नई दिल्ली, 14 जुलाई (आईएएनएस)। सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद डॉ. जॉन ब्रिटास ने गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को पत्र लिखकर पुलिस के स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो (एसआईबी) की कथित एंटी-रेडिकलाइजेशन स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) की समीक्षा कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि मीडिया में सामने आई एसओपी की जानकारी सही है, तो इससे संविधान और नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
डॉ. ब्रिटास ने अपने पत्र में कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि वह आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बनने वाली गतिविधियों को रोके। इसके लिए मजबूत खुफिया तंत्र जरूरी है। लेकिन, ऐसी किसी भी कार्रवाई को संविधान, कानून के शासन और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के दायरे में रहकर ही किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मीडिया रिपोर्टों में सामने आए एसओपी के अंश चिंताजनक हैं। रिपोर्ट के अनुसार, एसओपी में ‘कट्टरपंथी व्यक्ति’ की पहचान के लिए कुछ व्यवहारिक संकेत बताए गए हैं। इनमें अचानक दाढ़ी रखना, नकाब पहनना, सामान्य बातचीत में अरबी शब्दों का इस्तेमाल करना, दुनिया में कहीं भी मुसलमानों से जुड़े घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया देना, धार्मिक कारणों से पढ़ाई या नौकरी छोड़ना, धार्मिक नेताओं से बार-बार मिलना और ‘संवेदनशील’ मानी गई मस्जिदों या मदरसों में जाना जैसे बिंदु शामिल बताए गए हैं।
डॉ. ब्रिटास ने कहा कि यदि ये बातें सही हैं, तो इससे धार्मिक पहचान और संविधान द्वारा संरक्षित सामान्य धार्मिक आचरण को पुलिस के शक का आधार बनाया जा सकता है, जो गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि एसओपी में सोशल मीडिया, ऑनलाइन मंचों, मैसेजिंग ऐप और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म की निगरानी, लोगों की प्रोफाइल तैयार करने, सामुदायिक नेटवर्क का नक्शा बनाने और धार्मिक संस्थानों व शिक्षकों की प्रोफाइलिंग जैसी बातों का भी उल्लेख बताया गया है। विश्वसनीय जानकारी के आधार पर गैरकानूनी गतिविधियों की निगरानी करना अलग बात है, लेकिन यदि किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान, पहनावे, भाषा या धार्मिक गतिविधियों के आधार पर निगरानी या प्रोफाइलिंग की जाती है, तो यह संविधान के तहत समानता, धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गरिमा और निजता के अधिकार से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करेगा।
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 25 और 26 नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों की गारंटी देते हैं। किसी भी नीति में इन अधिकारों का पूरा सम्मान होना चाहिए।
डॉ. ब्रिटास ने अपने पत्र में कहा कि संविधान और न्यायपालिका बार-बार स्पष्ट कर चुके हैं कि राज्य किसी समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह या सामूहिक संदेह के आधार पर कार्रवाई नहीं कर सकता। हर नागरिक का आकलन केवल विश्वसनीय सबूतों और गैरकानूनी गतिविधियों के आधार पर होना चाहिए, न कि उसके धर्म, पहनावे, भाषा, पहचान या धार्मिक आचरण के आधार पर। उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि यदि यह एसओपी वास्तव में लागू है, तो इसकी समीक्षा पूरी होने तक इसके अमल पर रोक लगाई जाए। एसओपी की जांच संवैधानिक विशेषज्ञों, वरिष्ठ विधि विशेषज्ञों और अनुभवी पुलिस अधिकारियों की एक स्वतंत्र समिति से कराई जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह पूरी तरह भारतीय संविधान और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप हो।
उन्होंने कहा कि जिन प्रावधानों से धर्म, धार्मिक गतिविधियों, पहनावे, भाषा, पहचान या अन्य संवैधानिक रूप से संरक्षित आधारों पर प्रोफाइलिंग या निगरानी की आशंका पैदा होती है, उन्हें हटाया जाए या संशोधित किया जाए। साथ ही सभी एंटी-रेडिकलाइजेशन उपाय केवल ठोस सबूत, गैरकानूनी या हिंसक गतिविधियों और विश्वसनीय खुफिया जानकारी के आधार पर ही लागू किए जाएं।
–आईएएनएस
एएमटी/एबीएम
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