सरकार बनाने के दावे को लेकर विजय दो बार राज्यपाल से मिल चुके हैं, मगर विजय के पूरा बहुमत नहीं जुटा पाने के चलते उनकी शपथ टाल दी गई है. अब यह एक राजनीतिक बहस बनती जा रही है. राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर के शपथ न दिलाने के इस कदम के बाद राज्यपाल के विशेषाधिकार और जनता के जनादेश के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है. यहां यह समझना जरूरी है कि इस तरह के फंसी पेचीदिगियों पर नियमावली क्या कहती है? क्या राज्यपाल शपथ दिलाने से रोक सकते हैं. वहीं उन मामलों का रुख भी करेंगे जो सुप्रीम कोर्ट के सामने आए तो सुप्रीम कोर्ट ने इन पर कैसे फैसले सुनाए.
कहां फंसा है पेंच?
पहले आप चुनावी सिनेरियो समझिये. बता दें राज्य में कुल 234 सीटें हैं, बहुमत के लिए 118 का जादुई आंकड़ा छूना होता है, यानी जिसके पास यह आंकड़ा है वह सरकार बनाएगी. आमतौर पर चुनाव के बाद यह परम्परा रही है कि कोई भी बड़ा दल हो, जो अधिकतर सीटें लाया हो वह सरकार बनाने का दावा पेश करती है, उसके बाद उस पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है और सदन के पटल पर अपना बहुमत साबित करने का मौका दिया जाता है.
खबरों के अनुसार, राज्यपाल अर्लेकर ने शपथ दिलाने से पहले विजय से कम से कम 118 विधायकों (बहुमत के आंकड़े) के समर्थन का सबूत पेश करने को कहा है, जिसके कारण शपथ ग्रहण में देरी हो रही है.
अब आते हैं शक्तियों पर
इस मामले में राज्यपाल की भूमिका को लेकर संविधान के अनुच्छेद 164 में जानकारी दी गई है. संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार, मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी. अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल ही करेंगे. अपनी इस शक्ति का इस्तेमाल करते हुए राज्यपाल उस पार्टी को बुलाते हैं जिसे जनता का जनादेश मिला हो और जो सरकार बनाने का दावा पेश करती हो.
क्या है अनुच्छेद 164, पढ़िए –
(1) मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा तथा मंत्री, राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपने पद धारण करेंगेः
परंतु 1[छत्तीसगढ़, झारखंड,] मध्य प्रदेश और 2[ओडिशा] राज्यों में जनजातियों के कल्याण का भारसाधक एक मंत्री होगा जो साथ ही अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्गों के कल्याण का या किसी अन्य कार्य का भी भारसाधक हो सकेगा।
3[(1क) किसी राज्य की मंत्रि-परिषद् में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या के पंद्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी:
परंतु किसी राज्य में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की संख्या बारह से कम नहीं होगी:
परंतु यह और कि जहाँ संविधान (इक्यानवेवाँ संशोधन) अधिनियम, 2003 के प्रारंभ पर किसी राज्य की मंत्रि-परिषद् में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या, यथास्थिति, उक्त पंद्रह प्रतिशत या पहले परंतुक में विनिर्दिष्ट संख्या से अधिक है वहाँ उस राज्य में मंत्रियों की कुल संख्या ऐसी तारीख से, जो राष्ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा नियत करे, छह मास के भीतर इस खंड के उपबंधों के अनुरूप लाई जाएगी।
(1ख) किसी राजनीतिक दल का किसी राज्य की विधान सभा का या किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का जिसमें विधान परिषद् है, कोई सदस्य जो दसवीं अनुसूची के पैरा 2 के अधीन उस सदन का सदस्य होने के लिए निरर्हित है, अपनी निरर्हता की तारीख से प्रारंभ होने वाली और उस तारीख4 तक जिसको ऐसे सदस्य के रूप में उसकी पदावधि समाप्त होगी या जहाँ वह, ऐसी अवधि की समाप्ति के पूर्व, यथास्थिति, किसी राज्य की विधान सभा के लिए या विधान परिषद् वाले किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन के लिए कोई निर्वाचन लड़ता है उस तारीख तक जिसको वह निर्वाचित घोषित किया जाता है, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, की अवधि के दौरान, खंड (1) के अधीन मंत्री के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए भी निरर्हित होगा।]
