What is Delimitation: भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में जैसे-जैसे देश की आबादी बढ़ती है, वैसे-वैसे चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को नए सिरे से निर्धारित करना जरूरी हो जाता है। इस दौरान यह तय किया जाता है कि किस क्षेत्र से कितने प्रतिनिधि चुने जाएंगे। इसी प्रक्रिया को ‘परिसीमन’ कहा जाता है। हाल के समय में केंद्र सरकार ने 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों में बदलाव की दिशा में कदम उठाए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में ‘परिसीमन आयोग’ की अहम भूमिका होती है।
What is Delimitation: परिसीमन आयोग क्या है और कैसे बनता है

- परिसीमन आयोग एक स्थायी संस्था नहीं होती, बल्कि इसे समय-समय पर बनाया जाता है।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार, हर जनगणना के बाद संसद एक परिसीमन कानून बना सकती है।
- इसके बाद राष्ट्रपति इस आयोग का गठन करते हैं। इस आयोग का नेतृत्व आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज करते हैं।
- इसके अलावा इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके द्वारा नियुक्त अधिकारी और संबंधित राज्यों के चुनाव आयुक्त सदस्य होते हैं।
- इस तरह की संरचना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सीमाओं के निर्धारण में किसी तरह का राजनीतिक दबाव न हो और प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे।
अदालत में क्यों नहीं दे सकते चुनौती?
- परिसीमन आयोग की सबसे खास बात यह है कि इसके फैसलों को आमतौर पर अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- संविधान के अनुच्छेद 329(a) के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि चुनाव क्षेत्रों के निर्धारण या सीटों के बंटवारे से जुड़े मामलों में अदालत दखल नहीं दे सकती।
- जब आयोग अपनी सिफारिशें तैयार करता है, तो उन्हें सरकारी राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है।
- इसके बाद ये सिफारिशें कानून का रूप ले लेती हैं। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट भी इन मामलों में सीधे हस्तक्षेप नहीं करता।
What is Delimitation: फैसलों को अंतिम रखने का कारण

- परिसीमन आयोग के फैसलों को अंतिम मानने के पीछे एक व्यावहारिक सोच है।
- अगर हर फैसले को अदालत में चुनौती दी जाने लगे, तो चुनाव प्रक्रिया में भारी देरी हो सकती है।
- इससे देश में समय पर चुनाव कराना मुश्किल हो जाएगा। इ
- सलिए संविधान निर्माताओं ने इस आयोग को काफी शक्तियां दी हैं, ताकि उसके फैसले तुरंत लागू हो सकें और चुनाव बिना किसी बाधा के संपन्न हो सकें।
- आयोग की रिपोर्ट संसद या विधानसभाओं के सामने रखी जरूर जाती है, लेकिन उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।
न्यायपालिका की सीमित भूमिका
- हालांकि आमतौर पर अदालतें परिसीमन के मामलों में दखल नहीं देतीं, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में यह संभव है।
- यदि कोई फैसला पूरी तरह मनमाना हो या संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हो, तो न्यायपालिका उसकी समीक्षा कर सकती है।
- हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत दिया है कि वह पूरी तरह से हाथ बांधकर नहीं बैठा है।
- लेकिन यह हस्तक्षेप बहुत ही दुर्लभ मामलों में ही किया जाता है।
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