वाले व्यक्ति नागरिकता का दावा तभी कर सकते हैं, जब उनके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक हो।
वहीं 3 दिसंबर 2004 या उसके बाद जन्म लेने वाले व्यक्ति जन्म के आधार पर नागरिकता का दावा तभी कर सकते हैं जब उनके दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हों, या उनमें से एक भारतीय नागरिक हो और दूसरा जन्म के समय अवैध प्रवासी न हो। सरकार अपने इस तर्क में सही है कि भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से कोई नई नीति या नियम लागू नहीं किया गया है। हालांकि, वर्तमान सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इस भ्रम को दूर करे और ऐसी उचित दस्तावेज व्यवस्था या वैध नागरिक पहचान पत्र की व्यवस्था करे जिससे प्रत्येक भारतीय गर्व से सिर उठाकर कह सके, मैं भारतीय हूं और मेरा संबंध भारत से है।


Download Android App
Download iOS App




