गरुड़ पुराण के अनुसार, गर्भ के अंदर आत्मा पूरी तरह होश में रहती है। उसे अपने पिछले जन्मों की बातें, अपनी पुरानी गलतियां और उनसे मिली सीख साफ-साफ याद रहती हैं। वह गर्भ में शांत रहकर ईश्वर का ध्यान करती है और नए जीवन के लिए खुद को तैयार करती है। लेकिन एक नए शरीर और दुनिया में आना उसके लिए बिल्कुल भी आसान नहीं होता।
बच्चे के रोने की वजह (Newborn First Cry Garuda Purana)

गरुड़ पुराण के अनुसार, गर्भ से बाहर आने का समय आत्मा के लिए बेहद दर्दनाक होता है। जैसे ही बच्चा बाहर आता है, उसे अचानक एक गहरा झटका लगता है। यह पल आत्मा के लिए इतना कष्टदायक होता है कि वह सह नहीं पाती।
मां के गर्भ का सुरक्षित वातावरण और ईश्वर का ध्यान पल भर में छूट जाता है। बाहर आते ही आत्मा खुद को अकेली, भटकी हुई और ईश्वर से दूर महसूस करती है। यह सिर्फ सांसारिक जन्म नहीं, बल्कि परमात्मा से अलग होने का दुख है। इसीलिए शिशु का पहली बार रोना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि इसी दुख का नतीजा होता है।
‘माया’ का असर और यादों का मिटना
शास्त्रों के अनुसार, जन्म लेते ही शिशु पर ‘माया’ यानी सांसारिक भ्रम का असर शुरू हो जाता है। विष्णु पुराण में लिखा है कि यह माया इतनी ताकतवर होती है कि आत्मा अपने पिछले जन्म की सारी बातें, ज्ञान और अनुभव तुरंत भूल जाती है।
भूलने की यह प्रक्रिया क्यों जरूरी है?
अतीत की सारी यादें और ज्ञान एक ही झटके में गायब हो जाते हैं। यही प्रकृति का नियम है। अगर इंसान अपने पिछले जन्मों की बातें याद रखेगा, तो उसके लिए नया जीवन जीना और आगे बढ़ना बहुत मुश्किल हो जाएगा।
बच्चे की पहली चीख का असली मतलब

विज्ञान मानता है कि बच्चे का रोना उसके फेफड़ों को चालू करने के लिए जरूरी है, और यह सच भी है। लेकिन धर्म के ज्ञाता इसे आत्मा की उलझन, डर और सब कुछ खो देने के दर्द के रूप में देखते हैं। जन्म से ठीक पहले तक आत्मा को सब कुछ याद था, लेकिन जन्म लेते ही सब कुछ खाली हो जाता है। इस अचानक आए खालीपन से आत्मा घबरा जाती है। बच्चे की पहली चीख उसी ना कह पाने वाले दर्द है। यह केवल एक नए जीवन की शुरुआत नहीं, बल्कि पुराने ज्ञान के खत्म होने का शोक भी है।



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