जगदलपुर, 13 जुलाई (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री मोदी ने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज को छत्तीसगढ़ के बस्तर की जनजातीय ढोकरा कला से बनी धातु की नाव उपहार स्वरूप भेंट किया है। बस्तर अंचल की सदियों पुरानी ढोकरा आर्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने से स्थानीय कारीगरों और इस कला से जुड़े व्यवसायियों में उत्साह का माहौल है।
जगदलपुर निवासी और बस्तर ढोकरा आर्ट के कारोबारी अनिल लुक्कड़ का कहना है कि बस्तर की यह पारंपरिक कला न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री को बस्तर की ढोकरा आर्ट से जुड़ा हस्तशिल्प उपहार स्वरूप भेंट किया जाना पूरे बस्तर के लिए सम्मान की बात है। इस पहल से बस्तर की पारंपरिक कला को वैश्विक पहचान मिलेगी और स्थानीय कारीगरों के लिए नए रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे।
अनिल लुक्कड़ ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा कि किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री को बस्तर की सदियों पुरानी कला उपहार में देना वास्तव में गर्व का विषय है। यह पहल बस्तर की पारंपरिक कला को पुनर्जीवित करने में भी अहम भूमिका निभाएगी। उन्होंने कहा कि भारत की अनेक पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रही हैं, ऐसे समय में प्रधानमंत्री द्वारा भारतीय हस्तशिल्प और लोक कलाओं को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाना सराहनीय प्रयास है।
अनिल लुक्कड़ ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय पारंपरिक कलाओं को उपहार के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जी-20 सम्मेलन के दौरान भी प्रधानमंत्री ने विभिन्न देशों से आए राष्ट्राध्यक्षों और प्रधानमंत्रियों को ढोकरा आर्ट सहित भारतीय हस्तशिल्प की अनूठी कृतियां भेंट कर सम्मानित किया था। इस तरह के पारंपरिक उपहार भारत की सांस्कृतिक विरासत की छाप विश्वभर में छोड़ते हैं और देशों के बीच आपसी संबंधों को मजबूत करने का प्रभावी माध्यम भी बनते हैं।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में बस्तर संभाग के सातों जिलों में 10 हजार से अधिक कारीगर ढोकरा आर्ट के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। हालांकि, एक समय ऐसा भी था जब लगभग 15 हजार लोग इस कला से अपना जीवनयापन करते थे, लेकिन बाजार और मांग की कमी के कारण धीरे-धीरे कई कारीगर इस पेशे से दूर हो गए। अब परिस्थितियां बदल रही हैं और लोग फिर से इस पारंपरिक कला के महत्व को समझने लगे हैं। उनका विश्वास है कि प्रधानमंत्री की पहल के बाद इस कला के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ा है और कई कारीगर दोबारा इस व्यवसाय से जुड़ रहे हैं।
अनिल लुक्कड़ ने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा ‘वोकल फॉर लोकल’ को लगातार बढ़ावा दिए जाने से ग्रामीण स्तर के कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल रहा है। इससे न केवल हस्तशिल्प उत्पादों की मांग बढ़ रही है, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी तैयार हो रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में ढोकरा आर्ट को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में और अधिक पहचान मिलेगी, जिससे बस्तर के कारीगरों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।
उन्होंने ऑस्ट्रेलिया को उपहार में दी गई ढोकरा आर्ट में नौका की प्रतीकात्मकता का भी उल्लेख किया। कारोबारी ने कहा कि नौका सदियों से लोगों को एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुंचाने का माध्यम रही है। आज वैश्विक परिदृश्य में भी यह भाईचारे, सहयोग और आपसी जुड़ाव का प्रतीक बन सकती है। उनका मानना है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मित्रता और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने के संदेश के रूप में यह उपहार विशेष महत्व रखता है।
–आईएएनएस
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