सबरीमाला फैसले वाली पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बोला- ‘आपको इन मुद्दों से इतनी चिंता क्यों?’

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नई दिल्ली, 5 मई (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन के उस जनहित याचिका (पीआईएल) को दायर करने के अधिकार और इरादे पर सवाल उठाया, जिसके कारण सबरीमाला पर बहुचर्चित फैसला आया था। नौ जजों की संविधान पीठ ने बार-बार यह पूछा कि वकीलों के एक संगठन ने धार्मिक रीति-रिवाजों से जुड़े मामले में दखल देने का फैसला क्यों किया। सबरीमाला समीक्षा संदर्भ की सुनवाई करते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ए.जी. मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य…

नई दिल्ली, 5 मई (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन के उस जनहित याचिका (पीआईएल) को दायर करने के अधिकार और इरादे पर सवाल उठाया, जिसके कारण सबरीमाला पर बहुचर्चित फैसला आया था। नौ जजों की संविधान पीठ ने बार-बार यह पूछा कि वकीलों के एक संगठन ने धार्मिक रीति-रिवाजों से जुड़े मामले में दखल देने का फैसला क्यों किया।

सबरीमाला समीक्षा संदर्भ की सुनवाई करते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, अरविंद कुमार, ए.जी. मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल थे, ने याचिकाकर्ता संघ की ओर से पेश वकील रवि प्रकाश गुप्ता से तीखे सवालों की एक श्रृंखला पूछी।

“आप कौन हैं? आपको इन सब बातों से क्या लेना-देना है?” जस्टिस नागरत्ना ने पूछा, और बार-बार यह सवाल उठाया कि कोई ‘ज्यूरिस्टिक एंटिटी’ (कानूनी संस्था) पूजा के अधिकार का दावा कैसे कर सकती है या मंदिर की रीतियों को चुनौती कैसे दे सकती है।

“इससे क्या भला हुआ है?” जज ने आगे पूछा, और जिस तरीके से यह जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई थी, उस पर अपनी कड़ी नाराजगी जाहिर की।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि क्या संघ ने किसी औपचारिक प्रस्ताव के जरिए इस मुकदमे को अधिकृत किया था। जब वकील ने इस पहलू पर स्पष्टता की कमी जाहिर की, तो जस्टिस सुंदरेश ने टिप्पणी की कि यह मामला ‘कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के अलावा और कुछ नहीं’ लगता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि संघ के तत्कालीन अध्यक्ष, नौशाद अली, कथित तौर पर केवल ‘नाम के लिए अध्यक्ष’ थे, जिन्हें इस मुकदमे के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

जस्टिस सुंदरेश ने टिप्पणी की कि अगर वह इसमें सक्रिय रूप से शामिल होते, तो ‘वह यह जनहित याचिका दायर करने के लिए उपलब्ध नहीं होते।’

इस बात का ज़िक्र करते हुए कि यह जनहित याचिका अखबारों की रिपोर्टों और मंदिर की रीतियों से जुड़े दावों पर आधारित थी, सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि ऐसी सामग्री को ‘सीधे-सीधे खारिज कर दिया जाना चाहिए था।’

सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी आपत्तियां जाहिर कीं कि जो लोग किसी देवी-देवता में विश्वास नहीं रखते, वे धार्मिक रीतियों पर सवाल कैसे उठा सकते हैं। जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की कि जिन लोगों की किसी देवी-देवता में आस्था नहीं है, वे स्थापित ‘नियमों’ (रीतियों) को खत्म करने की कोशिश नहीं कर सकते; उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के प्रयासों को कोई संवैधानिक अदालत बढ़ावा नहीं दे सकती।

सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने यह तर्क दिया कि यह जनहित याचिका सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को चुनौती देने के लिए दायर की गई थी। उन्होंने उन पिछले हलफनामों और रिपोर्टों का हवाला दिया, जिनमें यह कहा गया था कि मंदिर के देवता महिलाओं के प्रवेश की अनुमति नहीं देते हैं।

वकील गुप्ता ने यह तर्क दिया कि इस तरह के दावे “नारीत्व का अपमान” हैं और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के विपरीत हैं। वकील ने आगे कहा कि जब इस मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया गया और 2018 में तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने इस पर फ़ैसला सुनाया, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला में प्रवेश की अनुमति दी गई थी, तो ‘लोकस’ (मामले में पक्षकार होने का अधिकार) का मुद्दा अपनी अहमियत खो चुका था।

एक मौके पर, सुप्रीम कोर्ट ने वकील गुप्ता को ऐतिहासिक दावों में न उलझने की भी चेतावनी दी; खासकर तब, जब उन्होंने यह दलील दी कि भगवान अयप्पा का मूल बौद्ध धर्म से जुड़ा हो सकता है। कोर्ट ने उनसे कहा कि वे अपनी दलीलें सख्ती से केवल कानूनी सवालों तक ही सीमित रखें।

पूरी सुनवाई के दौरान, 9 जजों वाली संविधान पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि वह 2018 के फैसले की तथ्यात्मक शुद्धता पर दोबारा विचार नहीं करेगी, और वकीलों से आग्रह किया कि वे केवल उन संवैधानिक मुद्दों पर ही बात करें, जिन्हें फैसले के लिए उनके सामने रखा गया है।

यह सुनवाई सबरीमाला फैसले से जुड़े उन बड़े संवैधानिक सवालों पर चल रही चर्चा का ही एक हिस्सा है, जिनके कारण 2018 के फैसले के बाद केरल में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। सुप्रीम कोर्ट इस समय धार्मिक स्वतंत्रता और अन्य मौलिक अधिकारों के बीच के आपसी संबंधों से जुड़े व्यापक सवालों की जांच कर रहा है; इनमें धार्मिक रीति-रिवाजों पर न्यायिक समीक्षा की सीमा और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों का दायरा जैसे मुद्दे शामिल हैं।

–आईएएनएस

एससीएच

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