आगामी 16 से लेकर 18 अप्रैल तक संसद के दोनों सदनों राज्यसभा व लोकसभा की त्रिदिवसीय विशेष बैठक होगी जिसमें 2023 में पारित महिला आरक्षण विधेयक नारी शक्ति वन्दन अधिनियम में कई संशोधन किये जाएंगे। यह लघु सत्र नहीं होगा क्योंकि संसद का बजट कालीन अधिवेशन समाप्त नहीं हुआ है जिसकी घोषणा राष्ट्रपति महोदय करते हैं, इसीलिए संसद में बजट का काम विगत 2 अप्रैल को पूरा हो जाने के बावजूद इसकी बैठक 16 अप्रैल तक स्थगित कर दी गई थी। इन तीन दिनों की बैठकों के भीतर लोकसभा व राज्यसभा में महिलाओं के आरक्षण के लिए 2023 में बने ‘नारी शक्ति वन्दन’ अधिनियम में ऐसा संशोधन किया जायेगा जिससे लोकसभा व विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था 2029 के लोकसभा चुनावों में ही हो सके।
नारीशक्ति वन्दन कानून में यह प्रावधान था कि देश के विभिन्न चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन के बाद ही प्रत्यक्ष चुने गये बड़े सदनों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण हो सकेगा। यह कार्य ऐसी सूरत में 2029 के बाद तक जाकर होता, क्योंकि परिसीमन तभी संभव हो सकता था जबकि देश में ताजी जनगणना हो जाये। यह जनगणना कायदे से 2021 तक हो जानी चाहिए थी, परन्तु उस समय देश में कोरोना महामारी का प्रकोप चल रहा था अतः इसे आगे टाला जाता रहा। अब यह जनगणना देश मेें शुरू हो रही है जो दो चरणों में 2029 के आसपास जाकर ही पूरी होगी। अतः परिसीमन का कार्य इसके बाद यदि शुरू होता है तो उसमें भी साल से ऊपर का समय लग जायेगा, इसीलिए मोदी सरकार को महिला आरक्षण अधिनियम के बारे में विपक्ष की तीखी आलोचना का शिकार भी बनना पड़ा था।
तमाम विपक्षी दल कह रहे थे कि स्त्री सम्मान के सन्दर्भ में भाजपा की दोहरी नीतियां हैं। यह पार्टी लोक दिखावे के लिए ही महिलाओं के सम्मान की बात करती रहती है जबकि संवैधानिक रूप से उसे सशक्त करने के उपाय नहीं करती। विपक्ष कह रहा था कि नारी शक्ति वन्दन अधिनियम तो बना दिया गया है, मगर न जाने कब जाकर जमीन पर लागू हो पायेगा। हम सब जानते हैं कि संसद से लेकर सड़क तक देश के विभिन्न राजनीतिक दल जनता की नजर में अपने नम्बर बढ़वाने के लिए विभिन्न शाब्दिक कसरते करते रहते हैं, लेकिन मोदी सरकार ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर जो तत्परता दिखाई उससे फिलहाल विपक्ष के होश उड़े हुए हैं।
मोदी सरकार ने अब इस 2023 के कानून में एक अन्य संशोधन करने का फैसला इस तरह किया कि विपक्षी दलों को किसी भी प्रकार की आलोचना का अवसर न मिले। सरकार तीन दिवसीय बैठकों में यह संशोधन करने जा रही है कि चुनाव परिसीमन क्षेत्र को 2022 की जनगणना से जाेड़ दिया जाए और उसके आधार पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण कर दिया जाये। बेशक इन त्रिदिवसीय बैठकों में नारी वन्दन अधिनियम में जो संशोधन किया जायेगा। वह भी संविधान संशोधन होगा और दोनों सदनों में पारित करने के लिए इसे दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता पड़ेगी, लेकिन अब विपक्षी दलों को भी इस नये संविधान संशोधन विधेयक का समर्थन करना पड़ेगा, क्योंकि 2023 में वही मांग कर रहा थे कि सरकार 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को तुरन्त लागू क्यों नहीं कर सकती।
उस समय कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों की महिला नेता मोदी सरकार के उस कदम को आधे–अधूरे मन से उठाया कदम बता रही थीं, परन्तु अब सरकार ने 2011 की जनगणना को आधार बनाकर अपनी कमर बहुत पक्की कर ली है। जाहिर है कि 33 प्रतिशत आरक्षण देने का सरल व सुगम रास्ता यह हो सकता है कि लोकसभा व विभिन्न विधानसभाओं की सदस्य संख्या में 50 प्रतिशत की वृद्धि कर दी जाये। ऐसा इसलिए माना जा रहा है कि परिसीमन आयोग के बारे में सरकार जो नया विधेयक लेकर आ रही है उसमें ऐसा ही प्रस्ताव किया जा रहा है। इसलिए इन तीन दिनों में केवल एक संशोधन विधेयक नहीं आयेगा बल्कि कई विधेयक लाये जायेंगे।
