सनी देओल और राजकुमार संतोषी की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को घायल, दामिनी और घातक जैसी यादगार फिल्में दी हैं। अब दोनों 1947 के बंटवारे पर बनी फिल्म ‘बटवारा 1947’ के साथ एक बार फिर साथ आए हैं। हालांकि इस बार कहानी में बदले और लड़ाई से ज्यादा इंसानियत, रिश्तों और इमोशन्स को जगह दी गई है।
- फिल्म- बटवारा 1947
- IMDb रेटिंग- 7.1/10
- ड्यूरेशन- 2 घंटे 25 मिनट
- कास्ट- सनी देओल, प्रीति जिंटा, शबाना आजमी
- डायरेक्टर- राजकुमार संतोषी
ऐसा बोला जा रहा है कि फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसका इमोशनल पार्ट है, खासकर सनी देओल और शबाना आजमी के किरदारों के बीच पनपने वाला रिश्ता अच्छे तरीके से दिखाया गया है। लेकिन क्या इन इमोशन्स के पीछे की कहानी सच में ऐसी ही है या फिर इसके पीछे भी कोई प्रोपेगेंडा छुपा हुआ है? आइए जानते हैं।
Batwara 1947 Movie Review: कैसी है फिल्म की कहानी?

अगर फिल्म की कहानी को लेकर बात करें तो ये बंटवारे के दौर में लाहौर पहुंचने वाले सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) और उनके परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। नए देश में पहुंचने के बाद परिवार को रहने के लिए एक ऐसा घर मिलता है, जहां पहले से माई (शबाना आजमी) नाम की बुजुर्ग हिंदू महिला रहती हैं।
माई अपना घर छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। एक ओर सिकंदर और उसका परिवार नए माहौल, असुरक्षा और बदलते हालात से जूझ रहा होता है, तो वहीं माई के लिए वह घर उनकी पूरी जिंदगी और यादों का हिस्सा है। इसी टकराव के बीच दोनों के बीच धीरे-धीरे एक ऐसा रिश्ता बनता है, जिसकी शुरुआत परेशानी से होती है, लेकिन आगे चलकर वह अपनापन और परिवार जैसे इमोशन में बदल जाता है।

इसके बाद ये दिखाया जाता है कि वो पाकिस्तानी मुस्लिम परिवार उस एक हिंदु महिला को बचाने के लिए अपनी पूरी जी जान लगा देता है। लेकिन फिर भी पाकिस्तान के कुछ रेडिकल और कॉम्युनल लोग उस परिवार को इस वजह से नहीं रहने देते, क्योंकि उनके घर में एक हिंदु महिला रहती है। अगर आसान भाषा में कहें तो फिल्म में ये दिखाया गया है कि पाकिस्तानी मुस्लिम हिंदुओं के दुश्मन नहीं होते, बल्कि उनके हितेशी होते हैं।
वहीं दूसरी ओर सिकंदर की पत्नी हमीदा (प्रीति जिंटा) और बाकी किरदार भी कहानी को आगे बढ़ाते हैं। समय के साथ उनके नजरिए और सोच में आने वाला बदलाव भी एक ओर कहानी को अलग गहराई देते हैं।
कलाकारों ने कैसा काम किया?

कलाकारों की बात करें तो सनी देओल फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। सिकंदर के किरदार में उनका एग्रेशन और दमदार अंदाज नजर आता है, लेकिन इसके साथ ही वह किरदार के अंदर छिपे डर, दर्द और बेबसी को भी अच्छे ढंग से सामने लाते हैं। शबाना आजमी ने माई के किरदार को बेहद सिम्पलीसिटी के साथ निभाया है। उनकी एक्टिंग में इमोशन्स की गहराई दिखाई देती है और सनी देओल के साथ उनके कई सीन फिल्म के सबसे यादगार हिस्सों में शामिल हैं।
वहीं प्रीति जिंटा भी लंबे समय बाद एक सीरियस रोल में नजर आती हैं और अपने किरदार के साथ लोगों को एंटरटेन करती दिखाई दी हैं। इसी के साथ करण देओल भी कुछ सीन्स में अच्छा प्रदर्शन करते हैं, हालांकि कुछ जगह उनकी एक्टिंग और बेहतर हो सकती थी। वहीं अभिमन्यु सिंह समेत बाकी हेल्पिंग एक्टर्स भी अपने-अपने किरदारों में ठीक-ठाक नजर आते हैं।
डायरेक्शन कैसा है?

