पिघल रहा है यूरोप

Summary :

भारत 2026 की गर्मियों में विश्व के 100 सबसे गर्म शहरों में से 98 शहरों का घर बन गया है। यह आंकड़ा बताता है कि हमारी जलवायु के साथ कुछ बहुत ही गंभीर और अस्वाभाविक भयावहता हो रही है। भारतीय मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में तापमान में और अधिक बढ़ाैतरी हो सकती है, भारत में लू को केवल गर्मी नहीं कहते। मौसम विभाग के अनुसार लू की तब घोषणा की जाती है जब तापमान 37 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक हो जाएगा, या फिर जब यह सामान्य तापमान से काफी ऊपर हो जाएगा। इस…

भारत 2026 की गर्मियों में विश्व के 100 सबसे गर्म शहरों में से 98 शहरों का घर बन गया है। यह आंकड़ा बताता है कि हमारी जलवायु के साथ कुछ बहुत ही गंभीर और अस्वाभाविक भयावहता हो रही है। भारतीय मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि आने वाले दिनों में तापमान में और अधिक बढ़ाैतरी हो सकती है, भारत में लू को केवल गर्मी नहीं कहते। मौसम विभाग के अनुसार लू की तब घोषणा की जाती है जब तापमान 37 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक हो जाएगा, या फिर जब यह सामान्य तापमान से काफी ऊपर हो जाएगा। इस साल की गर्मी को समझने के लिए हमें प्रशांत महासागर की गहराइयों तक झांकना होगा।

“अल-नीनो” एक जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर की सतह असामान्य रूप से गर्म हो जाती है और इसका प्रभाव समुद्र के मौसम पर पड़ता है। मौसम वैज्ञानिक के आंकलन के अनुसार, 2026 में एक “सुपर अल-नीनो” विकसित हो सकता है, जिसके अनुसार वैश्विक समुद्र तट को बाधित करने, भारत में वर्षा और भूमि की सतह के तापमान को बढ़ाने के लिए जाना जाता है। पश्चिमी यूरोप का एक बड़ा हिस्सा इस समय वसंत के मौसम में ही पड़ रही भीषण गर्मी से जूझ रहा है। फ्रांस में पिछले हफ्ते भीषण गर्मी के कारण करीब 1,000 लोगों की मौतें हुई हैं। ब्रिटेन और फ्रांस में ट्रेनें रद्द कर दी गईं और फ्रांसीसी अधिकारियों ने यात्रियों को घर पर ही रहने का आग्रह किया है।

फ्रांस के पेरिस के एक इलेक्ट्रिक स्टोर में पंखा खरीदने को लेकर मारमारी देखने को मिली है। इंडियन कपल ने बताया कि पंखे के लिए वो घंटेभर से लाइन में लगे हैं। बीते 3 दिनों से वो पंखा ढूंढने में लगे हुए थे। अब जाकर उन्हें पंखा मिल पाया है। साफ हवा से जुड़े नियम लागू होने से पहले, गाड़ियों के धुएं और फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलने वाले बहुत छोटे सल्फेट और नाइट्रेट कण सूरज की रोशनी को वापस परावर्तित कर देते थे। इस वजह से यूरोप को कुछ हद तक ठंडक मिलती थी और यह ‘ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ाैतरी के कारण होने वाली गर्मी के असर को कुछ हद तक कम कर देते थे।’ बताया जा रहा है कि जर्मनी, बेल्जियम, नीदरलैंड, लक्समबर्ग और स्विट्जरलैंड में तापमान 40 सेलसियस से अधिक बढ़ने की संभावना है।