अतः मोदी सरकार ने लोकसभा की सदस्य संख्या 545 (जिनमें दो मनोनीत सांसद भी शामिल होते हैं ) से बढ़ाकर 816 करने का फैसला कर लिया है। अतः परिसीमन आयोग अब 2011 की जनगणना को आधार मान कर लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़ा देगा, जिनमें 33 प्रतिशत महिला सांसद शामिल, होंगी जबकि अन्य सीटों पर चुनाव लड़ने से उन्हें मनाही नहीं होगी, क्योंकि वर्तमान 543 चुने हुए लोकसभा सदस्यों में 14 प्रतिशत से अधिक महिला सांसद हैं। इस मामले में हालांकि भारत ने तरक्की की है क्योंकि 1952 के प्रथम आम चुनावों में लोकसभा में केवल 5 प्रतिशत ही महिला सांसद थीं।
केन्द्र प्रशासित राज्यों के लिए इसी प्रावधान को लागू करने के लिए अलग से एक विधेयक पेश किया जायेगा। इसके साथ ही लोकसभा व विधानसभाओं की सदस्य संख्या बढ़ाने हेतु भी अलग से संविधान संशोधन विधेयक लाना पड़ेगा क्योंकि वर्तमान कानून के अनुसार लोकसभा सदस्यों की अधिकतम संख्या 550 ही हो सकती है। इसी प्रकार किसी भी विधानसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 500 हो सकती है। देश में इस समय सबसे बड़ी विधानसभा उत्तर प्रदेश की है जिसमें 403 विधायक हैं। अब उनकी संख्या 602 हो जायेगी। मगर इसके साथ ही देश में लोकसभा चुनाव क्षेत्राें की संख्या भी बढ़कर 816 हो जायेगी। इन चुनाव क्षेत्रों के निर्धारण का कार्य परिसीमन आयोग ही करेगा। परिसीमन आयोग 2011 की जनगणना को आधार मान कर यदि यह कार्य करता है तो उसे अधिकतम एक वर्ष का समय लगेगा।
2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव भी होने हैं। अतः इसकी विधानसभा में हम न्यूनतम 33 प्रतिशत महिला विधायकों को सबसे पहले देखेंगे। वैसे तथ्य यह भी है कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का पहला ठोस कदम 1989 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. राजीव गांधी ने उठाया था। वह उस समय संविधान संशोधन लाये थे जो कि लोकसभा में पारित भी हो गया था परन्तु राज्यसभा में तब कांग्रेस के पास बहुमत नहीं था जिसकी वजह से वह उच्च सदन में पारित नहीं हो सका था, लेकिन वर्तमान प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने वह करिश्मा कर दिखाया हो जो पिछले सभी प्रधानमन्त्रियों का जी हलकान कर रहा था।
2008 में जब केन्द्र में डा. मनमोहन सिंह की सरकार थी तो महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पारित हो गया था मगर लोकसभा में उसे लाने की सरकार हिम्मत नहीं जुटा सकी थी। इससे पहले 1966, 1998 व 1999 में भी सभी सत्तारूढ़ सरकारों के प्रयास असफल रहे, लेकिन 1992 में केन्द्र में जब कांग्रेस की नरसिम्हाराव सरकार थी तो उसने पंचायती राज कानून बनाया और देश के स्थानीय निकायों में 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए किया। यह कार्य उन्होंने संविधान में 74वां व 75वां संशोधन करके किया। बाद में कुछ राज्यों में यह 50 प्रतिशत तक भी हो गया। हालांकि हमारे संविधान निर्माता पुरखों ने इसे जरूरी नहीं माना था और कहा था कि ऐसा करना संविधान के समक्ष सभी नागरिकों के एक समान अधिकारों के विरुद्ध होगा।
संविधान सभा में महिला आरक्षण पर भी अच्छी –खासी बहस हुई थी, मगर जब 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशें मानते हुए सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण 27 प्रतिशत कर दिया गया तो यह मांग तेजी से उभरी, क्योंकि व्यापक सन्दर्भों में महिलाओं को भी पिछड़ा ही माना गया था। अतः इनकी आधी आबादी को देखते हुए 33 प्रतिशत आरक्षण का राजनीतिक नाद जम कर गूंजा।


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