जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो यहां हैं, यहां हैं

Summary :

आखिरकार ​शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। इस्तीफ़े पहले भी हुए हैं। जवाहरलाल नेहरू को कृष्णा मेनन का इस्तीफ़ा, तो इंदिरा गाधी को गृहमंत्री गुलज़ारी लाल नन्दा का तो अटल बिहारी वाजपेयी ने जार्ज फ़र्नांडिस का इस्तीफ़ा लेना पड़ा। मनमोहन सिंह की सरकार में तो कई मंत्री हटाए गए। इन इस्तीफ़ों और धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े में अंतर यह है कि धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफ़ा यूथ जिसे जेन-ज़ी कहा जाता है, के दबाव में लिया गया। जंतर मंतर ने भारी ताकत दिखाई और हालात बदलने का बहुत प्रयास किया लेकिन तीन सप्ताह के बाद सीजेपी से वार्ता शुरू…

आखिरकार ​शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। इस्तीफ़े पहले भी हुए हैं। जवाहरलाल नेहरू को कृष्णा मेनन का इस्तीफ़ा, तो इंदिरा गाधी को गृहमंत्री गुलज़ारी लाल नन्दा का तो अटल बिहारी वाजपेयी ने जार्ज फ़र्नांडिस का इस्तीफ़ा लेना पड़ा। मनमोहन सिंह की सरकार में तो कई मंत्री हटाए गए। इन इस्तीफ़ों और धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े में अंतर यह है कि धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफ़ा यूथ जिसे जेन-ज़ी कहा जाता है, के दबाव में लिया गया। जंतर मंतर ने भारी ताकत दिखाई और हालात बदलने का बहुत प्रयास किया लेकिन तीन सप्ताह के बाद सीजेपी से वार्ता शुरू की गई, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए, सख्त एग्ज़ाम बिल लाया जा रहा है, हायर एजुकेशन सैक्रेटरी का तबादला किया गया, एनटीए से 47 अफ़सरों को हटा दिया गया। प्रभाव मिलता है कि जिस राजनीतिक दल का एंटीना बहुत तेज है, उसका उस पीढ़ी से सम्पर्क नहीं जो भारत का भविष्य है। जेन जी के देशभर में फैले प्रदर्शनों से सरकार को समझ आ गई कि अगर धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफ़ा नहीं लिया गया तो हालात हाथ से निकल सकते है। नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में यह हो कर हटा है। यह भी अहसास था कि अगर इसे ठंडा न किया गया तो बाहरी ताक़तें दख़ल दे सकती हैं। यह भी घबराहट थी कि हिन्दू मिडल क्लास जो भाजपा को समर्थन दे रही है, अपने बच्चों के लिए कम हो रहे मौकों के कारण ख़फ़ा है। बढ़ते आरक्षण कोटा के कारण भी जो बाहर रह गए हैं वह नाराज़ हो रहे हैं। राहुल गांधी चाहे इस हालात का फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं, पर जाति जनगणना पर उनके लगातार ज़ोर से समस्या और बढ़ जाएगी। कब तक इस देश में मैरिट को नकारा जाएगा, जबकि स्पर्धा चीन जैसे देश से है। इस बीच 20 जुलाई आ गई जब कॉकरोच जनता पार्टी ने ‘संसद चलों’ का आह्वान दिया था। अनुमान है कि 75000 युवा वहां इकट्ठे हुए थे। उस शांत प्रदर्शन पर बर्बर लाठीचार्ज किया गया। यहां तक कि उस पैलेट (छर्रे) गन का इस्तेमाल किया गया जो कश्मीर में किया गया था। बड़े-बड़े पुलिस वाले छोटी-छोटी लड़कियों को पीट रहे थे। इसकी इजाज़त कैसे दी गई? देश की राजधानी में पैलेट गन कैसे चल गई? जब एक निहत्थे प्रदर्शनकारी को घेर कर पुलिस वाले पीट रहे थे तो वह बीच में डट गया और ललकारते कहने लगा, ‘मारो…और मारो’ इस दृश्य ने तो गांधी जी के सत्याग्रह की याद ताज़ा कर दी। घटनास्थल पर सादे कपड़ों में कील लगी लाठियां उठाए कौन थे? राज्य अपने युवाओं पर हिंसा की इजाज़त क्यों दे? बिहार में सिवान में तो एक पुलिसकर्मी एके 47 उठाए हुआ था। हां, वही एके 47 जो आतंकियों के खिलाफ इस्तेमाल की जाती है।