बेल्जियम और जर्मनी में बुधवार को अब तक के सबसे उच्चतम तापमान दर्ज किए थे। फ्रांस में 16 साल का रिकॉर्ड तोड़कर पारा 45 के पार पहुंचा वसंत के मौसम में आई इस अजीब और बेमौसम गर्मी की वजह एक ‘हीट डोम’ है। उत्तरी अफ्रीका से आया हवा के भारी दबाव वाला यह सिस्टम बहुत मजबूत है और धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। यूरोपीय संघ की कॉपरनिक्स जलवायु परिवर्तन सेवा के मुताबिक, पिछले 25 वर्षों में यूरोप में इस तरह की मौसम प्रणालियां सामान्य हो गई हैं जिससे ज्यादा बार और ज्यादा तेज गर्म लहरें चलने लगी हैं। यूरोप में इतनी तेज रफ्तार से बढ़ती गर्मी की एक वजह उसकी भौगोलिक स्थिति भी है। दरअसल, यूरोप सीधे आर्कटिक (उत्तरी ध्रुव) से जुड़ा हुआ है और आर्कटिक दुनिया की इकलौती ऐसी अन्य जगह है जो पहले से कहीं ज्यादा तेजी से गर्म हो रही है।

ईयू की कॉपरनिक्स जलवायु परिवर्तन सेवा के डेटा के मुताबिक, उत्तरी ध्रुव के आस-पास का औसत तापमान पहले ही 3.3 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ चुका है। इसकी एक वजह यह भी है कि आर्कटिक महासागर का पानी गहरा होने और बर्फ न होने की वजह से बर्फ के मुकाबले सूरज की रोशनी ज्यादा सोख लेता है। जबकि बर्फ सूरज की रोशनी को वापस लौटा देती है। इस पूरी प्रक्रिया को ‘अल्बेडो इफेक्ट’ कहा जाता है और यही चीज इस समय पूरे यूरोप में भी हो रही है। यूरोप के वे इलाके जहां पहले पूरे साल या फिर गर्मियों के अंत तक बर्फ जमी रहती थी, जैसे आल्प्स के ऊंचे पहाड़ी इलाके, वहां अब बर्फ तेजी से गायब हो रही है। जब बर्फ हट जाती है तो नीचे की गहरे रंग की जमीन सूरज की गर्मी को अंतरिक्ष में वापस नहीं भेज पाती, बल्कि खुद सोख लेती है।

इसी वजह से वहां गर्मी और तेजी से बढ़ने लगी है। ब्रिटेन की संस्था ‘वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन’ के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानों की वजह से जो जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उसी के कारण मौसम का यह खतरनाक रूप अब कहीं ज्यादा देखने को मिल रहा है और इसकी तीव्रता भी बहुत बढ़ गई है। भीषण गर्मी का आलम यह था कि आर्कटिक सर्कल (ध्रुवीय क्षेत्र) जैसे ठंडे इलाकों में भी तापमान 30 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया। इसके अलावा, समुद्र की सतह का तापमान भी इतिहास में अब तक का ‘सबसे गर्म’ दर्ज किया गया। इस रिपोर्ट को तैयार करने वाली एजेंसियों में से एक ‘यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स’ के प्रमुख फ्लोरियान पैपेनबर्गर ने कहा, “यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप है और इसके बुरे असर अभी से ही काफी खतरनाक रूप में दिखने लगे हैं।”

यूरोप में बढ़ती भीषण गर्मी और लू को रोकने के लिए ग्रीनहाउस गैसों और कार्बन उत्सर्जन को कम करना सबसे प्रभावी दीर्घकालिक समाधान है। जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार, यूरोप दुनिया के सबसे तेजी से गर्म होने वाले महाद्वीपों में से एक है। कार्बन उत्सर्जन के कारण वातावरण में गर्मी फंस जाती है, जिससे तापमान रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ जाता है। इस समस्या से निपटने के लिए प्रमुख कदम उठाने होंगे। बुनियादी ढांचे को बदलना पड़ेगा – घरों में कूलिंग सिस्टम, शहरी नियोजन और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर करनी होंगी, साथ ही जलवायु परिवर्तन का मूल कारण भी दूर करना जरूरी है। कार्बन उत्सर्जन कम करना होगा, कोयला, तेल, गैस का इस्तेमाल घटाना पड़ेगा।

Aakash Chopra