महिला सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त की दरकार

Summary :

2012 में दिल्ली में चलती बस में छह पुरुषों द्वारा बलात्कार किए जाने के कुछ दिनों बाद पीड़िता की चोटों के कारण मौत हो गई। 23 वर्षीय फिजियोथेरेपी की छात्रा को प्रेस द्वारा निर्भया -यानी निडर का उपनाम दिया गया था। सामूहिक बलात्कार और हत्या के छह में चार दोषियों को घटना के आठ साल बाद 20 मार्च 2020 को सुबह 5:30 बजे दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। दोषियों को सजा मिलने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करते हुए कहा, न्याय की जीत हुई है। एक ऐसा राष्ट्र बनाना होगा जहां महिलाओं के सशक्तिकरण…

2012 में दिल्ली में चलती बस में छह पुरुषों द्वारा बलात्कार किए जाने के कुछ दिनों बाद पीड़िता की चोटों के कारण मौत हो गई। 23 वर्षीय फिजियोथेरेपी की छात्रा को प्रेस द्वारा निर्भया -यानी निडर का उपनाम दिया गया था। सामूहिक बलात्कार और हत्या के छह में चार दोषियों को घटना के आठ साल बाद 20 मार्च 2020 को सुबह 5:30 बजे दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। दोषियों को सजा मिलने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करते हुए कहा, न्याय की जीत हुई है। एक ऐसा राष्ट्र बनाना होगा जहां महिलाओं के सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित किया जाए।

निर्भया कांड के बाद देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर नये सिरे से बहस शुरू हुई। महिला सुरक्षा और बलात्कार विरोधी नए कानून बनाए गए। बावजूद इसके आधी आबादी अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो पायी हैं। निर्भया कांड के चौदह साल बाद राजधानी दिल्ली में एक बार फिर उस जैसी घटना घटी है। ऐसे में सवाल यह है कि महिलाएं कब अपने आप को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करेंगी। सवाल यह भी है कि महिलाओं के प्रति अपराध रुकने का नाम क्यों नहीं ले रहे? क्या अपराधियों को कानून का भय नहीं है? क्या तंत्र महिला सुरक्षा के प्रति संवेदनशील नहीं है? क्या समाज महिलाओं के प्रति हो रहे अपराध के प्रति आंखें मूंदे बैठा है या उदासीन है?

दिल्ली स्थित नांगलोई में एक प्राइवेट स्लीपर बस के भीतर ड्राइवर और कंडक्टर द्वारा एक महिला के साथ कथित रूप से गैंगरेप की घटना ने सभ्य समाज को अंदर तक हिला कर रख दिया है। इस घटना ने एक बार फिर से शासन-प्रशासन, पुलिसिंग और परिवहन नियमों के पालन में हुई भारी चूक का उजागर किया है। दुख इस बात का है कि जिस बस को महिलाएं सार्वजनिक यातायात के लिये सुरक्षित मानकर चलती हैं, उसी में यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटित हुई है। इस घटना ने एक बार फिर से उजागर किया है कि जिन लोगों को यात्रियों के सुरक्षित आवागमन की जिम्मेदारी दी गई थी, वे ही कथित तौर पर दरिंदे बनकर सामने आए।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत, यदि अपनी प्राचीन गौरवशाली स्थिति पर पहुंचना और विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होना चाहता है तो उसे अपनी लड़कियों और महिलाओं को सुरक्षित वातावरण प्रदान करने का कार्य निश्चित रूप से करना होगा। इस विषय पर अनगिनत चर्चाएं की जा चुकी हैं, लेकिन धरातल पर ठोस कार्रवाई कम हुई है। परिणामस्वरूप, महिलाओं के विरुद्ध अपराध बढ़ रहे हैं और उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं उभर रही हैं। निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा को लेकर तमाम कवायद हुई थी। फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापना करने की घोषणा की गई थी।

इसके अलावा महिला सुरक्षा से जुड़ी तमाम योजनाओं के क्रियान्वयन के लिये व्यापक प्रचार किया गया था। इसके बावजूद एक और निर्भया जैसी घटना बताती है कि अब तक जमीनी हकीकत में बहुत कुछ बदलाव नहीं आया है। हर बार की तरह तुरंत कार्रवाई का दावा करते हुए गिरफ्तारी को तत्काल कदम उठाने के रूप में दर्शाया जा रहा है। जबकि एक हकीकत है कि हमारी व्यवस्था की कमियां जस की तस बनी हुई हैं। सही मायनों में देश के हृदय में वर्ष 2012 के जख्म अभी भरे नहीं हैं। विडंबना देखिए कि निर्भया कांड के बाद सरकारों ने तमाम सुधारों के वायदे जनता के सामने किए थे।