इन युवाओं ने एक और काम किया। इन्होंने देश से भय का वातावरण उड़ा दिया। देश की ज़ुबान खोल दी। लोकतंत्र में जान फूंक दी। 20 जुलाई की ज़्यादती के बाद जंतर-मंतर पर संख्या कम होने की जगह बहुत बढ़ गई। बिहार ने कई जगह झड़पें हो चुकी हैं। मुम्बई का वह दृश्य भी याद रहेगा जब हुडी डाले रिया अहीर छात्रों को ले जा रही, पुलिस वैन के आगे खड़ी हो गई और तब तक नहीं हटीं जब तक छात्रों को छोड़ नहीं दिया गया। उसका कहना था कि जब अधिकारी सही काम नहीं करते तो आम आदमी को दखल देनी पड़ती है। यह पीढ़ी अलग है। ईडी या सीबीआई या दूसरी सरकारी संस्थाओं से बड़ों को तो सरकार क़ाबू कर सकती है, पर युवा नहीं डरते। अपने मीम्स से, रील्स से, कार्टून से, व्यंग्य से, गानों से, इंस्टा से, उन्होंने इतनी बड़ी सरकार के घुटने टेक दिए। वह कह रहे हैं कि लोकतंत्र में अपने लिए आवाज़ उठाना बदतमीज़ी नहीं है, अगर साहिर लुधियानवी आज होते तो इस पीढ़ी के बारे ज़रूर लिखते, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो यहां हैं, यहां है! एक और समस्या है। देश की राजनीति की पुरानी पीढ़ी, राजनीति में, संसद में, ज्यूडीशरी में, या अफसरशाही में, कई घरों में भी, वह नए भारत की ज़रूरत या आकांक्षा को समझ नहीं रही। प्रधानमंत्री को अपने मंत्रियों से कहना पड़ा कि वह भी इंस्टा का इस्तेमाल करें लेकिन जो शाखा में बड़े हुए हैं वह इंस्टा पर क्या करेंगे?अयोध्या में चंदा चोरी से ध्यान हटाने के लिए योगी आदित्य नाथ मथुरा शुरू करने की धमकी दे रहे हैं। यह लोग कब समझेंगे कि इन सिक्कों का चलन बंद हो चुका है? जन्तर मंतर पर पूरा सौहार्द देखने को मिला। प्रदर्शन जाति, धर्म, क्षेत्र या वर्ग की पहचान से उपर था। जब उन्हे ‘हिन्दू विरोधी’ कहा गया तो उन्होंने भजन गाने शुरू कर दिए। और भजन पर मस्त हो जो नौजवान नाच रहा था,वह मुसलमान था। कई जिन्होंने भाजपा को वोट दिया के बच्चे आंदोलन में हिस्सा ले रहे थे। यह एक नया भारत उभर रहा जिसका सत्तारूढ़ लोगों को साथ रिश्ता नही है। आरएसएस के लिए भी आत्म मंथन की घड़ी है, क्योंकि यह पीढ़ी शाखा में नहीं जाएगी। इस पर सोच या विचारधारा थोपी नहीं जा सकती। मोबाइल या लैपटॉप या इंटरनेट ही इनका संसार है। इन्हें औरंगजेब की कब्र की चिन्ता नहीं है।
वो हिन्दोस्तान जो हमारी पीढ़ी और हमारे बाद की पीढ़ी ने खो दिया था, उसे हासिल करने का प्रयास यह जेन-ज़ी कर रही है। सरकारी दबाव के बावजूद जंतर मंतर में 75000 युवा इकट्ठे हो गए थे, से आशा बनती है कि हम सब कुछ खो नहीं बैठे। युवाओं का यह संदेश भी है कि ‘हिन्दू-मुसलमान’ बहुत हो चुका है। अब काम की बात करो। बनारस के पास गंगा में किश्ती में बैठ कर बिरयानी खाने वाले मुसलमान तीन महीने से बिना ज़मानत क़ैद में हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस भुयान ने ख़ुद सवाल किया है कि गंगा में चिकन बिरयानी खाना अपराध कैसे हो गये? पर समस्या यह है कि ज्यूडीशरी भी संवेदनशील नहीं रही जो छात्र प्रदर्शन के बारे उदासीन रवैये से पता चलता है। अब कुछ बदला है, जो पहले कहते थे कि हमारा समय बर्बाद न करो, अब कह रहे हैं कि शांतिमय प्रदर्शन का अधिकार है और पुलिस की ज़्यादती न्यायोचित नहीं है।
