विश्वास की अमानत में खयानत का खंजर!

Summary :

बहुत दिनों से मन में इच्छा थी कि अयोध्या जाकर प्रभु रामलला के दर्शन करूं। जब वहां बाबरी मस्जिद खड़ी थी, तब वहां गया था, रामलला का मंदिर बनने के बाद जाने का योग अब बना, मगर रामलला मंदिर ट्रस्ट में पैसों की हेर-फेर की खबर ने बहुत आहत किया है। सबके मन में एक ही सवाल है कि विश्वास की अमानत में खयानत का खंजर किसने मारा है? लखनऊ से अयोध्या के सफर के दौरान इतिहास जेहन में फड़फड़ा रहा था। पुरातत्व के प्रमाणों और घटनाक्रमों का वो पूरा दौर हम सबने देखा है। राम मंदिर के लिए देश…

बहुत दिनों से मन में इच्छा थी कि अयोध्या जाकर प्रभु रामलला के दर्शन करूं। जब वहां बाबरी मस्जिद खड़ी थी, तब वहां गया था, रामलला का मंदिर बनने के बाद जाने का योग अब बना, मगर रामलला मंदिर ट्रस्ट में पैसों की हेर-फेर की खबर ने बहुत आहत किया है। सबके मन में एक ही सवाल है कि विश्वास की अमानत में खयानत का खंजर किसने मारा है?
लखनऊ से अयोध्या के सफर के दौरान इतिहास जेहन में फड़फड़ा रहा था। पुरातत्व के प्रमाणों और घटनाक्रमों का वो पूरा दौर हम सबने देखा है। राम मंदिर के लिए देश दुनिया में शिला पूजन के अभियान को कौन भूल सकता है? आस्था के आंदोलन का ऐसा दूसरा कोई उदाहरण दिखाई नहीं देता है। अयोध्या को चूंकि प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली के रूप में जाना जाता रहा है, इसलिए वहां बाल स्वरूप वाले प्रभु श्रीराम यानी रामलला की मूर्ति स्थापित की गई है। भव्य मंदिर के निर्माण में निश्चय ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का विशेष योगदान रहा है। भारतीय जनता पार्टी और संघ के एजेंडे में मंदिर निर्माण था। मंदिर के निर्माण के उद्देश्य में कहीं यह बात भी जरूर रही होगी कि प्रभु श्रीराम ने राजकाज का जो रामराज प्रारूप हमें दिया, वैसा ही रामराज हमारे देश को मिले। रामराज का मतलतब है सबको न्याय मिले, जाति-पाति और नस्ल भेद समाप्त हो, उपेक्षितों का कल्याण हो। शबरी के बेर खाने और अहिल्या को शाप मुक्त करने का जो आदर्श प्रभु श्रीराम ने दर्शाया वही नए भारत का नजरिया बने।
इन्हीं विचारों में खोया हुआ मैं रामलला के मंदिर जा पहुंचा। इसकी भव्यता गजब की है। वातावरण में भक्ति, शांति और सुकून का ऐसा वास है कि आध्यात्मिक रूप से मन तृप्त हो जाता है। ज्यादातर निर्माण पूरा हो चुका है, जो शेष है, वह भी अंतिम चरण में है। मुझे अन्य समुदायों के लोग भी यहां मिले। मेरे गृह राज्य महाराष्ट्र के भी काफी लोग मिले। मैंने उनसे बातचीत की। मंदिर के निर्माण की खास बात है कि यह सरकारी पैसों से नहीं बना है बल्कि इसमें गरीबों का दस रुपए से लेकर अमीरों के करोड़ों रुपयों का योगदान है। यह मंदिर अथाह श्रद्धा का अनुपम उदाहरण है, इसलिए अमानत में खयानत का जो मामला सुनाई पड़ रहा है, उसने हर किसी को गहरी ठेस पहुंचाई है। इस मामले को लेकर अयोध्या में मैंने कई लोगों से बात की। लोगों की मान्यता स्पष्ट है कि वहां बाहर से कुछ ऐसे लोग आ गए थे जिनका प्रभाव अनावश्यक रूप से बढ़ता चला गया। शायद इन्हीं कारणों से विश्वास खंडित हुआ। मैंने पूछा कि तिरुपति जैसी व्यवस्था क्यों नहीं की गई? तिरुपति में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी प्रमुख होता है। फाइनेंस के लिए अलग कमेटी होती है। पता चला कि अयोध्या से एक दल तिरुपति की व्यवस्था जानने के लिए गया था लेकिन आगे कुछ नहीं हुआ। फिलहाल धन की हेराफेरी के मामले में एसआईटी गठित हो गई हैैै, कुछ लोग गिरफ्तार भी हो चुके हैं। चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा का इस्तीफा भी हो चुका है। लखनऊ लौटते हुए मैं यही सोचता रहा कि आम आदमी की आस्था को खंजर मारने वाले असली गुनहगार कौन हैं?
कल्चर, क्राफ्ट और
कुजिन का शहर..!
इस यात्रा के दौरान मैंने दो दिन लखनऊ का भरपूर आनंद लिया। यह शहर अपने कल्चर, क्राफ्ट और कुजिन के लिए विख्यात है। बड़ा इमामवाड़ा के लिए इसमें आर्किटेक्ट भी जोड़ लीजिए। यहां की भाषा में अदब की चाशनी घुली है तो खाने की लज्जत के क्या कहने। यहां की फिजा में अलग ही नजाकत है। लखनऊ में कुछ वक्त मैंने बड़ा इमामवाड़ा में भी बिताया। 1784 में अवध के नवाब आसफ-उद-दौला ने भयंकर अकाल के दौरान लोगों को रोजगार देने के लिए इसका निर्माण करवाया था। दिन में यहां गरीब काम करते थे तो रात को वो लोग काम पर आते थे जो संपन्न से गरीबी की हालत में पहुंच चुके थे। उन्हें रात में काम पर इसलिए बुलाया जाता था ताकि उनकी शान को ठेस न पहुंचे। मुझे लगता है कि यह मनरेगा जैसी योजना रही होगी। बड़ा इमामवाड़ा उस दौर के सोच और आर्किटेक्ट की गुणवत्ता की मिसाल है।
मुजफ्फर अली की
नायाब हवेली में !
मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब यह तय हुआ कि हम अवध के शाही कोटवारा परिवार के वंशज पद्मश्री मुजफ्फर अली से मिलने उनकी हवेली में जा रहे हैं। हम में से ज्यादातर लोग उन्हें दिग्गज फिल्म निर्देशक के रूप में जानते हैं, लेकिन वे शानदार फैशन डिजाइनर, भावनाओं से भरे कवि और बेमिसाल चित्रकार भी हैं। फिल्म उमराव जान हो उनकी क्लासिकल कृति है। वे क्लासिकल विज्ञापन के लिए भी जाने जाते रहे हैं। उम्दा शिल्प अवध की चिकनकारी को पुनर्जीवित करने में उनका बहुत योगदान रहा है।
उनकी पत्नी मीरा अली भी फैशन डिजाइनर हैं और दोनों पति-पत्नी मिलकर लाजवाब काम कर रहे हैं। अली दंपति ने जिस अदब के साथ अपनी हवेली में मेरी अगवानी और मेहमाननवाजी की, मैं तो अभिभूत हो गया! मैं हवेली में बड़े जतन से सहेज कर रखी गई पुरानी चीजों को देखता रहा। उनकी हवेली वाकई अद्भुत कृतियों का नायाब संग्रहालय है। उनके साथ बिताया हर पल मेरी धरोहर है।

विजय दर्डा