Jagannath Snan Muhurat 2026 जानें
स्नान पूर्णिमा शुरू (29 जून, 2026): सुबह 03:06 बजे
स्नान पूर्णिमा खत्म (30 जून, 2026): अगले दिन सुबह 05:26 बजे
108 सोने के कलशों से भगवान का स्नान

स्नान यात्रा को रथ यात्रा की शुरुआत माना जाता है। पुरानी कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान जगन्नाथ पहली बार धरती पर आए थे। इस खास मौके पर तीनों भगवानों को 108 सोने के कलशों के पवित्र पानी से स्नान कराया जाता है। यह पानी एक खास कुएं से लाया जाता है जो साल में सिर्फ एक बार खुलता है। पानी में कुछ जड़ी-बूटियां और इत्र मिलाए जाते हैं। नहाने के बाद भगवान को सजाया जाता है और भगवान जगन्नाथ हाथी के रूप में दर्शन देते हैं। इसके पीछे कहानी है कि भगवान गणेश के एक भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए जगन्नाथ जी ने उन्हें हाथी के रूप में दर्शन दिए थे। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
15 दिनों तक नहीं होंगे भगवान के दर्शन

कहा जाता है कि, इस स्नान के बाद भगवान जगन्नाथ बीमार हो जाते हैं और 15 दिनों के लिए अकेले कमरे में चले जाते हैं। इस बीच भक्त उनके दर्शन नहीं कर पाते। पुजारी भगवान को ठीक करने के लिए कई तरह के काढ़े का भोग लगाते हैं। 15 दिनों के आराम के बाद भगवान पूरी तरह ठीक होकर नए और सुंदर रूप में भक्तों के सामने आते हैं।
क्यों हो जाते हैं भगवान बीमार?

भगवान के 15 दिन बीमार रहने के पीछे एक प्रसिद्ध कथा है। पुरी में माधवदास नाम के भगवान जगन्नाथ के एक बड़े भक्त रहते थे। वे किसी की मदद नहीं लेते थे और उन्हें भरोसा था कि भगवान खुद उनकी रक्षा करेंगे। एक बार माधवदास बहुत बीमार हो गए और खुद उठने-बैठने की हालत में भी नहीं रहे। तब भगवान जगन्नाथ खुद एक सेवक बनकर उनकी सेवा करने पहुंच गए।
भगवान ने माधवदास के गंदे कपड़े साफ किए और उनकी पूरी देखभाल की। जब माधवदास ठीक हुए तो उन्हें पता चला कि सेवा करने वाले खुद भगवान थे। उन्होंने भगवान से पूछा कि आप तो मेरी बीमारी सीधे ठीक कर सकते थे, फिर आपने मेरी सेवा क्यों की? भगवान जगन्नाथ ने जवाब दिया कि वे भक्तों का दुख नहीं देख सकते, लेकिन किस्मत में लिखा सुख-दुख तो भुगतना ही पड़ता है। इसलिए उन्होंने अपने भक्त की 15 दिनों की बीमारी खुद पर ले ली। माना जाता है कि तभी से हर साल भगवान 15 दिनों के लिए बीमार होते हैं।
15 दिनों के आराम के बाद निकलती है रथ यात्रा

15 दिनों के आराम के बाद भगवान ठीक हो जाते हैं और भक्तों को नए रूप में दर्शन देते हैं। इसके बाद आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा शुरू होती है। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ बड़े-बड़े रथों पर बैठकर भक्तों से मिलने निकलते हैं। वे अपनी मौसी के घर ‘गुंडिचा मंदिर’ जाते हैं और कुछ दिन वहां रुककर वापस अपने मंदिर लौट आते हैं।


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