आ गया गणगौर का त्यौहार! जानें राजस्थान की अनूठी परंपरा की कहानी और महत्व

Gangaur Vrat ka Mahatva
Gangaur Vrat ka Mahatva: चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को गणगौर व्रत रखने की परंपरा है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए यह उपवास रखती हैं। राजस्थान और हरियाणा समेत पूरे उत्तर भारत में इस त्योहार को बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष गणगौर व्रत 21 मार्च 2026 को रखा जाएगा। चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि 21 मार्च को सुबह 2:30 बजे से शुरू होकर उसी रात 11:56 बजे तक रहेगी। उदय तिथि की गणना के आधार पर व्रत इसी दिन मनाया जाएगा।

Gangaur Vrat 2026: 16 दिनों का गणगौर पर्व

Gangaur Vrat 2026
Gangaur Vrat 2026 (Social Media)

गणगौर का त्योहार होली के अगले दिन शुरू होता है और पूरे 16 दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान महिलाएं रोज़ाना माता गणगौर की पूजा करती हैं। घर में मिट्टी या लकड़ी की मूर्तियां (ईसर-गौरी) रखकर उन्हें सजाया जाता है। महिलाएं सजती-संवरती हैं, मेहंदी लगाती हैं और लोकगीत गाती हैं। कई जगहों पर महिलाएं सिर पर कलश रखकर जुलूस भी निकालती हैं।

इस त्योहार पर महिलाएं और लड़कियां लहंगा-चोली और ओढ़नी जैसे पारंपरिक कपड़े पहनती हैं। वे चूड़ियां और बोरला पहनकर पूरा सोलह श्रृंगार करती हैं। हर तरफ लोकगीत और नृत्य की धूम होती है, जिससे यह त्यौहार और भी उत्साह से भर उठता है।

Gangaur Vrat ka Mahatva: क्यों मनाया जाता है यह त्यौहार?

शादीशुदा महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और अच्छी सेहत के लिए यह व्रत रखती हैं। वहीं, कुंवारी लड़कियां अच्छे जीवनसाथी के लिए में माता गौरी की पूजा करती हैं। इसमें भगवान शिव (ईसर) और माता पार्वती (गौरी) की पूजा होती है, जो सुखद वैवाहिक जीवन और प्रेम का प्रतीक माने जाते हैं।

Gangaur Vrat Story: गणगौर की पौराणिक कहानी

कहा जाता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कड़ी तपस्या की थी। उनकी भक्ति से खुश होकर शिव जी ने उन्हें अपना लिया। ‘गण’ का अर्थ है शिव और ‘गौर’ का अर्थ है पार्वती। उन्हीं के अटूट प्रेम और मिलन की याद में यह त्योहार मनाया जाता है।

Gangaur Vrat 2026: सांस्कृतिक महत्व

गणगौर राजस्थान की संस्कृति की पहचान है। राजस्थान की परंपराओं में गणगौर का बहुत महत्व है। यह त्योहार वसंत ऋतु और नई फसल की खुशी भी लाता है। चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन ईसर-गौरी की मूर्तियों को तालाब या नदी में विसर्जित किया जाता है, जिसके साथ ही यह उत्सव पूरा होता है। राजस्थान के शहरों में इस दिन बड़ी धूमधाम से सवारी निकाली जाती है और मेले लगते हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक है, बल्कि आपसी मेलजोल और समाज की खुशहाली को भी बढ़ाता है।

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