दक्षिण भारत में भाजपा की तेज पदचाप

Summary :

देश की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी जिस प्रकार दक्षिण भारत में अपने पांव पसार रही है, उसके पीछे इस पार्टी के राजनीतिक रचनाकार व चाणक्य कहे जाने वाले गृहमन्त्री श्री अमित शाह का दिमाग समझा जाता है। श्री शाह के बारे में एक कहावत प्रसिद्ध है कि वह जहां एक ओर भाजपा की चुनावी मशीनरी के प्रमुख संचालक हैं वहीं दूसरी ओर कुशल सांसद विद भी हैं और सड़क से लेकर संसद तक अपनी पार्टी की दृढ़ व सैद्धान्तिक छवि के रचियता भी हैं। पूर्व में उनकी अध्यक्षता में पार्टी श्री नरेन्द्र मोदी के प्रशासनिक नेतृत्व में जहां उत्तर भारत…

देश की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी जिस प्रकार दक्षिण भारत में अपने पांव पसार रही है, उसके पीछे इस पार्टी के राजनीतिक रचनाकार व चाणक्य कहे जाने वाले गृहमन्त्री श्री अमित शाह का दिमाग समझा जाता है। श्री शाह के बारे में एक कहावत प्रसिद्ध है कि वह जहां एक ओर भाजपा की चुनावी मशीनरी के प्रमुख संचालक हैं वहीं दूसरी ओर कुशल सांसद विद भी हैं और सड़क से लेकर संसद तक अपनी पार्टी की दृढ़ व सैद्धान्तिक छवि के रचियता भी हैं। पूर्व में उनकी अध्यक्षता में पार्टी श्री नरेन्द्र मोदी के प्रशासनिक नेतृत्व में जहां उत्तर भारत की पार्टी की छवि से मुक्त हुई और इसने पश्चिमी भारत से लेकर पूर्वोत्तर तक के राज्यों में अपनी गहरी पकड़ बनाई वहीं अब यह दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य से निकल कर अन्य राज्यों तमिलनाडु व केरल तक में जोरदार दस्तक दे रही है।
केरल में हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत जहां गुणात्मक रूप से बढ़ा है, वहीं राज्य की राजधानी तिरुवनन्तपुरम् महानगर निगम पर इसका कब्जा हो गया है और पहली बार भाजपा का महापौर निर्वाचित हुआ है, मगर दक्षिण भारत का तमिलनाडु राज्य बहुत मायनों में अपनी विशिष्ट द्रविड़ संस्कृति की वजह से अन्य दक्षिणी राज्यों में विशेष स्थान रखता है और इसकी दलित उत्थान व गैर ब्राह्मणवाद की राजनीति कोतूहल से देखी जाती रही है। सामाजिक आरक्षण की जनक तमिलनाडु की राजनीति में भाजपा के पांव जमाने के लिए ज्यादा स्थान नहीं माना जाता था, मगर पिछले पांच वर्षों से इस राज्य में भी भाजपा का प्रभाव बढ़ा है और इसने तमिल संस्कृति के मानबिन्दुओं को केन्द्र में रखकर अपनी राजनीति में चमक पैदा की है। श्री शाह की रणनीति का यह विशेष अंग है कि वह दक्षिण की राजनीति में भी भाजपा के लिए स्थान बनाने में सफल होते दिख रहे हैं। इसका प्रमाण हाल ही में मदुरै के निकट थिरूपरकुंडरम् की पहाड़ी पर स्थित हिन्दू मन्दिर का कार्तिगई दीपम् प्रज्वलितकरे जाने का मामला है। इस पहाड़ी पर एक मुस्लिम सन्त की दरगाह भी है और जैन मतावलम्बियों की भी तीर्थ स्थली है। दीप जलाये जाने को लेकर अदालतों में विवाद पिछले लम्बे अर्से से चलता रहा जबकि इस पहाड़ी पर सैकड़ों वर्षों से दीप जलाया जाता रहा था, मगर बीसवीं सदी के शुरू और 19वीं सदी में अंग्रेज सरकार ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने दीप जलाये जाने की अनुमति देकर इस विवाद को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है मगर तमिलनाडु की द्रमुक पार्टी की स्टालिन सरकार इस फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय जा रही है जिससे पूरा मामला सनातन आस्था व इसके खिलाफ की शक्तियों के बीच का हो गया है। इस मामले में भाजपा के राज्य स्तरीय नेताओं की बहुत सक्रिय भूमिका दीप जलाने के हक को लेकर रही है जिसका राजनीतिक असर जमीन पर पड़ना बहुत स्वाभाविक माना जा रहा है। तमिलनाडु में इस हिन्दू सांस्कृतिक चेतना के अलावा श्री शाह विशुद्ध राजनीतिक क्षेत्र में भी वह समीकरण स्थापित कर देना चाहते हैं, जिससे राज्य की सत्तारूढ़ द्रमुक-कांग्रेस सरकार को घेरा जा सके और उसके समक्ष राजनीतिक विरोध का सशक्त चक्रव्यूह निर्मित हो सके। सर्वविदित है कि पिछले 40 साल से तमिलनाडु की राजनीति द्रमुक व अन्नाद्रमुक पार्टियों के बीच ही घूम रही है। फिल्म अभिनेत्री जयललिता के जीवित रहते अन्नाद्रमुक पार्टी के भीतर कभी कोई नेतृत्व संकट पैदा नहीं हुआ मगर उनकी मृत्यु के बाद यह पार्टी कई गुटों में बंट चुकी है। श्री शाह की कोशिश है कि इस पार्टी के सभी गुट एक मंच पर आयें और भाजपा के साथ गठबन्धन में शामिल हों, जिससे इसी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में स्टालिन सरकार को बेदखल किया जा सके, मगर श्री शाह की कोशिश केवल अन्नाद्रमुक को ही एनडीए गठबन्धन में शामिल करने की नहीं है बल्कि उन छोटे क्षेत्रीय दलों को भी इसका हिस्सा बनाने की है जिनका अपने-अपने अंचलों व जातिवर्ग समूहों में अच्छा प्रभाव माना जाता है। इनमें श्री अन्बुमनी रामदास के नेतृत्व वाली पट्टली मक्कल काछी (पीएमके) पार्टी एनडीए में शामिल हो गई है। श्री रामदास पहले भी एनडीए में रह चुके हैं और वाजपेयी सरकार के दौरान वह केन्द्र में स्वास्थ्यमन्त्री थे।
