नई दिल्ली, 26 सितंबर (आईएएनएस)। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का सबसे पवित्र समय माना जाता है। इन 16 दिनों में परिवार के सदस्य अपने पितरों की आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म करते हैं। मान्यता है कि इस दौरान किया गया दान और तर्पण सीधे पितरों तक पहुंचता है और उन्हें मोक्ष प्रदान करता है। देशभर में इसके लिए कई पवित्र स्थल हैं, लेकिन इनमें दो स्थानों का महत्व सबसे अलग है-अरुणाचल प्रदेश का परशुराम कुंड और कोलकाता का प्रिंसेप घाट।
अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में लोहित नदी के तट पर स्थित परशुराम कुंड एक अत्यंत पवित्र हिंदू तीर्थस्थल है। इसका संबंध भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम से है।
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान परशुराम ने अपने पिता ऋषि जमदग्नि के आदेश पर अपनी माता रेणुका का वध कर दिया था। पिता की आज्ञा का पालन करने से उनकी माता तो पुनर्जीवित हो गईं और उन्हें पितृ-भक्ति का वरदान मिला, लेकिन उन पर मातृ-हत्या का घोर पाप लग गया। इस पाप के कारण उनके हाथ से उनका परशु यानी कुल्हाड़ी चिपक गई।
देश के तमाम तीर्थों में भटकने के बाद जब वे लोहित नदी के इस कुंड में पहुंचे और यहां स्नान किया, तब उनके हाथ से वह कुल्हाड़ी छूट गई और वे पापमुक्त हो गए। इसी कारण इसे गंभीर पापों, विशेषकर माता-पिता और पूर्वजों से जुड़े दोषों से मुक्ति का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, परशुराम कुंड का जल अत्यंत दिव्य और शुद्ध है। पितृ पक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करने आते हैं। मान्यता है कि यहां तर्पण करने से पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष मिलता है। वैसे तो यहां साल भर श्रद्धालु आते हैं, लेकिन मकर संक्रांति पर यहां सबसे बड़ा मेला लगता है, जिसमें भारत और नेपाल से लाखों लोग पवित्र डुबकी लगाते हैं।
पितृ तर्पण के लिए पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित प्रिंसेप घाट और हुगली नदी के अन्य घाट भी बेहद प्रसिद्ध हैं। हुगली नदी गंगा की ही एक धारा है, इसलिए इसमें किया गया पिंडदान और तर्पण अत्यंत फलदायी माना जाता है।
पितृ पक्ष के 16 दिनों के दौरान यहां हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए जुटते हैं, लेकिन इसका सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण दिन पितृ पक्ष का अंतिम दिन यानी महालया अमावस्या होता है। इस दिन तड़के सुबह से ही हुगली नदी के घाटों पर जनसैलाब उमड़ पड़ता है। यहां की परंपरा बेहद अनोखी है।
लाउडस्पीकर पर ‘महिषासुरमर्दिनी’ चंडीपाठ की गूंज के बीच श्रद्धालु घुटनों तक नदी के पानी में खड़े होकर कुश, काले तिल, गंगाजल और सफेद फूलों से अपने पूर्वजों को तिलोदक अर्पित करते हैं। यही क्षण पितृ पक्ष की समाप्ति और देवी पक्ष यानी दुर्गा पूजा की शुरुआत का प्रतीक होता है।
प्रिंसेप घाट के अलावा बागबाजार घाट, निमतला घाट और हावड़ा के रामकृष्णपुर घाट पर भी पितृ पक्ष में प्रशासन द्वारा विशेष इंतजाम किए जाते हैं। यहां एक तरफ जहां आस्था का सैलाब दिखता है, वहीं दूसरी तरफ पितरों के प्रति कृतज्ञता और मोक्ष की कामना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
–आईएएनएस
एससीएच/वीसी
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