युद्ध हो या जीवन, कुछ हार मिलती हैं तो कुछ जीत भी किंतु केवल हार-जीत का लेखा-जोखा रखने के बजाय समग्र परिणाम का आंकलन करना अधिक आवश्यक होता है। यदि हालिया विरोध-प्रदर्शनों को इसी कसौटी पर परखा जाए तो समग्र निष्कर्ष यही निकलता है कि शुक्र है, आंदोलन समाप्त हुआ। शुक्र है संबंधित मंत्री ने इस्तीफा दिया और यदि वास्तव में किसी विदेशी हस्तक्षेप या वित्त पोषण की भूमिका थी तो वह भी समाप्त हो गई।
अब सकारात्मक पक्षों पर दृष्टि डालें। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश की शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा तथा उसमें व्यापक सुधारों के सुझाव देने के लिए एक उच्चस्तरीय कार्यबल के गठन की घोषणा। कानूनी मोर्चे पर भी प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि उनकी सरकार संसद में एक संशोधन विधेयक लाएगी, जिसके माध्यम से न्यायालयों में समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित की जाएगी तथा परीक्षाओं की पवित्रता बनाए रखने और प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाओं पर रोक लगाने के लिए मौजूदा कानून को और अधिक सशक्त बनाया जाएगा। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने इस उद्देश्य से विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन की भी घोषणा की।
सरकार ने परीक्षा संबंधी धोखाधड़ी के मामलों में कड़ी कार्रवाई करने का संकेत दिया है। सरकार का मानना है कि हाल के वर्षों में प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा में अनियमितताओं की घटनाओं ने सार्वजनिक परीक्षाओं की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े किए हैं। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य वर्ष 2024 में बनाए गए उस कानून को और अधिक प्रभावी बनाना है जिसे प्रश्नपत्र लीक से जुड़े अनेक विवादों के बाद लागू किया गया था। अब नीट परीक्षा से जुड़े नए विवादों और विरोध प्रदर्शनों के मद्देनज़र इस कानून को और कठोर बनाया जा रहा है। प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार, प्रश्नपत्र लीक जैसे अपराधों में दोषी पाए जाने वालों के लिए 10 वर्ष तक के कारावास तथा 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री का यह बयान उस समय आया, जब कुछ ही दिन पहले छात्रों ने दिल्ली के जंतर-मंतर स्थित प्रदर्शन स्थल से संसद तक मार्च निकालकर प्रश्नपत्र लीक के मामलों में जवाबदेही तय करने की मांग की थी। प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, विशेषकर हालिया परीक्षा विवादों और नीट में जनाक्रोश तेज हो गया था। इसके परिणामस्वरूप व्यापक छात्र आंदोलन हुए और दोषियों के विरुद्ध कड़ी जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग उठी। प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) द्वारा बल प्रयोग किए जाने से भी सरकार और प्रशासन की आलोचना हुई। हालांकि पुलिस ने इन आरोपों से इन्कार किया है, फिर भी ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं कि प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया जिससे अनेक छात्र घायल हुए।
यद्यपि सरकार ने आवश्यक कदम उठाए हैं, फिर भी उसकी इस पहल को लेकर यह आलोचना हो रही है कि यह ‘बहुत कम और बहुत देर से’ उठाया गया कदम है। आलोचकों ने इसे जनाक्रोश को शांत करने और सार्वजनिक विमर्श से कठिन सवालों का ध्यान हटाने का प्रयास बताते हुए ‘महज एक दिखावा’ करार दिया है। कुछ का कहना है कि यह केवल चर्चा का रुख मोड़ने और यह संदेश देने की कोशिश है कि सरकार कुछ कार्रवाई कर रही है। जहां तक उच्चस्तरीय कार्यबल का प्रश्न है, उसके गठन को लेकर मतभेद की बहुत कम गुंजाइश दिखाई देती है। सरकार ने जिन विशेषज्ञों का चयन किया है, उनकी क्षमता और ईमानदारी पर प्रश्नचिह्न लगाना कठिन है। इस छह सदस्यीय उच्चस्तरीय कार्यबल की अध्यक्षता इन्फोसिस टेक्नोलॉजीज़ लिमिटेड के सह-संस्थापक एवं अध्यक्ष नंदन नीलेकणी कर रहे हैं।
कार्यबल के अन्य सदस्यों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ शामिल हैं। उनके नेतृत्व में चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ऐतिहासिक और सफल सॉफ्ट लैंडिंग की थी। वर्ष 1985 में विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र से अपने करियर की शुरुआत करने वाले सोमनाथ ने एलवीएम-3 प्रक्षेपण यान के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने चंद्रयान-2 और चंद्रयान-3 दोनों अभियानों को अंतरिक्ष में पहुंचाया। कार्यबल में एक और महत्वपूर्ण नाम तपन डेका का है, जिन्होंने चार वर्षों तक खुफिया ब्यूरो (आईबी) के निदेशक के रूप में कार्य किया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के निदेशक डॉ. वी. कामकोटी, वरिष्ठ प्रशासक अमृत लाल मीणा तथा पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल को भी शामिल किया गया है।
डॉ. कामकोटी उस शोध दल के नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं, जिसने भारत का पहला स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसर ‘‘शक्ति’’ विकसित किया। इसका उपयोग मोबाइल कंप्यूटिंग उपकरणों और नेटवर्किंग प्रणालियों में किया जा सकता है। वे वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा गठित कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) कार्यबल के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। गुजरात कैडर की भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी करवाल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के निर्माण और क्रियान्वयन की प्रक्रिया से निकटता से जुड़ी रही हैं।
