जब मीराबाई चानू ने ग्लासगो में 2026 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद आंसू बहाए तो वह क्षण वर्षों की चोटों, असफलताओं और बलिदानों को दर्शाता था। भारतीय भारोत्तोलक ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में कुल 190 किलोग्राम भार उठाकर राष्ट्रमंडल खेलों में लगातार तीसरा स्वर्ण पदक हासिल किया जिससे भारत को खेलों में पहला स्वर्ण पदक मिला। जीत के बाद चानू ने कहा कि उनके आंसू उन संघर्षों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन पर उन्होंने अपने पूरे करियर में विजय प्राप्त की है। मणिपुर के नोंगपोक काकचिंग से लेकर ओलंपिक पोडियम और राष्ट्रमंडल खेलों तक, उनकी यात्रा भारतीय खेल जगत की सबसे प्रेरणादायक सफलता की कहानियों में से एक बन गई है।
मीराबाई चानू का लगातार चौथा राष्ट्रमंडल खेलों का पदक (लगातार तीसरा स्वर्ण पदक) कोई चर्चित घटना नहीं थी। यह तो अपेक्षित ही था। एक दशक से अधिक समय से मीराबाई ने खेल के सबसे अनिश्चित क्षेत्रों में से एक को विश्वसनीयता के प्रतीक में बदल दिया है। भारोत्तोलन में गलतियों की गुंजाइश नहीं होती। शरीर थक जाता है, चोटें लंबे समय तक बनी रहती हैं, युवा खिलाड़ी उभरते हैं और एक भी चूक वर्षों की तैयारी को बर्बाद कर सकती है। फिर भी, पिछले एक दशक से भारत ने राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वालों की सूची में मीराबाई का नाम दर्ज कर लिया है। उनकी निरंतर उत्कृष्टता का यह स्तर पदक से कहीं अधिक प्रशंसा का पात्र है। मीराबाई की देशभक्ति भी पूरे टूर्नामेंट के दौरान चर्चा का विषय रही। उन्होंने प्रतियोगिता से एक रात पहले भारतीय तिरंगे के रंगों वाले रिबन से तितली के आकार की हेयर क्लिप खुद तैयार की थी। स्वर्ण जीतने के बाद उन्होंने बताया, ‘‘मैं भारत के लिए कुछ करना चाहती थी, इसलिए मैंने तिरंगे के रंगों वाले रिबन से यह क्लिप बनाई।’’ यह छोटी-सी पहल उनके लिए फैशन नहीं, बल्कि देश के प्रति सम्मान और गर्व का प्रतीक थी।
पोडियम पर मीराबाई चानू को गले में जब स्वर्ण पदक पहनाया गया उस समय वह भावुक हो गईं। जब भारतीय राष्ट्रगान बजा और तिरंगा सबसे ऊपर लहराया। 31 वर्ष की मीराबाई अब केवल भारत की अग्रणी भारोत्तोलक ही नहीं हैं, बल्कि वे अगली पीढ़ी को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। गाजियाबाद स्थित राष्ट्रीय भारोत्तोलन अकादमी में उन्होंने मार्गदर्शक की भूमिका को बखूबी निभाया है, तकनीकी जानकारी साझा की है और उच्चतम स्तर पर टिके रहने के लिए आवश्यक व्यावसायिकता का प्रदर्शन किया है। वह एक ऐसे परिवार में पली-बढ़ी जिसका खेलों से कोई संबंध नहीं था, लेकिन उसे अपने सपने को पूरा करने के लिए अटूट समर्थन मिला। उनके शानदार योगदान के लिए भारत सरकार उन्हें पद्मश्री और देश के सर्वोच्च खेल सम्मान मेजर ध्यानचंद खेल रत्न से सम्मानित कर चुकी है।
मीराबाई चानू की यह जीत सिर्फ रिकॉर्ड बुक में दर्ज एक और स्वर्ण पदक नहीं है, यह उस खिलाड़ी की कहानी है, जिसने भूख पर काबू पाया, दबाव को हराया, असफल शुरुआत से वापसी की और तिरंगे को सर्वोच्च स्थान पर पहुंचाने के अपने संकल्प को पूरा किया। शायद यही वजह है कि मीराबाई चानू सिर्फ एक चैंपियन नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा का दूसरा नाम हैं। उनके पिता, साइखोम कृति मेतेई, लोक निर्माण विभाग में काम करते थे, जबकि उनकी मां, साइखोम टॉम्बी देवी, एक छोटी सी दुकान चलाती थीं। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उसके परिवार ने उसे प्रशिक्षण जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया।