राजकुमार संतोषी का निर्देशन फिल्म में साफ दिखाई देता है। उनके पुराने अंदाज की झलक यहां भी मिलती है, लेकिन इस बार कहानी का सेंटर थोड़ा बदल के पाकिस्तानी मुस्लिम का हिंदुओं के लिए रिश्ते और इंसानियत को दिखाना हैं। सिकंदर और माई के रिश्ते को धीरे-धीरे विकसित करना फिल्म का अच्छा पहलू कहा जा सकता है। दोनों के बीच बदलाव अचानक नहीं लगता, बल्कि कहानी के साथ नेचुरल रूप से आगे बढ़ता है। हालांकि फिल्म की गति कुछ जगह धीमी पड़ जाती है और कुछ सीन को थोड़ा छोटा किया जाता तो कहानी ज्यादा एफेक्टिव हो सकती थी।
तकनीकी पक्ष कितना मजबूत है?

फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन और माहौल कहानी के दौर को अच्छे से दिखाने में मदद करते है। लाहौर की गलियां, पुराने घर और भीड़भाड़ वाले सीन 1947 के समय को पर्दे पर उतारने की कोशिश करते हैं। वहीं कैमरावर्क कुल मिलाकर अच्छा है, हालांकि कुछ हिस्सों में इसे और बेहतर बनाया जा सकता था।
प्रोडक्शन डिजाइन में भी मेहनत नजर आती है, लेकिन अगर उस दौर की छोटी-छोटी चीजों और माहौल पर थोड़ा और ध्यान दिया जाता तो फिल्म ज्यादा असली महसूस हो सकती थी। कुछ इमोशनल सीन में ड्रामा थोड़ा जरूरत से ज्यादा भी नजर आता है। क्योंकि पाकिस्तानी मुस्लिम को हिंदुओं के लिए जिस तरह इंसानियत दिखाने वाला दर्शाया गया है, वो कही ना कही मज़ाक लगता है।
कैसा है फिल्म का म्यूजिक?

फिल्म का म्यूज़िक कहानी के साथ बैलेंस्ड तरीके से चलता है और कहानी पर हावी नहीं होता। बैकग्राउंड स्कोर भी खासकर इमोशनल और बिछड़ने वाले सीन के असर को बढ़ाने में मदद करता है। हालांकि फिल्म में ऐसा कोई गाना नहीं है जो लंबे समय तक दर्शकों की जुबान पर बना रहे।
फाइनल वर्डिक्ट: फिल्म देखनी चाहिए या नहीं?

बटवारा 1947 बंटवारे की त्रासदी को सिर्फ नफरत और हिंसा के नजरिए से नहीं, बल्कि इंसानियत और रिश्तों के माध्यम से दिखाने की कोशिश करती है। जो कि पूरी तरह से इमेजिनरी ही लगता है, हालांकि सनी देओल और शबाना आजमी के बीच का रिश्ता फिल्म की सबसे बड़ी खूबी माना जा रहा है और दोनों की एक्टिंग कहानी को इमोशनल मजबूती भी देती है। कुछ जगह धीमी रफ्तार और जरूरत से ज्यादा ड्रामा इसकी कमजोरियां जरूर हैं, लेकिन अच्छी एक्टिंग और इमोशनल कहानी की वजह से यह फिल्म अगर आप देखना चाहें तो देख सकते हैं।
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