केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सम्मान और प्रतीकों का अपमान रोकने के लिए संशोधन बिल पास कर दिया है। इसमें राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के अपमान या बेअदबी को कानूनी सुरक्षा देते हुए इसे क्रििमनल अफैंस बनाया गया है। इस संशोधन में वंदे मातरम् को राष्ट्रीय सम्मान के अपमान को रोकथाम एक्ट 1971 के तहत राष्ट्रीय गान जन-गण-मन के बराबर रखा गया है और इसका उल्लंघन करने पर 3 साल तक की जेल की सजा हो सकती है। वंदे मातरम् गीत को लेकर देश में जमकर सियासत होती रही है। अब जाकर इस गीत को सम्मान मिला है। इसका श्रेय भारतीय जनता पार्टी को मिलना ही चाहिए। ब्रिटिश शासन के दौरान देशवासियों के दिलों में स्वतंत्रता की भावना जगाने के लिए सिर्फ दो शब्द थे-वंदे मातरम्। देश के लिए सर्वोच्च त्याग करने की प्रेरणा देशवासियों को इसी गीत से मिली थी। पीढ़ियां बदल गईं परन्तु वंदे मातरम् का प्रभाव अक्षुण्ण बना हुआ है। बंगाल के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने 1880 में आनंदमठ शीर्षक से उपन्यास लिखा था जिसे कलकत्ता की बंग दर्शन मासिक पत्रिका ने उसे धारावाहिक के रूप में प्रकाशित किया था। इस उपन्यास में वंदे मातरम् का समावेश किया गया था।
हालांकि बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने उपन्यास लिखने के 5 वर्ष पहले ही इसे लिख दिया था लेकिन इस गीत को लोकप्रियता आनंदमठ से ही मिली। उन दिनों बंगाल में बंग भंग आंदोलन उफान पर था। दूसरी ओर महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने जनभावनाओं को जागृत कर दिया था। बंग भंग आंदोलन और असहयोग आंदोलन दोनों में वंदे मातरम् ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के लिए यह गीत पवित्र ऋचा बन गया। सन् 1896 में कलकत्ता में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ, उस अधिवेशन की शुरूआत इसी गीत से हुई और इसके गायक थे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर। इस एक गीत ने भारतीय युवाओं को एक नई िदशा दी। मातृभूमि को सुलजाम, सुफलाम बनाने के लिए प्रेरित किया और यह राष्ट्र चेतना का प्रतीक बन गया। सविनय अवज्ञा, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन के हर सत्याग्रही के होठों पर यही स्वर था। यह गीत उन शहीदों की अंतिम पुकार बना जिन्होंने फांसी के फंदे को चूमा। जिनमें राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्ला, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, खुदीराम बोस और अनगिनत बेनाम क्रांतिकारी थे।
24 पक्तियों के इस छंद का पहला छंद मातृभूमि की प्राकृतिक गरिमा, सौंदर्य और समृद्धि का बखान करता है, दूसरे छंद में कवि ने मातृभूमि को सशक्त माता के रूप में चित्रित किया है जो अपनी सात करोड़ संतानों की सामूहिक शक्ति से शत्रुओं का संहार करती है। तीसरे और चौथे छंद में देवी मां की तुलना दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती से की गई है जो क्रमशः शक्ति, संपदा और ज्ञान की प्रतीक हैं। इस प्रकार, बंकिम चंद्र ने भारत माता को न केवल भूमि के रूप में, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में भी चित्रित किया। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने सर्वप्रथम ‘वंदे मातरम्’ को गाया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता एक मुस्लिम नेता रहीमतुल्ला मोहम्मद सयानी ने की थी। इस गीत की प्रतिध्वनि दक्षिण तक पहुंची। तमिल कवि सुब्रमण्य भारती ने इसे तमिल में गाया और पंतलु ने इसे तेलुगू में रूपांतरित किया परंतु दुखद यह है कि समय के साथ राजनीति ने इस गीत को ‘तुष्टिकरण राग’ में बदल दिया। कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन में जब प्रसिद्ध संगीतज्ञ पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने ‘वंदे मातरम्’ का गायन आरंभ किया तो अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद जौहर अली ने आपत्ति जताई। 