नई दिल्ली, 27 अगस्त (आईएएनएस)। भारत में आईएसआई से संबंधित विभिन्न गतिविधियों की जांच में पता चला है कि कई ऐसे गुप्त संगठन उभरे हैं, जिनका उद्देश्य मुख्य आतंकी समूह को संरक्षण देना है।
उदाहरण के लिए प्रतिरोध मोर्चा लश्कर-ए-तैयबा का एक मुखौटा संगठन है। इसे आईएसआई ने लश्कर-ए-तैयबा को हर हमले के बाद जिम्मेदारी से बचने का बहाना देने के लिए बनाया था। इसी तरह, नए भर्ती मॉड्यूल भी अन्य मुख्तार संगठनों के नाम पर गतिविधियां चला रहे हैं।
शहजाद भट्टी का नेटवर्क तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान (टीटीएच) के बैनर तले काम करता था। टीटीएच एक अस्तित्वहीन संगठन है और यह नाम आईएसआई ने भट्टी नेटवर्क को छिपाने के लिए गढ़ा था। टीटीएच नाम गढ़ने का दूसरा कारण इसे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से जोड़ना था, जिसने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर कहर बरपाया था।
आईएसआई यह जताना चाहता है कि टीटीएच और टीटीपी आपस में जुड़े हुए हैं और पाकिस्तान में टीटीपी द्वारा की जाने वाली गतिविधियों में भारत की भूमिका है।
खुफिया ब्यूरो के एक अधिकारी ने कहा कि इस तरह के गुप्त संगठन न केवल लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद जैसे प्रतिबंधित आतंकी समूहों को अपनी संलिप्तता साबित करने का बहाना देने के लिए बनाए जाते हैं। भारतीय एजेंसियों के पास इन समूहों का कोई रिकॉर्ड नहीं है और न ही गृह मंत्रालय ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के प्रावधानों के तहत इन पर प्रतिबंध लगाया है।
अधिकारी ने बताया कि इससे भारतीय एजेंसियों के लिए ऐसे गुप्त संगठनों की जानकारी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और इंटरपोल को देना मुश्किल हो जाता है। हाल के हफ्तों में ऐसे कई संगठन सक्रिय हो गए हैं। टीटीएच के अलावा, यूनाइटेड सिख ब्रदरहुड (यूएसबी), सिख टाइगर्स ऑफ खालिस्तान (एसटीके), खालिस्तान आर्म्ड फोर्स (केएएफ), शेर-ए-पंजाब ब्रिगेड (एसपीबी), पंजाब सॉवरेनिटी अलायंस (पीएसए) और खालिस्तान लिबरेशन आर्मी (केएलए) जैसे संगठन भी सक्रिय हैं।
एक अधिकारी ने कहा कि ये सभी संगठन अस्तित्वहीन हैं। अधिकारी ने बताया कि ये जैश-ए-मोहम्मद, बब्बर खालसा इंटरनेशनल (बीकेआई) और शहजाद भट्टी नेटवर्क जैसे अन्य सभी खालिस्तानी आतंकी समूहों के मुखौटे हैं।
एक अन्य अधिकारी ने कहा कि यह सर्वविदित तथ्य है कि ऐसे नाम क्यों चर्चा में हैं। अंततः भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वाले असली संगठन का नाम सामने आ जाएगा।
अधिकारी ने कहा कि संबंध प्रगाढ़ होने में समय लगता है। जांच में देरी होती है और इससे अभिभावक समूह को फिर से संगठित होने और रणनीति पर पुनर्विचार करने का समय मिल जाता है।
अधिकारियों का कहना है कि ऐसे संगठनों का पर्दाफाश करना और उनके मूल आतंकी समूह की जल्द से जल्द पहचान करना महत्वपूर्ण है। आईएसआई की संलिप्तता वाले ऐसे मामलों में अधिकांश ऑपरेटिव विदेश में होते हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को शामिल करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
अधिकारियों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र या अमेरिका द्वारा ऐसे संगठनों पर प्रतिबंध लगाने के लिए, पहले भारत में इन्हें प्रतिबंधित करना और अदालतों में आरोप पत्र दाखिल करना आवश्यक है। हालांकि, अगर जांचकर्ता ऐसे संगठनों के पीछे छिपे मूल संगठन का शीघ्र पता लगा लेते हैं, तो दोषी को सजा दिलाना और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान इस ओर आकर्षित करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। अधिकारी प्रतिरोध मोर्चा का उदाहरण देते हैं।
एजेंसियों को यह पता चलने में कई महीने लग गए कि यह लश्कर-ए-तैयबा का एक मुखौटा संगठन है। इसके बाद गृह मंत्रालय ने प्रतिरोध मोर्चे को प्रतिबंधित सूची में डाल दिया।
हाल ही में अमेरिका ने भी इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया है। एक अधिकारी ने बताया कि पाकिस्तान काल्पनिक संगठनों के नए-नए नाम गढ़ता रहेगा और आगे चलकर यह भारतीय एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा।
–आईएएनएस
एसएचके/डीएससी
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