सोल, 6 अगस्त (आईएएनएस)। राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने उत्तर कोरिया के साथ संयम बरतने की सलाह दी थी। इसके बाद दक्षिण कोरिया के एकीकरण मंत्रालय ने गुरुवार को साफ किया कि सरकार उत्तर कोरिया के साथ संवाद और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति से पीछे नहीं हट रही है। मंत्रालय का कहना है कि परिस्थितियां भले ही कठिन हों, लेकिन कोरियाई प्रायद्वीप पर शांति की दिशा में छोटे-से-छोटे अवसर तलाशने की कोशिश जारी रहेगी।
योनहाप न्यूज एजेंसी ने बताया कि मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि राष्ट्रपति के संदेश को ध्यान में रखते हुए वह उत्तर कोरिया के साथ विश्वास बहाली और रिश्तों में सुधार के प्रयास जारी रखेगा। बयान में कहा गया, “यदि दोनों पक्ष पहल ही नहीं करेंगे, तो संबंधों में किसी तरह की प्रगति संभव नहीं होगी, इसलिए चुनौतीपूर्ण हालात के बावजूद संवाद के रास्ते खुले रखना जरूरी है।”
दरअसल, एक दिन पहले हुई सरकारी नीति समीक्षा बैठक में राष्ट्रपति ली ने मंत्रालय की कुछ नई पहलों पर संयम बरतने की सलाह दी थी। मंत्रालय ने सुझाव दिया था कि उत्तर कोरिया के लिए सरकारी दस्तावेजों और आधिकारिक बयानों में “मुख्य दुश्मन” जैसे शब्दों का इस्तेमाल बंद कर उसके आधिकारिक नाम डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया (डीपीआरके) का उपयोग किया जाए। इस पर राष्ट्रपति ने कहा था कि सद्भावना से उठाए गए कदमों का राजनीतिक रूप से गलत इस्तेमाल भी हो सकता है, इसलिए हर निर्णय सोच-समझकर लिया जाना चाहिए।
एकीकरण मंत्री चुंग डोंग-यंग ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ने मंत्रालय की नीति को खारिज नहीं किया है। उनके मुताबिक, राष्ट्रपति का मानना है कि उत्तर कोरिया की ओर से तुरंत सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने की संभावना कम है, फिर भी शांति स्थापित करने के लिए लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।
हालांकि, सरकार के भीतर इस नीति को लेकर अलग-अलग राय भी सामने आई है। विदेश मंत्री चो ह्यून ने मंत्रालय की कुछ योजनाओं को “कुछ ज्यादा आदर्शवादी” बताते हुए कहा कि उत्तर कोरिया, दक्षिण कोरिया, अमेरिका और चीन के बीच चार-पक्षीय वार्ता का प्रस्ताव अभी सरकार की साझा नीति का हिस्सा नहीं है और मौजूदा हालात में इसे लागू करना आसान नहीं होगा।
इन टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए चुंग डोंग-यंग ने कहा कि कई बार यथार्थ को बदलने के लिए आदर्शवादी सोच भी जरूरी होती है। वहीं, एकीकरण मंत्रालय ने दोहराया कि उसकी नीति किसी कल्पना पर नहीं, बल्कि मौजूदा हालात में शांति और संवाद की संभावनाओं को आगे बढ़ाने के व्यावहारिक प्रयासों पर आधारित है।
–आईएएनएस
केआर/
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