अयोध्या में बाबरी विध्वंस के करीब 28 साल पुराने मामले में सीबीआई की विशेष अदालत बुधवार को ऐतिहासिक फैसला सुनायेगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार सीबीआई कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर 2 सितंबर से अपना निर्णय लिखवाना शुरू कर दिया। सभी की नजरें सीबीआई कोर्ट के फैसले पर टिकी हैं।
वर्ष 1992 में विवादित ढांचे के विध्वंस के मामले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, साध्वी ऋतंबरा,विनय कटियार,राम विलास वेंदाती के अलावा श्रीरामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष नृत्य गोपाल दास समेत सभी 32 आरोपियों के बयान 31 अगस्त तक दर्ज किये जा चुके हैं। सभी आरोपियों ने खुद को निर्दोष बताते हुये साजिश के तहत फंसाने की दलील दी है।
इस मामले में भाजपा, शिवसेना व विहिप के वरिष्ठ नेताओं के साथ साधु-संत भी आरोपित हैं। 28 साल बाद आने जा रहे फैसले से पहले ही 18 आरोपियों की मौत हो चुकी है। इसी बीच मस्जिद विध्वंस मामले में अभियुक्त कुछ वरिष्ठ राजनीतिक नेता कोर्ट में पेशी से छूट की मांग कर सकते हैं।
कानून कहता है कि फैसले के दिन सभी आरोपियों को अदालत में शारीरिक रूप से उपस्थित होना चाहिए। लेकिन 32 में से कुछ आरोपी जैसे जिनमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे आदि लोग कोरोना महामारी और उम्र का हवाला देते हुए अदालत से वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए जुड़ने की मांग कर सकते हैं।
अदालत ने फैसले के समय सभी आरोपियों को उपस्थित रहने को कहा है हालांकि कोरोना संक्रमण से जूझ रही सुश्री उमा भारती इस मामले में सीबीआई अदालत के फैसले के समय मौजूद नहीं होंगी। उन्होने पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को चिट्ठी लिख कर कहा है ‘‘30 सितंबर को सीबीआई की विशेष अदालत मे मुझे फैसला सुनने के लिए पेश होना है। मैं कानून को वेद, अदालत को मंदिर और जज को भगवान मानती हूं, इसलिए अदालत का हर फैसला मेरे लिए भगवान का आशीर्वाद होगा।’’
उन्होंने लिखा ‘‘ मैं नहीं जानती फैसला क्या होगा मगर मैं जमानत नहीं लूंगी। जमानत लेने से आंदोलन मे भागीदारी की गरिमा कलंकित होगी। ऐसे हालातों में आप नई टीम में रख पाते हैं कि नहीं इस पर विचार कर लीजिए। यह मैं आपके विवेक पर छोड़ती हूं। मैं हमेशा कहती आयी हूं कि अयोध्या के लिए मुझे फांसी भी मंजूर है।’’ उधर डा वेंदाती ने कहा कि वर्ष 1968 में अयोध्या आने के बाद उन्होने विवादित परिसर में किसी को नमाज पढ़ते नहीं देखा। अदालत उन्हें उम्रकैद या फांसी की सजा देता है तो इससे बड़ बड़ सौभाज्ञ नहीं होगा।
गौरतलब है कि छह दिसंबर 1992 में राम जन्मभूमि परिसर में स्थित विवादित ढांचे को लाखों कारसेवकों ने ढहा दिया था। मंदिर निर्माण के लिए लाखों कारसेवक अयोध्या पहुंचे थे। बाबरी विध्वंस मामले को लेकर मुस्लिम पक्षकारों ने ढांचा गिराए जाने को लेकर याचिका दाखिल की। इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले लोगों को आरोपी बनाया गया। लंबे समय तब चली सुनवाई के बाद यह मामला को सीबीआई की अदालत में पहुंचा।


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