New Dental Law in India: केंद्र सरकार ने हाल ही में नेशनल डेंटल कमीशन एक्ट 2023 को नोटिफाई कर दिया है, जो संसद से पारित होने के दो साल से अधिक समय बाद लागू हुआ। यह कानून डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह नई रेगुलेटरी संस्था नेशनल डेंटल कमीशन को स्थापित करेगा। इसकी संरचना काफी हद तक नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट 2019 के अनुरूप तैयार की गई है। इस नए कानून के लागू होने से देश में डेंटल एजुकेशन, ट्रेनिंग और प्रैक्टिस के गवर्नेंस में व्यापक बदलाव होंगे। हालांकि, राज्य स्तर पर भी इसके महत्वपूर्ण प्रभाव देखने को मिलेंगे।
डेंटल काउंसिल में बड़ा बदलाव, अब सरकार करेगी नियुक्ति
एक्ट के तहत स्टेट डेंटल काउंसिल (एसडीसी) को प्रांतीय स्तर की प्रमुख संस्था बनाए रखा गया है, लेकिन इसके संचालन में बड़ा बदलाव किया गया है। अब काउंसिल के प्रमुख का चुनाव नहीं होगा, बल्कि राज्य सरकार उन्हें नियुक्त करेगी। चुने हुए सदस्यों की संख्या भी नौ से घटाकर चार कर दी गई है, जबकि सरकारी नामांकित सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई है।
यह बदलाव इसलिए संभव हुआ क्योंकि अधिकांश डेंटल काउंसिल डेंटिस्ट्स एक्ट 1948 के तहत बनी थीं, जिसे अब नए कानून ने प्रतिस्थापित कर दिया है। इसके विपरीत, मेडिकल काउंसिल राज्य कानूनों के तहत संचालित होती हैं, जिससे उनमें चुने हुए प्रतिनिधियों की भूमिका अभी भी बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कानून डेंटल सेक्टर में पारदर्शिता, गुणवत्ता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन राज्य स्तर पर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व में कमी को लेकर बहस भी तेज हो सकती है।
अब डेंटल ग्रेजुएट्स को प्रैक्टिस के लिए नेशनल एग्जिट टेस्ट (नेक्स्ट) पास करना अनिवार्य
मौलाना आजाद डेंटल इंस्टिट्यूट (मेड्स) के डॉ. विक्रम मोहंती बताते हैं कि छात्रों और पेशेवरों के लिए इस कानून में कई अहम प्रावधान किए गए हैं। अब डेंटल ग्रेजुएट्स को प्रैक्टिस के लिए नेशनल एग्जिट टेस्ट (नेक्स्ट) पास करना अनिवार्य होगा। विदेशी डिग्री धारकों को भी यह परीक्षा देनी होगी। साथ ही, विदेशी नागरिकों को अस्थायी पंजीकरण की अनुमति दी गई है। एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान के तहत, कमीशन को निजी डेंटल कॉलेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटी की 50 प्रतिशत सीटों की फीस नियंत्रित करने का अधिकार मिलेगा।
यह कदम शिक्षा को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है। नए कानून में केंद्र स्तर पर भी राज्यों के प्रतिनिधित्व को सीमित किया गया है। जहां पहले हर राज्य और विश्वविद्यालय को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलता था, वहीं अब केवल सीमित संख्या में ही सदस्य शामिल होंगे। इसके अलावा, एनडीसी की स्वायत्त इकाइयों में राज्य काउंसिल की सीधी भागीदारी भी कम कर दी गई है।
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