38 आतंकियों को फांसी

Summary :

2014 में केन्द्र में सरकार के गठन के बाद भारत में जिस तरह आतंकवाद के विरुद्ध सघन अभियान कार्यपालिका व विधायिका ने चलाया उसकी प्रतिध्वनि हमें राज्य के अन्य संवैधानिक प्रतिष्ठानों में भी सुनने को मिली जिससे भारत की एकता व अखंडता को मजबूती मिली। मोदी सरकार में श्री अमित शाह के गृहमन्त्री बनने के बाद जिस तरह भारत को नक्सलवाद से मुक्त किया गया वह इसी तथ्य का प्रमाण है कि संविधान के सत्ता वाले भारत में बन्दूक की गोली के जरिये न तो लोगों में दहशत पैदा करने के लिए कोई जगह है और न ही सरकारों को…

2014 में केन्द्र में सरकार के गठन के बाद भारत में जिस तरह आतंकवाद के विरुद्ध सघन अभियान कार्यपालिका व विधायिका ने चलाया उसकी प्रतिध्वनि हमें राज्य के अन्य संवैधानिक प्रतिष्ठानों में भी सुनने को मिली जिससे भारत की एकता व अखंडता को मजबूती मिली। मोदी सरकार में श्री अमित शाह के गृहमन्त्री बनने के बाद जिस तरह भारत को नक्सलवाद से मुक्त किया गया वह इसी तथ्य का प्रमाण है कि संविधान के सत्ता वाले भारत में बन्दूक की गोली के जरिये न तो लोगों में दहशत पैदा करने के लिए कोई जगह है और न ही सरकारों को खौफजदा रखने की कोई गुंजाइश है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि आज देश में घरेलू स्तर के आतंकवादी संगठन नाकारा हो चुके हैं और सरकारी पुलिस अमलों से लेकर सशस्त्र अमले तक इस अभियान में कन्धे से कन्धा मिलाकर काम कर रहे हैं। आतंकवाद के विरुद्ध मोदी सरकार का दृढ़ संकल्प यह बताता है कि भारत में केवल शान्तिपूर्ण तरीके से ही संविधान की सत्ता का राज रहेगा। इस मामले में भारत की न्यायपालिका की भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है क्योंकि किसी आतंकवादी के पकड़े जाने के बाद उसके भाग्य का फैसला अन्त में अदालतें ही करती हैं।
इस सन्दर्भ में हाल ही में गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा हालिया पिछले दिनों में दिया गया यह फैसला मील का पत्थर है जिसमें 38 लोगों की मृत्युदंड की सजा को बरकरार रखा गया है। इसके साथ ही 11 अपराधियों की आजीवन कारावास की सजा को भी बहाल रखने के आदेश उच्च न्यायालय ने दिये। ये फैसला 2008 में अहमदाबाद में किये गये शृंखलाबद्ध बम कांड में दिया गया। इस बम कांड के सिलसिले में संलिप्त व्यक्तियों को पकड़ कर पुलिस ने सत्र न्यायालय में मुकदमा शुरू किया था जिसमें 49 अभियुक्तों को सजा सुनाई गई थी। यह फैसला फरवरी 2022 में दिया गया था जिसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। अहमदाबाद बम कांड में कुल 56 व्यक्तियों की मृत्यु हुई थी। इसमें इंडियन मुजाहिदीन जैसी आतंकवादी संस्था का हाथ था जिसे प्रतिबन्धित संगठन ‘सिमी’ का सहायक संगठन माना जाता है। इस संगठन ने जुलाई 2008 में अहमदाबाद सहित कुछ अन्य स्थानों पर भी बम विस्फोट किये थे और कहा था कि यह 2002 के गोधरा दंगों का जवाब है। पुलिस ने इस कांड में संलिप्त लोगों को पकड़ने पर पाया कि वे सभी इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठन के सदस्य हैं। इन सभी अभियुक्तों को पुलिस अदालत में ले गई जहां उनका अपराध सिद्ध हो गया और फरवरी 2022 में उसने सजा सुना दी। आतंकवाद के विरुद्ध भारत का यह समूचा संकल्प