दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ एक बार फिर चर्चा में आ गई है। क्योंकि ZEE5 पर रिलीज होने के महज 48 घंटे बाद इस फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया था। हालांकि अब इसकी कॉम्यूनल स्क्रीनिंग पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और जम्मू के कई गुरुद्वारों में की जा रही है, ताकि सोशल एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालरा की कहानी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके।
Satluj Streaming In Gurudwara: गुरुद्वारों में हो रही है फिल्म की स्क्रीनिंग

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई सिख धार्मिक संस्थाओं और लोकल गुरुद्वारा कमीटीज़ ने मिलकर फिल्म को डिस्प्ले करने की पहल करी है। बताया जा रहा है कि जम्मू के चार गुरुद्वारों में 10 जुलाई से 13 जुलाई तक इस फिल्म की स्क्रीनिंग की जाएगी। वहीं, सोशल मीडिया पर एक पोस्टर भी तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें लोगों को जयपुर स्थित चांदी की टकसाल गुरुद्वारे के बाबा फतेह सिंह ऑडिटोरियम में 11 जुलाई को होने वाली ऑफिशियल स्क्रीनिंग में शामिल होने का इन्विटेशन दिया गया है।
DSGMC ने भी किया समर्थन

दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी (DSGMC) के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने भी इस पहल को सपोर्ट किया है। उन्होंने इच्छा जताई है कि फिल्म को दोबारा ZEE5 पर एवेलेबल कराया जाए, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे देख सकें।
‘यह कहानी लोगों तक पहुंचनी चाहिए’

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) से जुड़े एक सूत्र के मुताबिक, समुदाय का मानना है कि सिर्फ OTT से हट जाने की वजह से जसवंत सिंह खालरा की कहानी लोगों तक पहुंचना बंद नहीं होनी चाहिए। इसी सोच के साथ गुरुद्वारों ने अपने प्रेमीसेज़ में फिल्म की स्क्रीनिंग शुरू करने का फैसला लिया है।
रिलीज के दो दिन बाद हटाई गई थी फिल्म

हनी त्रेहान के निर्देशन में बनी यह बायोपिक 3 जुलाई को ZEE5 पर रिलीज हुई थी। हालांकि, रिलीज के दो दिन बाद ही इसे प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार ने इनफॉर्मेशन टेक्नालॉजी (IT) नियमों के तहत सुरक्षा संबंधी वजहों का हवाला देते हुए प्लेटफॉर्म को फिल्म हटाने का निर्देश दिया था।
जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित है फिल्म

अगर बात करें फिल्म ‘सतलुज’ की तो इसे पहले ‘पंजाब 95’ के नाम से बनाया जा रहा था। लेकिन कुछ कारणों के चलते इसका नाम बदलकर सतलुज रख दिया गया। इस फिल्म में सोशल एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालरा के जीवन की कहानी दिखाई गई है। खालरा ने 1984 से 1994 के बीच पंजाब में हजारों अनजान लाशों के कथित अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों की जांच की थी। हालांकि इसी वजह से साल 1995 में उनका अपहरण कर लिया गया था, जिसके बाद वो कभी वापस नहीं लौटे। उनकी कहानी आज भी ह्यूमन राइट्स और जस्टीस की लड़ाई के साइन के तौर पर याद की जाती है।
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