तब घोषणा की गई थी कि अपराधियों पर नजर रखने के लिये दिल्ली में सीसीटीवी कैमरों की निगरानी को व्यापक रूप दिया गया है। लेकिन परिणाम जस के तस रहे। दिल्ली जैसे महानगर में अब बड़ी संख्या में माता-पिता अपनी बेटियों के समर्थन में खुलकर सामने आते हैं। वे शिकायत दर्ज कराने और न्याय की लड़ाई लड़ने में बच्चियों का साथ देते हैं। यही कारण है कि राजधानी में कई मामलों में पीड़िताएं खुलकर आवाज उठा पा रही हैं। इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे कस्बों में आज भी सामाजिक बदनामी के डर से कई घटनाओं को दबा दिया जाता है। परिवार अक्सर समझौते का दबाव बनाते हैं और पीड़िताओं को चुप रहने के लिए मजबूर किया जाता है।

इससे अपराधियों के हौसले और बढ़ जाते हैं। समस्या के विभिन्न पहुलओं पर विचार करें तो केवल पुलिस व्यवस्था मजबूत होने से समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है। महिलाओं की सुरक्षा को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखने की आवश्यकता है। परिवार और समाज के सोच में बदलाव भी बेहद जरूरी है। जानकारों के मुताबिक, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध को कम करने के लिए जरूरी है कि हर स्तर पर काम हो। सबसे जरूरी है कि हर जिले में स्पेशल टास्क फोर्स बननी चाहिए। महिलाएं अपनी शिकायतें बिना संकोच पुलिस के सामने समय से रख सकें। इसके बाद पुलिस का काम है कि उस शिकायत पर जल्द से जल्द सही तरीके से जांच कर महिलाओं को न्याय दिलाया जाए। अपराधी के खिलाफ सख्त एक्शन हो।

कई बार महिलाएं शिकायत के लिए आगे नहीं आ पातीं। अगर महिलाओं की शिकायत पर न्याय जल्दी और दुरुस्त होगा तो अन्य महिलाएं भी निडर होंगी उनका विश्वास भी बढ़ेगा। इसके लिए अलग से टास्क फोर्स जरूरी है। वास्तव में भारत में अब तक राष्ट्रीय स्तर के किसी सार्वजनिक सुरक्षा सर्वेक्षण में निवेश नहीं किया गया है। परिणामस्वरूप, पुलिस की गश्त नागरिकों की वास्तविक सुरक्षा चिंताओं की बजाय अपनी समझ के आधार पर होती है। इस अंतर को मिटाना आवश्यक है। बसों, रेलगाड़ियों और दूसरे परिवहन साधनों में सुरक्षा का नियमित रूप से सर्वेक्षण किया जाना चाहिए और चालकों, परिचालकों आदि को समय-समय पर जागरूक किया जाना चाहिए।

वहीं रियल-टाइम जीपीएस ट्रैकिंग को निजी बसों में अनिवार्य रूप से लागू करना चाहिए। साथ ही निजी बस चालक व परिचालकों की पृष्ठभूमि की कड़ी जांच करनी चाहिए। महिला सुरक्षा को लेकर बिलबोर्ड और शिकायत निवारण मंचों के संपर्क विवरणों के साथ नियमित सार्वजनिक अभियान चलाए जाने चाहिए। आपातकालीन हेल्पलाइन नंबरों की संख्या भी बढ़ाई जानी चाहिए। संकटकालीन कॉलों की निगरानी और उन पर कार्रवाई से सुरक्षा में सुधार होगा। कार्यस्थलों पर सुरक्षा भी चिंता का विषय है। कार्यालयों, कारखानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में महिलाओं का यौन शोषण व्यापक है। कामकाजी महिलाओं के लिए छात्रावास, अल्पकालिक आवास और सुरक्षित रात्रिकालीन यात्रा की सुविधा से महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ेगी।

महिलाओं की सुरक्षा को लेकर शिक्षा और जागरूकता भी अहम भूमिका निभाती है। स्कूलों और कालेजों में लड़कियों को उनके अधिकारों, कानूनी सहायता और आत्मरक्षा के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही लड़कों को भी महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार और संवेदनशीलता की शिक्षा देना आवश्यक है। समाज में लैंगिक समानता की भावना मजबूत किए बिना महिलाओं के खिलाफ अपराधों को पूरी तरह नियंत्रित करना कठिन होगा। तकनीक का इस्तेमाल भी महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने में सहायक साबित हो सकता है। मोबाइल एप, लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम, सीसीटीवी कैमरे और डिजिटल निगरानी अपराध रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

लेकिन इन सबके बावजूद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका न्याय व्यवस्था की ही है। जब तक अपराधियों को समय पर सजा नहीं मिलेगी, तब तक कानून का भय पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाएगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि पुलिस, न्यायपालिका, सरकार और समाज मिलकर महिलाओं के खिलाफ अपराधों के खिलाफ मजबूत माहौल तैयार करें। पीड़िताओं को न्याय मिलने में देरी नहीं होनी चाहिए और दोषियों को कठोर दंड मिलना चाहिए। महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि सभ्य और संवेदनशील समाज की पहचान भी है।

Team Desk