Prateek Yadav Death : 38 साल की उम्र में समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के बेटे प्रतीक यादव की मौत हो गई है. प्रतीक यादव की मौत ने उत्तर प्रदेश में राजनीतिक हलचल मचा दी है. प्रतीक यादव की अचानक हुई मौत ने न केवल यादव परिवार को, बल्कि उन तमाम चाहने वालों को झकझोर कर रख दिया है.
मगर प्रतीक यादव से जुड़ा एक अहम किस्सा है जिसने साल 2007 में भी राजनीतिक भूचाल ला दिया था. जिसने भारतीय राजनीति के सबसे बड़े रहस्य से पर्दा उठा दिया था.
राज्य में बहुजन राजनीति चरम पर
यह वो समय था जब राज्य में दो राजनीतिक ताकतें बड़ी थीं. एक समाजवादी पार्टी और दूसरी बहुजन समाज पार्टी. राज्य में तब बहुजन राजनीति केंद्र में थी और मुलायम सिंह यादव राज्य के प्रोमिनेंट फिगर थे. हालांकि तब तक यह था कि मुलायम सिंह यादव का वंश यानी परिवार अखिलेश यादव के नाम से सामने था.
मगर किसी को यह नहीं पता था कि अखिलेश के अलावा मुलायम का एक और चिराग है, जो राजनीति व चर्चाओं की चर्चाओं से बहुत दूर था. हालाँकि यह वो साल था जब इस राज से पर्दा हमेशा हमेशा के लिए उठने वाला था और एक कबूलनाम होने वाला था जो मुलायम सिंह को करना था.
कैसा हुआ उजागर
साल 2007. इस दौरान UP की सियासत चरम पर थी. मुलायम सिंह यादव को आय से अधिक संपत्ति (DA Case) के एक मामले ने परेशां कर दिया था. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, विश्वनाथ चतुर्वेदी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी से उनके परिवार का पूरा ब्योरा मांगा था.
यही वो समय था जब कानूनी शिकंजा नेताजी पर कसने लगा था. इसी मामले में एक ऐसा हलफनामा दाखिल हुआ, जिसने पूरे देश को चौंका दिया. हलफनामे में मुलायम सिंह यादव द्वारा पहली बार आधिकारिक तौर पर साधना गुप्ता को उनकी पत्नी और प्रतीक यादव को उनके बेटे के रूप में स्वीकार किया गया था. यह एक पिता का सार्वजनिक कुबूलनामा था जिसने प्रतीक को समाज में उनकी असली पहचान और यादव खानदान में उनका हक दिलाया.
पुराने रिकोर्ड्स
मीडिया रिपोर्ट्स और उस वक्त के दस्तावेजों की मानें तो प्रतीक के स्कूल सर्टिफिकेट्स और अन्य कागजातों में पिता के नाम की जगह पहले ‘चंद्र प्रकाश गुप्ता’ दर्ज था. चंद्र प्रकाश गुप्ता साधना गुप्ता के पहले पति थे.
बताया जाता है कि इसके बाद मुलायम सिंह यादव ने इस स्थिति को बदलने के लिए कानूनी रास्ता अपनाया. उन्होंने लखनऊ के पास के एक गांव के ‘म्यूटेशन रिकॉर्ड्स’ में बदलाव करवाया और प्रतीक को कानूनी रूप से अपना नाम दिया.
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