लोकतंत्र तब संवरता है जब नागरिक इसकी रक्षा करने के लिए संघर्ष करते हैं और सरकार उनकी आलोचना को और उनके असहमति के अधिकार की इज्जत करती है। यहां यह रुक गया था इसीलिए इतना विस्फोट हुआ है। एक बात और। भारत जैसे विविधता पूर्ण देश में एक विचारधारा थोपी नहीं जा सकती। सब कुछ का केन्द्रीयकरण नहीं हो सकता। वन दिस, वन डेट, यहां नहीं चलेगा। हम बहुत अलग-अलग क़िस्म के लोग हैं। एक ही बात हमें जोड़ती है, हमारी राष्ट्रीयता, हमारी देशभक्ति। दायली दायनू नगालैंड के आम नागरिक हैं। छात्र प्रदर्शन के दौरान उन्होंने 67-68 हज़ार रुपए के पीज़ा जंतर मंतर के लिए आर्डर किए। आदेश था कि जो भूखा है उसे दे देना। उनका कहना था कि मैं वहां जा तो नहीं सकता, पर कम से कम एकता तो दिखा सकता हूं। एक ने कोचि से खाना भेजा इस संदेश के साथ ‘फ्रोम केरल विद लव’। हैदराबाद से एक बुज़ुर्ग ने खाना भेजते वक्त डिलीवरी ब्वाय को कहा, ‘बेटा, तुम भी अपना लंच इस आर्डर से खा लेना’। कइयों ने अमेरिका, कैनेडा, यूके से जंतर-मंतर के लिए आर्डर भेजे थे। देश के हर कोने से लोग उनके लिए खाना भेज रहे थे जिन्हें वह जानते भी नहीं। यह वह भारत था जिसे हम लड़ाई-झगड़े में खो बैठे थे।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2002 और 2025 के बीच पेपर लीक के जो 45 बड़े मामले हुए थे, में केवल 2 को सजा मिली थी। केवल 2, आगे क्या बेहतरी होगी? इस सरकार में जवाबदेही क्यों नहीं है? प्रधानमंत्री ने ऐलान किया है कि नंदन नीलेकणिके नेतृत्व में हाईपावर टास्क फ़ोर्स बनेंगी जो परीक्षा व्यवस्था में सुधार लाएगी। यह अच्छा कदम है पर पर्याप्त नहीं है। समस्या केवल परीक्षा तंत्र की ही नहीं है, असली समस्या ढहते शिक्षा तंत्र को सही करना है। उसे आज की परिस्थितियों, चुनौतियों और मौकों के लिए तैयार करना है। बड़ा काम युवाओं का विश्वास फिर हासिल करना है। अमेरिका की कोलम्बिया यूनिवर्सिटी की प्रो. नीरज कौशल ने लिखा है कि ‘जेन-जी की हताशा को सम्भालना भारत की सबसे कठिन राजनीतिक चुनौती होगी’।
हमारे युवाओं के सामने जो चुनौती है वह बहुत विशाल है। अधिकतर को सही शिक्षा नहीं मिलती। जिन्हें मिलती है उन्हें जॉब नहीं मिलती। डिग्री की संख्या बढ़ी है, उसकी गुणवत्ता नहीं। जब से यह सरकार आई है बजट में शिक्षा पर प्रतिशत खर्च पहले से आधा रह गया है। दुनिया में तेज़ी से आ रहे टेक्नाेलाॅजिकल परिवर्तनों ने पुराने सिस्टम को अप्रासंगिक बना दिया है। बहुत आशंका है कि नौकरियां बढ़ने की जगह कम होती जाएंगी। चीन का उत्थान उस समय शुरू हुआ जब उन्होंने प्रशिक्षित वर्क फ़ोर्स पर ध्यान देना शुरू किया। हमें इस दौड़ में शामिल होना है। बेहतर होगा कि किसी प्रोफेशनल को इस मंत्रालय का भार सम्भाला जाए।
हमारी शिक्षा व्यवस्था एआई युग के लिए तैयार नहीं है। सीजेपी को भी सरकार को ब्लू प्रिंट सौंपना चाहिए कि वह क्या सुधार चाहते हैं? बहुत ज़रूरी है कि शिक्षा संस्थाओं को स्वायत्ता दी जाए और शिक्षा को भी सरकारी विभाग की तरह न चलाया जाए। उसका क्या नुक्सान होता है, यह हमारे सामने ही है।

चन्द्रमोहन