श्री शाह की कोशिश यह है कि द्रमुक के खिलाफ राज्य में एनडीए के छाते तले एक एेसा मजबूत मोर्चा बनाया जाये जिससे राज्य की राजनीति सीधे दो ध्रुवीय हो सके। स्टालिन सरकार पिछले पांच साल से राज्य में सत्तारूढ़ है और इसके खिलाफ सत्ता विरोधी भावनाएं भी आम मतदाताओं में देखी जा रही है। अतः सत्ता विरोधी वोटों की गोलबन्दी के लिए श्री शाह पूरी कोशिश में हैं और इसके लिए अपनी पार्टी के हितों को ऊपर रखने की जगह एनडीए के हितों को रख रहे हैं। श्री शाह की रणनीति है कि द्रमुक के खिलाफ खेल रही हर राजनीतिक पार्टी को एनडीए में शामिल किया जाये मगर इसके लिए अन्नाद्रमुक का भाजपा के साथ आना बहुत जरूरी है, क्योंकि इस पार्टी के क्षेत्रीय नेतृत्व में ही द्रमुक को पटखनी दी जा सकती है। इस सिलसिले में श्री अमित शाह अन्नाद्रमुक के नेता व पूर्व मुख्यमन्त्री ई.के. पलानीस्वामी से भी भेंट कर चुके हैं और एनडीए के विस्तार पर दोनों नेताओं के बीच विशुद चर्चा हुई है। इसी से प्रेरित होकर पलानीस्वामी राज्य के छोटे –छोटे क्षेत्रीय दलों को एनडीए में लाने की रणनीति पर जुट गये हैं, परन्तु भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व यह भी चाहता है कि खुद अन्नाद्रमुक पार्टी से पूर्व में छिटक कर जो नेता अलग हो चुके हैं उन्हें भी एनडीए से जोड़ा जाये। इस सिलसिले में एक और पूर्व मुख्यमन्त्री श्री ओ. पनीरसेल्वम एवं टीटीवी दिनाकरन का नाम लिया जा रहा है। इन नेताओं की क्षेत्रीय पार्टी पिछले साल तक एनडीए का ही हिस्सा थी। वैसे पूर्व में अन्नाद्रमुक भी एनडीए में थी, मगर पिछले साल इसने अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया था, अब विधानसभा चुनावों के नजदीक आने पर इस पार्टी के नेता पलानीस्वामी ने अपनी भूल को सुधारने का फैसला किया है। इसकी वजह यह भी मानी जा रही है कि अन्नाद्रमुक अकेले द्रमुक का मुकाबला नहीं कर सकती क्योंकि जयललिता की मृत्यु के बाद पार्टी की लोकप्रियता में कमी आई है, वहीं दूसरी ओर भाजपा राज्य में उभरती हुई राजनीतिक ताकत मानी जा रही है, मगर इसकी भी वह ताकत नहीं है कि यह अकेले ही द्रमुक का मुकाबला कर सके उसके प्रभाव की यह शुरूआत भर मानी जा रही है। भाजपा इसी वजह से अन्नाद्रमुक की आन्तरिक समीकरणों को भी देख रही है और कोशिश कर रही है दिनाकरन व पलानीस्वामी के बीच सन्धि हो क्योंकि दोनों नेताओं का ही प्रभावशाली तेवर पिछड़ी जाति के लोगों में अच्छा प्रभाव माना जाता है। इसके साथ ही राज्य में फिल्म अभिनेता विजय की टीवीके पार्टी भी अपने पांव पसारने की फिक्र में दिखाई पड़ रही है। विजय की राजनीति भाजपा व द्रमुक दोनों के ही विरोध पर टिकी हुई है। अतः भाजपा की रणनीति यह भी हो सकती है कि यदि विजय एनडीए का हाथ थामने में संकोच करें तो वह अन्नाद्रमुक के साथ मिलकर गठबन्धन बनाये और भाजपा अन्य विपक्षी छोटे दलों के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़े जिससे द्रमुक विरोधी वोटों का बंटवारा कम से कम हो सके और माहौल द्रमुक व स्टालिन सरकार के खिलाफ बन सके, मगर इस रणनीति के सिरे चढ़ने की संभावनाएं कम ही दिखती हैं, क्योंकि अभिनेता विजय द्रमुक के खिलाफ अकेले ही भिड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ते दिखाई पड़ रहे हैं। विजय की पार्टी भी यदि अकेले चुनाव लड़ती है तो उससे मजबूत एनडीए के होने की वजह से विधानसभा चुनावों में मुकाबला त्रिकोणात्मक होगा, जिसमें बाजी किधर भी जा सकती है और चुनाव बाद नये गठबन्धन बनने का विकल्प बन सकता है, वैसे भाजपा की कोशिश है कि विजय की पार्टी एनडीए में ही शामिल होकर स्टालिन का विरोध करे।
अतः एनडीए को चुनाव पूर्व इतना शक्तिशाली बना दिया जाये कि अभिनेता विजय को भी अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़े।

Team Desk