Marco Rubio on FCRA Bill: भारत द्वारा लाए जा रहे FCRA संशोधन बिल पर हाल ही में अमेरिका के कई सांसदों ने विरोध जताया था। लेकिन अब अमेरिका ने अपनी विदेशी सहायता (Foreign Aid) नीति में बड़ा बदलाव करने का फैसला लेते हुए भारत के हक में अपना समर्थन जताया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि अब अमेरिका दूसरे देशों की मदद के लिए धन गैर-सरकारी संगठनों (NGO) के जरिए नहीं, बल्कि सीधे संबंधित देशों की सरकारों को देगा। उनका मानना है कि यदि किसी देश का विकास करना उद्देश्य है, तो सहायता सीधे उसी देश तक पहुंचनी चाहिए।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रुबियो ने कहा कि कई बार सहायता राशि बीच में काम करने वाले संगठनों के पास चली जाती है, जिससे उसका पूरा लाभ जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पाता। उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी सहायता किसी विचारधारा को बढ़ावा देने या किसी संगठन के कारोबार का हिस्सा नहीं बननी चाहिए। अमेरिकी सरकार का कहना है कि इस नई नीति का उद्देश्य विदेशी सहायता को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाना है। सरकार चाहती है कि सहायता राशि का सही उपयोग हो और उसका सीधा फायदा संबंधित देश के लोगों को मिले। इसी वजह से अब धन सीधे राष्ट्रीय सरकारों को देने की योजना बनाई गई है।
भारत में FCRA नियमों पर बढ़ी हलचल
अमेरिका की इस घोषणा के बीच भारत भी विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों को और सख्त बनाने की तैयारी कर रहा है। केंद्र सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA में बदलाव लाने पर काम कर रही है। सरकार का कहना है कि इन नए नियमों का उद्देश्य विदेश से आने वाले धन पर बेहतर निगरानी रखना और पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना है।
FCRA कानून के तहत विदेश से मिलने वाले चंदे का इस्तेमाल करने वाले गैर-सरकारी संगठन, धार्मिक संस्थाएं और अन्य संस्थानों को निर्धारित नियमों का पालन करना होता है। सरकार का मानना है कि इससे राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने और विदेशी फंड के सही उपयोग को सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
अमेरिकी सांसद राइली मूर ने जताई थी चिंता
संसद के मानसून सत्र के दौरान FCRA संशोधन विधेयक को लेकर भी चर्चा तेज रही। इस दौरान कुछ विदेशी नेताओं और अमेरिकी सांसदों ने भी इस प्रस्तावित कानून पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। उनके बयानों के बाद भारत में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस और बढ़ गई। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने FCRA संशोधन पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि भारत में ईसाई समुदाय का इतिहास काफी पुराना है और प्रस्तावित बदलावों का असर धार्मिक संस्थाओं के संचालन पर पड़ सकता है। उन्होंने दावा किया कि अगर यह संशोधन मौजूदा स्वरूप में लागू होता है तो इससे धार्मिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर असर पड़ेगा
राइली मूर ने यह भी कहा था कि इस तरह के कदम भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों पर असर पड़ सकता है। लेकिन भारत सरकार की ओर से लगातार यह कहा गया है कि FCRA में किए जा रहे बदलाव केवल पारदर्शिता बढ़ाने, विदेशी फंड के उपयोग की निगरानी मजबूत करने और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हैं। सरकार का कहना है कि इन नियमों का मकसद किसी विशेष समुदाय या संस्था को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सभी पर समान नियम लागू करना है।
FCRA बिल क्या है और इसे लेकर क्यों मचा है राजनीतिक घमासान?
FCRA यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक ऐसा प्रस्तावित कानून है, जिसके जरिए विदेश से फंड लेने वाले गैर-सरकारी संगठन (NGO), ट्रस्ट और अन्य संस्थाओं से जुड़े नियमों में बदलाव किया जाएगा। सरकार का कहना है कि इस संशोधन से विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ेगी और अवैध तरीके से आने वाले पैसों पर रोक लगाई जा सकेगी। वहीं विपक्ष का आरोप है कि इससे सरकार का NGO पर काट्रॉल पहले से अधिक बढ़ जाएगा। इसी वजह से इस बिल को लेकर संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक तीखी बहस देखने को मिल रही है।
केंद्र सरकार इस संशोधन विधेयक को गृह मंत्रालय के माध्यम से संसद में पेश करने की तैयारी कर रही है। इसका उद्देश्य FCRA अधिनियम, 2010 में जरूरी बदलाव करना है ताकि विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों को और मजबूत बनाया जा सके। सरकार का मानना है कि इससे विदेशी धन के इस्तेमाल पर बेहतर निगरानी रखी जा सकेगी और नियमों का पालन सुनिश्चित होगा।
FCRA कानून का उद्देश्य क्या है?
FCRA कानून का मुख्य उद्देश्य विदेश से मिलने वाले चंदे और आर्थिक सहायता पर निगरानी रखना है। सरकार चाहती है कि विदेशी फंड का उपयोग देश की सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक हित के खिलाफ न हो। साथ ही NGO, ट्रस्ट, सोसायटी और अन्य संस्थाओं को मिलने वाली विदेशी फंडिंग का पूरा रिकॉर्ड और उसकी निगरानी सुनिश्चित की जा सके।
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