Vat Purnima Vrat Katha in Hindi: वट पूर्णिमा पर जरूर पढ़ें सावित्री-सत्यवान की यह पौराणिक कथा, इसके बिना अधूरी है पूजा

Summary :

हिंदू धर्म में वट पूर्णिमा व्रत को बहुत पवित्र और महत्वपूर्ण माना गया है। शादीशुदा महिलाएं यह व्रत अपने पति की लंबी उम्र, घर की सुख-शांति और खुशहाल शादीशुदा जिंदगी के लिए रखती हैं। यह त्योहार ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, इस बार ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा तिथि सोमवार, 29 जून 2026 को पड़ेगी, ऐसे में इसी दिन वट पूर्णिमा भी मनाई जाएगी। इस दिन सुहागिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। हिंदू धर्म में बरगद के पेड़ को बहुत पवित्र माना गया है। ऐसा माना जाता है कि इस पेड़ में त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु…

हिंदू धर्म में वट पूर्णिमा व्रत को बहुत पवित्र और महत्वपूर्ण माना गया है। शादीशुदा महिलाएं यह व्रत अपने पति की लंबी उम्र, घर की सुख-शांति और खुशहाल शादीशुदा जिंदगी के लिए रखती हैं। यह त्योहार ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार, इस बार ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा तिथि सोमवार, 29 जून 2026 को पड़ेगी, ऐसे में इसी दिन वट पूर्णिमा भी मनाई जाएगी। इस दिन सुहागिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। हिंदू धर्म में बरगद के पेड़ को बहुत पवित्र माना गया है। ऐसा माना जाता है कि इस पेड़ में त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी का वास होता है। इस दिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करके हमेशा सुहागन रहने का आशीर्वाद मांगती हैं। यह त्योहार मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों में बहुत ज्यादा मनाया जाता है।
मान्यता है कि, इस दिन जो भी महिला व्रत रखती है और पूजा पाठ करती है, उसे वट पूर्णिमा की व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए। बिना व्रत कथा के पाठ के पूजा अधूरी मानी जाती है। यहां पर वट पूर्णिमा की पौराणिक व्रत कथा (Vat Purnima Vrat Katha in Hindi) दी गई है।

Vat Purnima Vrat Katha in Hindi: सावित्री और सत्यवान की कथा

Vat Purnima Vrat Katha in Hindi
Vat Purnima Puja (AI Generated)
वट पूर्णिमा व्रत कथा के अनुसार, राजा अश्वपति की एक बेटी थी, जिनका नाम सावित्री था। सावित्री का विवाह राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से हुआ। नारद जी ने पहले ही राजा अश्वपति को बता दिया था कि सत्यवान बहुत ही अच्छे और धर्म को मानने वाले इंसान हैं, लेकिन उनकी उम्र बहुत कम है और एक साल बाद ही उनकी मृत्यु हो जाएगी। पिता ने सावित्री को बहुत समझाया, लेकिन सावित्री अपने फैसले पर अडिग रहीं। शादी के बाद सावित्री अपने पति के साथ महल छोड़कर जंगल में रहने लगीं।

सत्यवान की मृत्यु का समय करीब आते देख सावित्री ने व्रत रखना शुरू कर दिया। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु होनी थी, उस दिन वह लकड़ियां काटने जंगल जाने लगे। सावित्री ने भी उनके साथ जाने की जिद की। जंगल में पेड़ पर चढ़ते समय अचानक सत्यवान के सिर में तेज दर्द हुआ। वे नीचे उतर आए और सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए।

तभी सावित्री ने देखा कि यमराज, सत्यवान के प्राण लेने आए हैं। जब यमराज सत्यवान की आत्मा को लेकर जाने लगे, तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगीं। यमराज ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन सावित्री ने कहा कि जहां मेरे पति जाएंगे, वहीं मेरा धर्म है। उनकी निष्ठा देखकर यमराज खुश हुए और तीन वरदान मांगने को कहा, पहला वरदान कि सावित्री ने अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी मांगी। दूसरा वरदान कि उन्होंने अपने ससुर का छीना हुआ राजपाट वापस मांगा और अंत में उन्होंने सत्यवान से 100 पुत्रों की माता बनने का वरदान मांग लिया।

तीसरे वरदान को पूरा करने के लिए यमराज को सत्यवान के प्राण वापस करने पड़े, क्योंकि बिना पति के सावित्री माता नहीं बन सकती थीं। सावित्री वापस उसी पेड़ के पास आईं जहां सत्यवान का शरीर पड़ा था। सत्यवान जीवित हो गए। जब वे घर पहुंचे, तो देखा कि उनके सास-ससुर की आंखों की रोशनी वापस आ गई थी और उन्हें अपना राज्य भी मिल गया था। इसी वजह से माना जाता है कि सावित्री अपने दृढ़ संकल्प से यमराज के हाथों से अपने पति के प्राण बचा लाई थीं।
इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथियों, कहानियों या मान्यताओं पर आधारित है। पंजाब केसरी इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं करता है।

Khushi Srivastava

खुशी श्रीवास्तव मीडिया इंडस्ट्री में करीब 3 साल का अनुभव रखती हैं। वायरल कंटेंट, लाइफस्टाइल, हेल्थ और वास्तु शास्त्र टिप्स पर प्रमुखता से काम किया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज से मास्टर ऑफ मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई के बाद पहली बार पत्रकारिता के श्रेत्र में कदम रखा। इसके बाद अमर उजाला प्रिंट (प्रयागराज) में इंटर्नशिप की। फिलहाल खुशी, पंजाब केसरी दिल्ली के डिजिटल प्लैटफॉर्म के लिए कंटेंट राइटिंग का काम करती हैं।