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इंडिया गठबन्धन की टूट-फूट ?

सात महीने पहले जब बिहार की राजधानी पटना में इस राज्य के मुख्यमन्त्री श्री नीतीश कुमार ने देश के प्रमुख विपक्षी दलों का एक महागठबन्धन बनाने की नींव यह कहते हुए डाली थी कि कांग्रेस पार्टी की शिरकत के बिना कोई भी ऐसा राजनैतिक गठबन्धन नहीं बन सकता जिसमें भाजपा का विकल्प बनने की क्षमता हो तो साफ था कि लोकसभा चुनावों में विपक्ष प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और भाजपा के चुनावी तन्त्र का मुकाबला करने के लिए अपना मजबूत विमर्श संयुक्त रणनीति के जरिये पेश करने जा रहा है। परन्तु अफसोस की बात है कि अभी तक इस मोर्चे पर विपक्षी गठबन्धन का नाम केवल ‘इंडिया गठबन्धन’ रखने के अलावा और कोई खास काम नहीं हुआ है बल्कि इसके उलट इंडिया गठबन्धन में शामिल कई राज्यों के क्षेत्रीय दल अपनी अलग-अलग ढपली बजाते नजर आ रहे हैं। मगर राजनीति में हमेशा वही सच नहीं होता है जो ऊपर से नजर आता है। असली सच राजनीति के पर्दे के पीछे छिपा हुआ रहता है इसी वजह से राजनीति को विज्ञान भी कहा जाता है।
असली राजनीतिक विज्ञान वही कहा जाता है जिसमें ‘शेर को चींटी’ से मरवा दिया जाता है। अतः इंडिया गठबन्धन की सदस्य प. बंगाल की तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा ममता दीदी ने जिस प्रकार तैश में यह बयान दिया है कि राज्य में कांग्रेस पार्टी के साथ उनकी सीटों के बंटवारे पर कोई बात नहीं हो रही है और उनकी पार्टी अपने दम पर ही सभी 42 सीटों पर चुनाव लड़ेगी मूलतः भाजपा को राज्य की राजनीति में बहुत निचले पायदान पर रखने की ही रणनीति है जिससे कांग्रेस न समझ हो रही है, ऐसा नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार पंजाब की सभी 13 सीटों पर अपने बूते पर ही लड़ने का ऐलान जिस तरह आम आदमी पार्टी के मुख्यमन्त्री भगवन्त सिंह मान ने किया है उसका लक्ष्य भी भाजपा को लड़ाई से बाहर रखने का ही है। प. बंगाल में 2011 में ममता दी ने मार्क्सवादी या वामपंथी पार्टियों का 34 वर्ष का शासन समाप्त करके सत्ता हथियाई थी। अतः वामपंथी पार्टियां उनकी दुश्मन नम्बर एक हैं। परन्तु पिछले चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने स्वयं को ममता दी की मुख्य प्रतिद्वन्द्वी बनाने में सफलता प्राप्त कर ली जिसकी वजह से वोटों का ध्रुवीकरण इन दोनों दलों के बीच ही हो गया और पारंपरिक वामपंथी वोट बैंक ममता विरोध में भाजपा के साथ चला गया और 2019 में इसकी 18 लोकसभा सीटें आयीं जबकि ममता दी 22 सीटें ही जीत पाईं जबकि 2014 में उनकी 34 सीटें थीं।
इंडिया गठबन्धन की सदस्य हालांकि मार्क्सवादी पार्टी भी है मगर वह अपने वोट बैंक को भाजपा के साथ जाने से बचाना चाहती है औऱ ममता दी के कड़े विरोधी की तरह दिखनी चाहती है। कांग्रेस की स्थिति इससे थोड़ी अलग है। वह न मार्क्सवादी पार्टी से दूर दिखना चाहती है और न तृणमूल कांग्रेस से अतः वह अपने प्रभाव क्षेत्रों मे मार्क्सवादी पार्टी के साथ मिलकर ममता दी के प्रत्याशियों के खिलाफ अपने प्रत्याशी खड़े करना पसन्द करेगी जिससे वोटों का बंटवारा केवल दोनों कांग्रेस के बीच ही हो जबकि शेष सभी स्थानों पर वह तृणमूल कांग्रेस व मार्क्सवादी पार्टी के त्रिकोणात्मक संघर्ष पर जोर देगी जिससे भाजपा को चौथे स्थान पर धकेला जा सके। जरूरी नहीं कि यही रणनीति अपनाई जाये मगर इसकी संभावना मौजूदा हालात को देखते हुए सबसे ज्यादा बन रही है। इसी प्रकार पंजाब में आम आदमी पार्टी सत्ता में है और कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल है।
राज्य में इसके बाद अकाली दल का नम्बर आता है और भाजपा चौथे स्थान पर आती है। पहले अकाली दल व भाजपा का गठबन्धन हुआ करता था जिसकी वजह से भाजपा राज्य की गिनती की लोकसभा सीटें जीत जाया करती थी। परन्तु अब यह गठबन्धन टूट चुका है और अकाली दल की ताकत भी बहुत शिथिल हो चुकी है जिसकी वजह से यदि कांग्रेस व आम आदमी पार्टी आपस में ही नहीं भिड़ेंगी तो अकाली दल या भाजपा को उनके मुकाबले पर आने में सहूलियत हो जायेगी। मुकाबला यदि कांग्रेस व आप के बीच होता है तो सभी सीटें इंडिया गठबन्धन के भीतर ही रहेंगी क्योंकि तृणमूल व आप दोनों ने कहा है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबन्धन के सदस्य ही रहेंगी। इसलिए राजनीति में कभी सीधी चालें नहीं चली जाती हैं और टेढ़ी चालें चल कर ही समीकरण साधे जाते हैं। इसलिए आज यह जो कहा जा रहा है कि इंडिया गठबन्धन में टूट-फूट शुरू हो गई केवल ऊपरी कलह मानी जा सकती है मगर इससे आम जनता में अवधारणा आपसी कलह की ही बनती है जिसका लाभ निश्चित रूप से भाजपा को ही मिल सकता है। अतः जन अवधारणा को साधने के लिए कांग्रेस की तरफ से एेसे बयान जारी हैं जिनसे यह आभास हो कि टूट-फूट केवल व्यावहारिक मतभेद हैं जिनका वैचारिक मतभेदों से कोई लेना-देना नहीं है। मगर यह भी सच है कि इंडिया गठबन्धन अभी तक कोई सांझा कार्यक्रम भी पेश नहीं कर पाया है जबकि लोकसभा चुनावों में 100 दिनों का समय ही शेष रह गया है। जन अवधारणा में यह तथ्य कांटे की तरह चुभ सकता है जिसकी तरफ कांग्रेस के नेताओं को ध्यान देना होगा क्योंकि गठबन्धन की यही सबसे बड़ी पार्टी है जिसने 255 लोकसभा सीटों पर लड़ने की घोषणा कर रखी है। जाहिर है इतनी सीटों पर वह लोकसभा में बहुमत नहीं ला सकती क्योंकि बहुमत के लिए न्यूनतम 272 सीटें चाहिएं। इसके लिए उसके सहयोगी 27 दलों को अपना दमखम दिखाना होगा अतः इंडिया गठबन्धन पर्दे के पीछे इसी की कवायद करता दिख रहा है मगर लड़ाई आसान नहीं है।

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