चंडीगढ़, 4 नवंबर (आईएएनएस)। 1984 के सिख-विरोधी दंगों की पीड़िता निरप्रीत कौर ने 1 नवंबर को ‘काला दिवस’ के रूप में मनाने की मांग की है। उन्होंने उस दर्दनाक दौर को याद करते हुए कहा कि सिखों की बेरहमी से की गई हत्याओं को देश कभी नहीं भूल सकता।
चंडीगढ़ में आईएएनएस से बात करते हुए निरप्रीत कौर ने अपने पिता की हत्या की दर्दभरी कहानी सुनाई और न्याय की लड़ाई को अभी अधूरा बताया। निरप्रीत कौर ने कहा, “1984 में मैं 16 साल की थी, जब मेरे पिता को जिंदा जला दिया गया था। उन्हें मारने वाले कोई बाहरी लोग नहीं थे बल्कि हमारे पड़ोस के ही लोग और कुछ राजनीतिक नेता थे।”
उन्होंने अपने पिता की हत्या में शामिल लोगों के नाम भी गिनाए। निरप्रीत ने कहा, “मेरे पिता की हत्या में शामिल लोगों में इंस्पेक्टर एन.के. कौशिक, पार्षद बलवान खोखर, सज्जन कुमार का भतीजा, उसका भाई किशन खोखर, पूर्व विधायक महेंद्र यादव, और कैप्टन भागमल सिंह शामिल थे। कैप्टन भागमल सिंह उस समय नौसेना के अधिकारी थे और ड्यूटी पर थे; उन्होंने ही मेरे पिता को रस्सियों से बांधा था। यह सब हमारे घर से शुरू हुआ और सबसे पहले मेरे पिता को ही मारा गया।”
निरप्रीत कौर ने बताया कि उन्होंने अपनी कलम के जरिए लड़ाई लड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा, “जब मैं तिहाड़ जेल में थी, तब उस समय की आईजी किरण बेदी ने मुझे सलाह दी थी कि मैं अपनी कलम से लड़ूं। जेल से बाहर आने के बाद भी मैंने यह लड़ाई जारी रखी लेकिन यह कोशिश अभी अधूरी है, क्योंकि कुछ ही लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई है जबकि इसमें कई और लोग भी शामिल थे।”
उन्होंने कांग्रेस नेता कमल नाथ का नाम लेते हुए सवाल उठाया। निरप्रीत ने कहा, “कमल नाथ को क्यों बख्शा जा रहा है? उनके खिलाफ कोई मामला क्यों नहीं चलाया जा रहा? केंद्र सरकार को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।”
पीड़ितों के पुनर्वास को लेकर भी निरप्रीत कौर ने सरकारों पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, “जिन लोगों को अब तक एक बार भी नौकरी नहीं मिली है, उन्हें रोजगार और फ्लैट दिए जाने चाहिए। बहुत समय बीत चुका है और पीड़ितों का फिर से पुनर्वास किया जाना चाहिए।”
निरप्रीत कौर ने कहा कि सभी पीड़ितों का यही सोचना है। उन्होंने कहा, “मैं अपनी बात करूं तो, जब भी नवंबर आता है, लोग 1984 की वजह से हमें याद करते हैं लेकिन बाकी समय सब हमें भूल जाते हैं। हर कोई इस पर राजनीति कर रहा है; आज भी, यह सब सिर्फ राजनीति ही है।”
उन्होंने 1947 की हिंसा से तुलना करते हुए कहा, “अगर आप 1947 की हिंसा को देखें, तो वह कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर थी, फिर भी लोग आगे बढ़ गए और उनका पुनर्वास हो गया। 1984 के मामले में ऐसा क्यों नहीं हुआ क्योंकि हम, 1984 के दंगों के पीड़ित, दूसरों के लिए कमाई का जरिया बन गए हैं। हम एक तरह से ‘दुकान’ हैं, और वे ‘दुकानदार’ हैं।”
निरप्रीत कौर की मांग है कि 1 नवंबर को आधिकारिक तौर पर ‘काला दिवस’ घोषित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां 1984 के दर्द को याद रखें और पीड़ितों को न्याय व सम्मान मिल सके।
–आईएएनएस
एससीएच/पीएम
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