1906 में मुस्लिम लीग के गठन के साथ ही यह विरोध संगठित रूप लेने लगा और कहा कि यह गीत एकेश्वरवाद के सिद्धांत के विपरीत है। मौलाना आज़ाद ने यह मध्य मार्ग सुझाया “गीत के पहले दो पद पूर्णतः सांस्कृतिक और भौतिक वर्णन हैं, इन्हें राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।” 1937 में कांग्रेस ने आधिकारिक निर्णय लिया कि केवल पहले दो पद ही राष्ट्रगीत के रूप में मान्य होंगे।
संविधान सभा में भी अनेक सदस्य चाहते थे कि वंदे मातरम् को राष्ट्र गान बनाया जाये लेकिन विवाद की स्थित को देखते हुए माध्यम मार्ग अपनाया गया और 24 जनवरी, 1950 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में घोषणा की कि “जन-गण-मन” भारत का राष्ट्रगान होगा। ‘वंदे मातरम्’, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे समान सम्मान दिया जाएगा। अनुच्छेद 51ए (ए) का वास्तविक पाठ- “प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन करे तथा उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे।” इसमें राष्ट्रगीत अर्थ वंदे मातरम् का उल्लेख नहीं किया गया, क्या समस्या थी, वास्तव में ये राष्ट्र की आत्मा के साथ खिलवाड़ है ? महात्मा गांधी ने कहा-“इस गीत ने लाखों को मृत्यु से नहीं, निर्भयता से जोड़ा” लेकिन विडंबना यह रही कि जिस गीत ने “आज़ादी” को जन्म दिया, उसे “आज़ाद भारत” में कानूनी दर्जा नहीं मिला। संविधान ने सम्मान दिया, पर दर्जा नहीं, हमारे मूल कर्त्तव्यों (अनुच्छेद 51ए) में “राष्ट्रगान” और “राष्ट्रध्वज” का उल्लेख है, पर “राष्ट्रगीत” का नहीं।
मैं इतिहास के पन्नों में ज्यादा नहीं जाना चाहता। मुस्लिम विरोध मुख्य रूप से धार्मिक है, न कि राष्ट्र विरोधी। यानी मुस्लिम इससे धार्मिक कारणों से परहेज़ करते हैं। इस्लाम में तौहीद (अल्लाह एक) मूल सिद्धांत है, यानी इस्लाम अल्लाह के अलावा किसी अन्य के आगे सिर झुकाने या उसकी पूजा करने पर रोक लगाता है। इस गीत में भारत को “देवी” के रूप में चित्रित किया गया है (जैसे दुर्गा की स्तुति)। दारुल उलूम देवबंद ने इसे गाने पर पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया। जबकि जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने फतवा जारी किया कि मुसलमान केवल पहले दो छंद गा सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्ष वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरा होने पर राष्ट्र गीत को पूर्ण सम्मान देने का संकल्प लिया था। उन्होंने राजनीति से उठकर राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को मजबूत करने के लिए कानूनी कदम उठाया है। अब सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से पहले वंदे मातरम् का गान होगा। हर देशवासी का दायित्व है कि वह राष्ट्रगान की ही तरह राष्ट्रीय गीत का सम्मान करें।
वंदे मातरम् राष्ट्र चेतना का प्रतीक
Summary :
केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सम्मान और प्रतीकों का अपमान रोकने के लिए संशोधन बिल पास कर दिया है। इसमें राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के अपमान या बेअदबी को कानूनी सुरक्षा देते हुए इसे क्रििमनल अफैंस बनाया गया है। इस संशोधन में वंदे मातरम् को राष्ट्रीय सम्मान के अपमान को रोकथाम एक्ट 1971 के तहत राष्ट्रीय गान जन-गण-मन के बराबर रखा गया है और इसका उल्लंघन करने पर 3 साल तक की जेल की सजा हो सकती है। वंदे मातरम् गीत को लेकर देश में जमकर सियासत होती रही है। अब जाकर इस गीत को सम्मान मिला है।…



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