पाकिस्तान में संस्कृत की दस्तक

Summary :

भारत-विभाजन के बाद पहली बार पाकिस्तान के कुछ विश्वविद्यालयों में संस्कृत भाषा के विभाग खुुले हैं। ‘लाहौर यूनिवर्सिटी आफ मैनेजमेंट साइंसेज’ ने एक तिमाही डिप्लोमा पाठ्यक्रम की शुरूआत कर दी है। इस संस्थान के निदेशक डॉ. अली उस्ताद कासमी के अनुसार वहां के ‘बोर्ड आफ स्टडीज’ ने महसूस किया है कि संस्कृत के अध्ययन के बिना अरबी-फरसी की व्याकरण को पूरी तरह समझना मुश्किल है। वैसे यह भी दिलचस्पी की बात है कि इस पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए मुस्लिम युवा महिलाओं ने अधिक दिलचस्पी दिखाई है। डॉ. अली उस्मान कासमी के अनुसार, पाकिस्तान के कुछ अन्य विश्वविद्यालयों में भी…

भारत-विभाजन के बाद पहली बार पाकिस्तान के कुछ विश्वविद्यालयों में संस्कृत भाषा के विभाग खुुले हैं। ‘लाहौर यूनिवर्सिटी आफ मैनेजमेंट साइंसेज’ ने एक तिमाही डिप्लोमा पाठ्यक्रम की शुरूआत कर दी है। इस संस्थान के निदेशक डॉ. अली उस्ताद कासमी के अनुसार वहां के ‘बोर्ड आफ स्टडीज’ ने महसूस किया है कि संस्कृत के अध्ययन के बिना अरबी-फरसी की व्याकरण को पूरी तरह समझना मुश्किल है। वैसे यह भी दिलचस्पी की बात है कि इस पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए मुस्लिम युवा महिलाओं ने अधिक दिलचस्पी दिखाई है।

डॉ. अली उस्मान कासमी के अनुसार, पाकिस्तान के कुछ अन्य विश्वविद्यालयों में भी ‘क्लासिकल लैंग्वेजिज’ (प्राचीन शास्त्रीय भाषाओं) के विभाग में संस्कृत के पाठ्यक्रम फिर से आरंभ किए हैं और इसके लिए संस्कृत भाषा का समुचित ज्ञान रखने वाले मुस्लिम विद्वानों की नियुक्ति आरंभ कर दी गई है। इन विश्वविद्यालयों में लाहौर स्थित पंजाब विश्वविद्यालय भी शामिल है। यह भी गौरतलब है कि इसी विश्वविद्यालय के विभाजन के बाद इसी नाम से भारतीय पंजाब में भी स्थापित किया गया था।

दोनों का नाम एकसमान है मगर अंग्रेजी में स्पेलिंग में थोड़ा अंतर डाल दिया गया है। वैसे कराची व पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर में भी संस्कृत, अरबी, फारसी व अन्य प्राच्य भाषाओं के पाठ्यक्रम जारी हैं। पाकिस्तान के पंजाब विश्वविद्यालय (लाहौर) और भारत के पंजाब विश्वविद्यालय (चंडीगढ़) की स्थापना 1882 में लाहौर में हुई थी लेकिन विभाजन के बाद ये अलग हो गए, हालिया खबरों में पाकिस्तान के पीयू में संस्कृत की कक्षाएं शुरू होने, होली पर छात्रों के बीच झड़प और भारत के पीयू में छात्रों के विरोध प्रदर्शन (जैसे सीनेट चुनाव और विवादित हलफनामा) शामिल हैं जो दोनों विश्वविद्यालयों के बीच ऐतिहासिक और वर्तमान मुद्दों को दर्शाते हैं।

वैसे दोनों विश्वविद्यालयों का मूलस्वरूप अविभाजित पंजाब के लाहौर में 1882 में स्थापित हुआ था जो इस महाद्वीप के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है। भारत के बंटवारे के बाद पंजाब विश्वविद्यालय (लाहौर) पाकिस्तान का हिस्सा बन गया और भारत में पूर्वी पंजाब विश्वविद्यालय (पीयू)की स्थापना हुई जो बाद में चंडीगढ़ में स्थानांतरित हो गया।
हाल ही में पाकिस्तान के पंजाब विश्वविद्यालय ने गुरू नानक पीठ की स्थापना की है और संस्कृत की कक्षाएं भी शुरू की हैं जो साझा विरासत पर जोर देती हैं। मार्च 2023 में होली मनाने को लेकर हिंदू छात्रों और इस्लामी जमीयत-ए-तुल्बा (आईजेटी) के बीच झड़प हुई थी जिसमें कुछ छात्र घायल हुए थे और विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर में होली की अनुमति न देने की बात कही थी।

नवंबर 2024 में सीनेट चुनावों की तारीख की घोषणा और एक विवादित हलफनामे (जो छात्रों के विरोध के अधिकार का उल्लंघन करता था) के खिलाफ छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया जिसके बाद प्रशासन को हलफनामा वापस लेना पड़ा। पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़, भारत के शीर्ष विश्वविद्यालयों में से एक है और इसे एनएएसी ए++ ग्रेड प्राप्त है जो इसकी शैक्षणिक गुणवत्ता को दर्शाता है।

पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर में स्थित एक आवासीय और संबद्ध विश्वविद्यालय है। इसकी स्थापना 1882 में कलकत्ता विश्वविद्यालय (कोलकाता) से संबद्ध कुछ कॉलेजों को अपने अधीन लेने के लिए की गई थी जिसका अधिकार क्षेत्र उत्तरी भारत के अधिकांश भाग और म्यांमार के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ था। 1947 में पाकिस्तान के निर्माण के बाद लाहौर स्थित विश्वविद्यालय ने भारतीय क्षेत्र में स्थित अपने कॉलेजों को छोड़ दिया जो बाद में भारत के चंडीगढ़ में नव स्थापित पंजाब विश्वविद्यालय से संबद्ध हो गए।

लाहौर स्थित मूल विश्वविद्यालय में कला, विज्ञान और इंजीनियरिंग, इस्लामी और प्राच्य शिक्षा, विधि, वाणिज्य, चिकित्सा और दंत चिकित्सा तथा शिक्षा के कई कॉलेज और स्नातकोत्तर संकाय हैं। यहां पूरी शिक्षा अंग्रेजी में ही दी जाती है । पड़ौसी देश पाकिस्तान ढेरों अंतर्विरोधों से भरा देश है। इन दिनों वहां एक संविधान-संशोधन विधेयक लाने की तैयारी है, जिसके अनुसार पंजाबी भाषा को वहां की राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की बात हो रही है, मगर इस विधेयक में सिर्फ पंजाबी भाषा की बात नहीं हो रही। सिंधी, पश्तो व बलूची भाषा को भी राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाने पर भी विचारविमर्श जारी है।
वस्तुस्थिति यह है कि पूरे पाकिस्तान में उर्दू बोलने वालों की संख्या सिर्फ एक करोड़ 35 लाख है। शिखर पर पंजाबी-भाषी हैं। उनकी संख्या लगभग आठ करोड़ है। दूसरे स्थान पर सिंधी (3.10 करोड़) हैं। तीसरे स्थान पर पश्तो (संख्या 3 करोड़) व चौथे पर बलूची भाषा है। हकीकत यह भी है कि वहां बहावलपुरी यानि मुलतानी भाषा बोलने व लिखने पढ़ने वालों की संख्या भी लगभग दो करोड़ है।

वहां पर पंजाबी में पत्र-पत्रिकाएं भी छपती हैं, किताबें भी हैं और पुस्तक-प्रदर्शनियां, पंजाबी मुशायरे आदि भी आयोजित होते हैं। यह हकीकत भी कम दिलचस्प नहीं कि लाहौर से लेकर इस्लामाबाद तक ‘बाज़ारों’, ‘मॉल’ सामाजिक समारोहों, राजनैतिक जलसा-जुलूसों में अब भी पंजाबी का ही बोलबाला है। कभी लाहौर जाएं तो पता चलेगा कि वहां पर 85 प्रतिशत व्यापारिक संस्थानों के बोर्ड, नामपट्ट आदि पंजाबी में ही हैं। ‘विरसा’, ‘सिफ्ती घर’, ‘साडी विरासत’, ‘फैज़ घर’, ‘मन्टो दा आशियाना’, ‘बाबे दी हट्टी’, ‘लाहौरी-कुलचा कार्नर’, ‘बेबे दा पार्लर’, ‘फुलकारी’, ‘लछमी-मेंशन’ आदि वहां की चर्चित दुकानों व ‘मॉल्स’ के नाम हैं।

वहां अब भी तांगे व टैम्पो, थ्री-व्हीलर्स आदि चलते हैं, हालांकि ‘रिक्शा’ नदारद हो चुके हैं। रेहड़ी-फड़ी वाले, अनारकली बाज़ार के कूचों में अब भी अमृतसर या चांदनी चौक दिल्ली के बाज़ारों की तरह आवाज़ें लगाकर सामान बेचते हैं। ये सारे संवाद सिर्फ पंजाबी बोली तक सीमित हैं। फर्क सिर्फ यह है कि वहां की पंजाबी की लिपि हमारी तरह गुरुमुखी लिपि नहीं है। वहां पजाबी भी शाहमुखी (यानि पर्शियन लिपि) में ही लिखी व पढ़ी जाती है। इकबाल, फैज़ अहमद फैज़, अहमद नदीम काजमी, कतील शिफाई आदि लेखकों ने जितना उर्दू में लिखा उतना पंजाबी में भी लिखा।

समस्या वहां के शुद्ध उच्चारण की भी है। पाक पंजाब के लोग उर्दू भी बोलेंगे तो पंजाबी लहजे में। मुल्तान का मुसलमान उर्दू में मुलतानी उच्चारण का पुट ले आता है। यही हाल बलूचिस्तान के लोगों का है। खालिस उर्दू उच्चारण वहां बेहद कम सुनने को मिलता है। ‘इलीट वर्ग’ यानि कुलीन वर्ग के लोग अवश्य शुद्ध उच्चारण का प्रयास करते हैं। मगर उनमें से ज़्यादातर की बोली अब अंग्रेजी हो चली है।

वैसे सरकारी आंकड़ों के अनुसार लाहौर में 88 प्रतिशत लोग बोलचाल में सिर्फ पंजाबी का प्रयोग करते हैं। उनके मुहावरे, कहावतें, टप्पे, गालियां, प्यार भरे सम्बोधन, सब कुछ भारतीय पंजाब से कहीं ज्यादा मौलिक हैं। पूरे पाक पंजाब में पंजाबी भाषियों का प्रतिशत 92.6 प्रतिशत है जबकि इस्लामाबाद के राजधानी क्षेत्र में भी 72.66 प्रतिशत लोगों की भाषा पंजाबी ही है। सिंध क्षेत्र में भी पंजाबी भाषियों की संख्या 10 प्रतिशत है।

Dr. Chander Trikha