गांधीनगर, 21 सितंबर (आईएएनएस)। गुजरात माटीकाम कलाकारी और ग्रामीण प्रौद्योगिकी संस्थान ने सोमवार को बताया कि इस महीने राज्य सरकार के सहयोग से आयोजित सात दिवसीय मेले में पूरे गुजरात में मिट्टी से बनी पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमाओं की 23,500 से ज्यादा मूर्तियां बिकीं, जिससे 361 रजिस्टर्ड कारीगरों को लगभग पांच करोड़ रुपए की कमाई हुई।
कॉटेज और ग्रामीण उद्योग विभाग के तहत संस्थान द्वारा 8 से 14 सितंबर तक आयोजित ‘माटी मूर्ति मेला-2026’ में अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत की पांच जगहों पर मिट्टी की 23,542 मूर्तियां बिकीं।
राज्य सरकार ने हिस्सा लेने वाले कारीगरों को ‘इस्तेमाल के लिए तैयार’ 186 टन मिट्टी दी और 100 प्रतिशत सब्सिडी के तहत मुफ्त में बिक्री के स्टॉल उपलब्ध कराए।
पांच जगहों में से अहमदाबाद के वस्त्रपुर स्थित अहमदाबाद हाट में सबसे ज्यादा कमाई हुई, जहां बिक्री 1.91 करोड़ रुपए से ज्यादा रही। सूरत के अदाजन में सबसे ज्यादा मूर्तियां बिकीं; यहां 7,920 मूर्तियों की बिक्री से 1.11 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई हुई।
वडोदरा के पारसी अगियारी मैदान में 79 स्टॉलों पर 85.77 लाख रुपए की बिक्री हुई जबकि साबरमती रिवरफ्रंट पर 124 स्टॉलों पर 77.99 लाख रुपए की बिक्री दर्ज की गई। अहमदाबाद के बोपल हस्तकला हाट में 30 स्टॉलों के जरिए 32.55 लाख रुपए की बिक्री हुई।
यह मेला राज्य सरकार की उन कोशिशों का हिस्सा है, जिनका मकसद गणेशोत्सव के दौरान प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) की मूर्तियों के विकल्प के तौर पर मिट्टी की मूर्तियों को बढ़ावा देना है।
राज्य सरकार के मुताबिक, 2014-15 तक गुजरात में गणेश की लगभग 90 प्रतिशत मूर्तियां पीओपी से बनती थीं। चूंकि पीओपी पानी में घुलता नहीं है और इससे जलीय जीवन और जल स्रोतों पर असर पड़ सकता है, इसलिए सरकार ने 2015-16 में ‘मिट्टी की मूर्ति बनाने वालों के लिए प्रोत्साहन योजना’ शुरू की।
इस योजना के तहत, रजिस्टर्ड कारीगरों को 50 प्रतिशत सब्सिडी वाली दर पर ‘इस्तेमाल के लिए तैयार’ मिट्टी मिलती है। साथ ही, मुफ्त बिक्री स्टॉल और मेले के लिए रोज़ाना 1,000 रुपए की मदद भी दी जाती है।
सरकार ने कहा कि पिछले दशक में लागू किए गए उपायों से पूरे राज्य में पीओपी की मूर्तियों के इस्तेमाल में कमी आई है।
इस पहल में शिक्षा से जुड़ा पहलू भी शामिल था, जिसके तहत 10 जिलों के 302 स्कूलों के 84,500 से ज्यादा छात्रों ने मिट्टी की मूर्ति बनाने के लाइव डेमो और खुद से करने वाली गतिविधियों में हिस्सा लिया। पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ के तहत ये कार्यक्रम आयोजित किए गए थे।
इस कार्यक्रम से उन कारीगर परिवारों की महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा हुए, जो घर पर मूर्तियां बनाने और उन्हें सजाने का काम करती हैं।
संस्थान ने कहा कि यह योजना कारीगरों को केवल आर्थिक मदद देने से कहीं आगे बढ़ गई है; इसका मकसद पारंपरिक हुनर और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के साथ-साथ लोगों की आजीविका में भी मदद करना है।
सरकार आने वाले सालों में भी ऐसे मेले जारी रखने की योजना बना रही है, ताकि आत्मनिर्भर गुजरात से आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को बढ़ावा दिया जा सके।
–आईएएनएस
डीकेएम/पीएम
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