अपने बचपन में चानू अपनी शारीरिक शक्ति के लिए जानी जाती थीं। उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में रिपोर्टों में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि कैसे वह अपने गांव के पास की पहाड़ियों से लकड़ियों के भारी गट्ठे ढोती थीं, जो प्रतिस्पर्धी भारोत्तोलन में प्रवेश करने से बहुत पहले ही उनकी स्वाभाविक शक्ति को दर्शाता है।मीराबाई चानू का सफर असफलताओं से रहित नहीं रहा है।चोटों के कारण कई प्रमुख प्रतियोगिताओं की तैयारी प्रभावित हुई। 2024 में पेरिस ओलंपिक में वह महिलाओं के 49 किलोग्राम वर्ग में चौथे स्थान पर रहने के बाद पदक से बाल-बाल चूक गईं।
2026 राष्ट्रमंडल खेलों से पहले, चानू ने अपने वजन वर्ग में बने रहने की शारीरिक और मानसिक मांगों के बारे में बात की और बताया कि प्रतियोगिता से पहले उन्हें अपने भोजन और पानी के सेवन को सावधानीपूर्वक प्रबंधित करना पड़ता है। दो दिन तक कुछ नहीं खाया। उनके करियर ने यह साबित कर दिया है कि वेटलिफ्टिंग में सफलता न केवल ताकत पर बल्कि अनुशासन, रिकवरी, तकनीक और निरंतरता पर भी निर्भर करती है। साल 2008 में मणिपुर स्पोर्ट्स एकेडमी से अपनी ट्रेनिंग शुरू करने वाली मीराबाई के लिए शुरुआती दिन काफी संघर्षपूर्ण रहे। आर्थिक तंगी के कारण ट्रेनिंग सेंटर पहुंचने के लिए वे रोजाना बालू और पत्थर ढोने वाले ट्रक ड्राइवरों से लिफ्ट लिया करती थीं।
टोक्यो ओलंपिक में ऐतिहासिक सिल्वर मेडल जीतने के बाद उन्होंने उन सभी ट्रक ड्राइवरों को आमंत्रित कर उनके पैर छूकर सम्मान दिया था। साल 2011 में अपने पहले नेशनल गेम्स खेलने के बाद वे बैंगलोर में नेशनल कैंप से जुड़ीं और 2012 से एनआईएस पटियाला में अपनी ट्रेनिंग जारी रखी। खेलों के क्षेत्र में उनकी असाधारण उपलब्धियों और देश का मान बढ़ाने के लिए वर्तमान में वे मणिपुर पुलिस में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं। मीराबाई चानू की यह जीत सिर्फ रिकॉर्ड बुक में दर्ज एक और स्वर्ण पदक नहीं है। यह उस खिलाड़ी की कहानी है जिसने भूख पर काबू पाया, दबाव को हराया, असफल शुरुआत से वापसी की और तिरंगे को सर्वोच्च स्थान पर पहुंचाने के अपने संकल्प को पूरा किया। शायद यही वजह है कि मीराबाई चानू सिर्फ एक चैंपियन नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा का दूसरा नाम हैं।
भारोत्तोलन क्वीन मीराबाई चानू
Summary :
जब मीराबाई चानू ने ग्लासगो में 2026 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद आंसू बहाए तो वह क्षण वर्षों की चोटों, असफलताओं और बलिदानों को दर्शाता था। भारतीय भारोत्तोलक ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में कुल 190 किलोग्राम भार उठाकर राष्ट्रमंडल खेलों में लगातार तीसरा स्वर्ण पदक हासिल किया जिससे भारत को खेलों में पहला स्वर्ण पदक मिला। जीत के बाद चानू ने कहा कि उनके आंसू उन संघर्षों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन पर उन्होंने अपने पूरे करियर में विजय प्राप्त की है। मणिपुर के नोंगपोक काकचिंग से लेकर ओलंपिक पोडियम और राष्ट्रमंडल खेलों तक, उनकी…



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