(2) मंत्रि-परिषद् राज्य की विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी।
(3) किसी मंत्री द्वारा अपना पदग्रहण करने से पहले, राज्यपाल तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूपों के अनुसार उसको पद की और गोपनीयता की शपथ दिलाएगा।
(4) कोई मंत्री, जो निरंतर छह मास की किसी अवधि तक राज्य के विधान-मंडल का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा।
(5) मंत्रियों के वेतन और भत्ते ऐसे होंगे जो उस राज्य का विधान-मंडल, विधि द्वारा, समय-समय पर अवधारित करे और जब तक उस राज्य का विधान-मंडल इस प्रकार अवधारित नहीं करता है तब तक ऐसे होंगे जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं।
इसके बाद राज्यपाल मनोनीत मुख्यमंत्री को पद की शपथ दिलाने का समय तय करते हैं। विधायकों को शपथ दिलाने और फ्लोर टेस्ट (शक्ति परीक्षण) कराने के लिए आमतौर पर चुने गए विधायकों में से सबसे वरिष्ठ सदस्य को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किया जाता है।
ऐसे मामलों में क्या रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में सबसे बड़ी पार्टी को बुलाने की परंपरा का समर्थन किया है. राजभवनों के राजनीतिक रुख को देखते हुए विपक्षी दल अक्सर सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाते रहे हैं।
एस.आर. बोम्मई केस (1994): बहुमत साबित करने वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट का एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) फैसला बहुत बड़ा माना जाता है. नौ जजों की संविधान पीठ ने इस फैसले में स्पष्ट किया था कि किसी भी सरकार या मुख्यमंत्री के पास बहुमत है या नहीं, इसका फैसला राजभवन में राज्यपाल की व्यक्तिगत राय के आधार पर नहीं किया जा सकता. बहुमत का एकमात्र और अंतिम परीक्षण केवल ‘सदन के पटल’ पर ही होना चाहिए. इस लिहाज से टीवीके प्रमुख विजय का मामला भी इसी कानूनी बहस के दायरे में आता है कि क्या राज्यपाल शपथ से पहले बहुमत का सबूत मांग सकते हैं या उन्हें शपथ दिलाकर सदन में बहुमत साबित करने का मौका देना चाहिए.
2018 में कर्नाटक संकट : मामला 2018 का है जब राज्यपाल वजुभाई वाला ने चुनाव के बाद कांग्रेस और जेडी(एस) के गठबंधन को दरकिनार करते हुए सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी पहले न्योता दिया. भाजपा को 15 दिन के भीतर बहुमत साबित करने का कहा. इस मामले में देर रात सुनवाई हुई. तब के सीजेआई दीपक मिश्रा ने बी.एस. येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से तो इनकार कर दिया था, लेकिन विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंकाओं के चलते फ्लोर टेस्ट का समय घटाकर 36 घंटे कर दिया था. भाजपा बहुमत साबित नहीं कर पाई और सरकार जेडीएस कांग्रेस गंठबंधन की बन गई.अंततः बीजेपी बहुमत साबित नहीं कर पाई और कांग्रेस-जेडी(एस) गठबंधन ने सरकार बनाई।
उत्तराखंड संकट : यह मामला काफी विवादास्पद रहा. मई 2016 में भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली थी. तब सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट को ‘अंतिम’ विकल्प माना था और तत्कालीन कांग्रेस सीएम हरीश रावत को सदन में अपना बहुमत साबित करने का सीधा निर्देश दिया था.


Download Android App
Download iOS App