शुरू से ही रहा है कि इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। अतः मोदी सरकार ने सत्ता पर बैठने के बाद पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवादी घटनाओं का जवाब भी उसके घर में घुस कर मारने की नीति से दिया और भारत के दृढ़ संकल्प का इजहार किया। जहां तक भारत के भीतर पनपी आतंकवादी संस्थाओं का प्रश्न है तो मोदी सरकार ने इन पर भी कानून की गाज गिराते हुए इन्हें प्रतिबन्धित किया और इनकी गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी।
अहमदाबाद बम कांड में पकड़े मुजरिमों को पहले सत्र न्यायालय ने मुजरिम घोषित किया और बाद में उच्च न्यायालय ने। मगर इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि स्वतन्त्र भारत में यह पहला अवसर है जब इतनी बड़ी संख्या में मुजरिमों के मृत्युदंड की सजा को बहाल रखा गया हो। इसका सीधा अर्थ यही निकलता है कि मुजरिमों के विरुद्ध पुलिस ने इतने पुख्ता सबूत जुटाये कि उच्च न्यायालय तक को उन्हें स्वीकार करना पड़ा। उच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से देते हुए कहा कि इस बम कांड में हताहत हुए सभी मृत व्यक्तियों के परिवारों को दस-दस लाख रुपए का मुआवजा दिया जाये और जो गंभीर रूप से जख्मी हुए थे उन्हें पांच-पांच लाख रुपए दिये जायें और साधारण जख्मियों को एक-एक लाख रुपये। इंडियन मुजाहिदीन के जिन 38 लोगों पर सजाये मौत की तलवार लटकी हुई है उनमें 14 गुजरात से हैं, आठ उत्तर प्रदेश से, पांच महाराष्ट्र से, पांच मध्य प्रदेश से, दो-दो केरल व कर्नाटक से व एक हैदराबाद से। इससे पता चलता है कि आतंकवादी संस्था ने अपना जाल किस तरह बिछा रखा था। इनके 11 साथी और भी थे जिन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। 26 जुलाई, 2008 को इन लोगों ने अहमदाबाद में विभिन्न स्थानों पर 22 बम फोड़े थे। जिनमें दो अस्पताल भी शामिल थे। अतः इन आतंकवादियों के नृशंस इरादों को देखा जा सकता है और सिद्ध होता है कि एेसे लोग मानवता के दुश्मन होते हैं जिनके प्रति दया भाव नहीं रखा जा सकता।
बेशक भारत में कुछ लोग मृत्युदंड की मुखालफत अपने-अपने तर्कों के हिसाब से करते रहते हैं मगर मानवता के विरुद्ध किये गये अपराध को किस प्रकार ‘क्षम्य’ माना जा सकता है जबकि विश्व की अन्तर्राष्ट्रीय अदालत भी एेसे अपराध को क्षम्य नहीं मानती है। अहमदाबाद बम कांड में पुलिस ने कुल 77 लोगों को अभियुक्त बनाया था और इन्हें सत्र न्यायालय में पेश किया था। इनमें से अदालत ने 49 को ही दोषी पाया और 28 अभियुक्तों को सन्देह का लाभ देते हुए रिहा कर दिया। इसलिए अदालत ने उन ठोस सबूतों के आधार पर ही अपना फैसला दिया जो उच्च अदालतों में भी टिके रह सकें। इस पूरे मामले का अगर वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाये तो हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि आतंकवादी घटनाओं के मुकदमों को स्थानीय स्तर पर ही पुलिस को ‘तथ्य, कथ्य और पारिस्थितिक’ तौर पर इतना कसा हुआ बनाना चाहिए कि उच्च अदालतों में भी उनकी काट न हो सके। आतंकवाद के मामले में तो उसे और भी ज्यादा संजीदा रहना चाहिए क्योंकि इसका सम्बन्ध मानवता से होता है।

Aditya Chopra

Aditya Chopra is well known for his phenomenal viral articles.