इन नामों या परीक्षा सुधारों के लिए सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों के गैर राजनीतिक विशेषज्ञों को एक मंच पर लाने की पहल पर किसी को भी गंभीर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह वही मुद्दा था जिसने आज की युवा पीढ़ी, जिसे लोकप्रिय रूप से ‘जेन जेड’ कहा जाता है, को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया। यह निर्विवाद है कि सरकार ने अंततः कड़ा रुख अपनाया। इसी क्रम में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद से हटाने का निर्णय भी लिया गया, एक ऐसा कदम, जिसकी संभावना उसके वास्तव में घटित होने तक बेहद क्षीण, बल्कि लगभग असंभव मानी जा रही थी।
वास्तव में, आंदोलनरत छात्रों में से अनेक को इस पर पहले विश्वास ही नहीं हुआ। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कई छात्रों की पहली प्रतिक्रिया थी ‘हमें लगा यह फर्जी खबर है।’ निस्संदेह, सरकार को यह कदम आंदोलन के उग्र होने से पहले ही उठा लेना चाहिए था, जब स्थिति अभी नियंत्रण में थी और युवाओं का असंतोष व्यापक जनांदोलन का रूप नहीं ले पाया था। इसके बजाय दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े रहे, यहां तक कि अंततः सरकार को दबाव के आगे झुकना पड़ा, ऐसी स्थिति, जिससे नरेंद्र मोदी सरकार सामान्यतः बचती रही है और जिसके लिए वह जानी भी नहीं जाती।
दरअसल जब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पहली बार सामने आई, तब उसे लगभग असंभव मांग माना गया। मोदी सरकार की कार्यप्रणाली से परिचित लोग जानते हैं कि यदि कोई एक चीज है जिसके आगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी झुकना पसंद नहीं करते, तो वह है सार्वजनिक दबाव। सरकार द्वारा निर्धारित दायरे में तर्कसंगत संवाद और बातचीत स्वीकार्य हो सकती है, किंतु दबाव की राजनीति नहीं। ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लंबे समय तक एक आदर्शवादी कल्पना मात्र प्रतीत होता रहा। हालांकि यह कदम अंततः उठाया गया लेकिन काफी देर से। वस्तुतः नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए धर्मेंद्र प्रधान को शुरुआत में ही पद छोड़ देना चाहिए था। किंतु यह मोदी सरकार की कार्यशैली नहीं रही है। यह सरकार प्रायः अपने निर्णयों पर अंत तक अडिग रहने के लिए जानी जाती है और इस बार भी उसने वही रुख अपनाया।
दूसरी ओर आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक सोनम वांगचुक समय.समय पर अपनी मांगों और रणनीति में बदलाव करते रहे लेकिन छात्र अपने मूल आग्रह धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अडिग रहे। उनके लिए यह मांग किसी भी परिस्थिति में समझौते योग्य नहीं थी। अंततः छात्रों को वही हासिल हुआ, जिसकी वे लगातार मांग कर रहे थे। वहीं सरकार की अपनी राजनीतिक सीमाएं भी थीं। संसद का संक्षिप्त मानसून सत्र निकट था और परिसीमन विधेयक सहित कई महत्वपूर्ण विधेयक लंबित थे, ऐसे में सरकार के लिए गतिरोध को लंबे समय तक बनाए रखना व्यावहारिक नहीं था। यदि इस पूरे घटनाक्रम में किसी एक व्यक्ति की राजनीतिक या नैतिक साख सबसे अधिक प्रभावित हुई तो वह सोनम वांगचुक रहे। अस्पताल में दो केंद्रीय मंत्रियों से मुलाकात के बाद उन्होंने अपने रुख में नरमी दिखाई। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर दृढ़ रहने के बजाय उन्होंने कहा कि यदि सरकार इस पर विचार भी करती है तो उन्हें स्वीकार होगा। यह रुख न तो स्पष्ट था और न ही आंदोलन की घोषित मांगों के अनुरूप।
इसके बाद जब वांगचुक ने बिना किसी शर्त के अपना अनशन समाप्त करने की घोषणा की तो उसका अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ा। कथित समझौते की प्रक्रिया में अकेले आगे बढ़ने का उनका निर्णय भी अंततः उनके लिए प्रतिकूल सिद्ध हुआ। हालांकि अब यह आंदोलन सोनम वांगचुक के इर्द-गिर्द नहीं रहा। अनशन के दौरान तक जनचर्चा का केंद्र वे थे, लेकिन सरकार के आग्रह पर अनशन समाप्त करने के बाद उनकी विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुंचा। अब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और आंदोलन की समाप्ति के बाद ध्यान पुनः सरकार की ओर है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सार्वजनिक परीक्षाओं की व्यवस्था में घर कर चुकी खामियों को दूर करने के लिए सरकार आगे क्या ठोस कदम उठाती है। इस दिशा में उच्च स्तरीय कार्यबल का गठन तथा विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना निश्चित रूप से एक सकारात्मक और स्वागत योग्य शुरुआत मानी जा सकती है।
कौन जीता, कौन हारा
Summary :
युद्ध हो या जीवन, कुछ हार मिलती हैं तो कुछ जीत भी किंतु केवल हार-जीत का लेखा-जोखा रखने के बजाय समग्र परिणाम का आंकलन करना अधिक आवश्यक होता है। यदि हालिया विरोध-प्रदर्शनों को इसी कसौटी पर परखा जाए तो समग्र निष्कर्ष यही निकलता है कि शुक्र है, आंदोलन समाप्त हुआ। शुक्र है संबंधित मंत्री ने इस्तीफा दिया और यदि वास्तव में किसी विदेशी हस्तक्षेप या वित्त पोषण की भूमिका थी तो वह भी समाप्त हो गई। अब सकारात्मक पक्षों पर दृष्टि डालें। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश की शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा तथा उसमें व्यापक सुधारों…



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