इसमें अब कोई दो राय नहीं हो सकती कि ईरान से छिड़ी लड़ाई को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब अपना सब्र खोते जा रहे हैं और वह उसके खिलाफ न केवल ऊल-जुलूल गन्दी भाषावली का प्रयोग कर रहे हैं, बल्कि उसे केवल एक रात में ही निपटा देने की धमकी भी दे रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी मानी जा रही है कि ट्रम्प ने ईरान में फंसे अपनी वायुसेना के एक अधिकारी को निकालने के लिए जिस बड़े सैन्य अभियान का जिक्र किया वह ईरान के अनुसार वास्तव में इस्फेहान प्रान्त में स्थित परमाणु संयन्त्र से परिशोधित यूरेनियम को लाने के लिए था जिसकी वजह से अमेरिका ने अपने 155 लड़ाकू हवाई जहाज ईरान में भेजे थे। ट्रम्प ने इस सैनिक बचाव आॅपरेशन का अपनी प्रेस काॅन्फ्रेंस में बहुत महिमा मंडन किया और इसे अभी तक का सबसे बड़ा हैरतंगेज कारनामा तक बताया। इस आॅपरेशन में अमेरिका के कई आधुनिक लड़ाकू विमान ध्वस्त भी हो गये परन्तु इससे भी खतरनाक बात यह है कि ट्रम्प ने इसी प्रेस काॅन्फ्रेंस में ईरान को धमकी दी कि यदि 24 घंटे के भीतर उसने अमेरिका की शर्तों पर युद्ध विराम नहीं किया तो उसके विरुद्ध महाविनाशक हमला किया जायेगा जिसमें ईरान के सभी सैनिक ढांचे के साथ नागरिक ढांचे को भी ध्वस्त करके उसे पुनः पाषाण युग में वापस भेज दिया जायेगा।
इस अल्टीमेटम की अवधि आज रात्रि ही समाप्त हो रही है अतः हो सकता है कि जब सुधी पाठकों के हाथों में यह अखबार हो तो उन्हें ईरान पर हुए विनाशक हमलों की खबरें भी पढ़ने को मिलें। वैसे इस ईरान-इजराइल व अमेरिका युद्ध की स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि दोनों ही पक्ष एक-दूसरे के प्रभाव वाले देशों के वाणिज्यिक व नागरिक प्रतिष्ठानों को निशाना बना रहे हैं। एक तरफ इजराइल ने धमकी दे दी है कि वह ईरान के रेलवे तन्त्र को अब अपने निशाने पर लेगा तो ईरान भी इजराइल व खाड़ी के देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों के अलावा उसके वाणिज्यिक संस्थानों को नुक्सान पहुंचा रहा है। जाहिर तौर पर यह युद्ध अब किसी भी प्रकार की अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध नियमावली के तहत नहीं लड़ा जा रहा है बल्कि इसका स्वरूप मानवता विरोधी हो चुका है। जिसके चलते दुनिया के अधिसंख्य देश हैरान हैं कि वे आखिर कौन सा रुख लें। ट्रम्प खुलेआम कह रहे हैं कि यदि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य का समुद्री रास्ता पहले की तरह यातायात के लिए न खोला तो वह 24 घंटे बाद ईरान के सभी महत्वपूर्ण पुलों को उड़ा देंगे और उसके हर बिजलीघर को तबाह कर देंगे।
दूसरी तरफ ईरान ने भी इजराइल के बिजलीघरों का नक्शा गुपचुप रूप से रख लिया है और वह उसे उड़ाने के मंसूबे पाल रहा है। इसका मतलब यही निकलता है कि युद्ध अब दो सेनाओं के बीच में न रह कर नागरिकों के बीच में होता जा रहा है जो कि 21वीं सदी के लिए बहुत ही खतरनाक रास्ता है मगर हैरत यह है कि इस रास्ते को पकड़ने का सिलसिला अमेरिका जैसे शक्तिशाली व खुद को मानवीय अधिकारों का अलम्बरदार रूप मानने वाले देश ने पकड़ा है। अगर इस रास्ते पर वर्तमान विश्व निकल पड़ता है तो पूरी दुनिया में जंगल राज कायम होने से कैसे रोका जा सकता है? इस मामले में अगर हम गौर से देखें तो हमें ‘गांधीवाद’ रोशनी दिखाता नजर आता है। महात्मा गांधी का यह दृढ़ विचार था कि यदि आंख के बदले आंख निकालने के सिद्धान्त को सही माना जाये तो एक दिन एेसा आ सकता है कि जब पूरी दुनिया ही अंधी हो जाये। गांधी का यह विचार भारतीय दर्शन से ही उपजा था जिसमें अहिंसा को परम धर्म बताया गया है। अतः भारत को यह सिद्ध करने की जरा भी जरूरत किसी भी दौर में नहीं रही कि वह विश्व गुरु है। इसकी वजह इसका अध्यात्म ज्ञान व दर्शन शास्त्र रहा है लेकिन हम जो पश्चिम एशिया में देख रहे हैं वह आंख के बदले आंख का कानून है जिसमें सर्वनाश छिपा हुआ है।
बेशक यह युद्ध ईरान पर अमेरिका की तरफ से लादा गया है क्योंकि ट्रम्प सरेआम ईरान पर शासन करने वाले लोगों को जानवर की संज्ञा दे रहे हैं और इसे आतंकवादी सत्ता बता रहे हैं। जबकि दूसरी ओर वह पाकिस्तान जैसे आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का अंग बनाने वाले देश पाकिस्तान से दोस्ती की पींगें बढ़ा रहे हैं। एक तरफ ट्रम्प कभी कहते हैं कि होर्मुज के रास्ते को प्रभावित देश खुद खुलवायें और कभी कहते हैं कि यदि ईरान ने इसे न खोला तो उसे एक ही रात में पूरी तरह निपटा दिया जायेगा। ट्रम्प विगत 28 फरवरी को युद्ध यह कहते हुए शुरू करते हैं कि उनका लक्ष्य ईरान में निजाम बदलना है और वहां के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या तक करवा डालते हैं तो इसके बाद कहने लगते हैं कि वह ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकना चाहते हैं अतः ईरान को उनकी शर्तों को मानते हुए समझौता कर लेना चाहिए। हमें यह पता होना चाहिए कि 1953 तक ईरान में भी भारत जैसे देशों की तरह खुला लोकतन्त्र था और उसके प्रधानमन्त्री स्व. मुसद्दिक थे। मुसद्दिक की गलती केवल यह थी कि उन्होंने ईरान की तेल कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था, क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के पहले से ही ईरान में ब्रिटिश व अमेरिकी कम्पनियों ने वहां के तेल पर कब्जा कर लिया था और ये कम्पनियां ईरान को नाममात्र की रायल्टी देती थीं। स्व. मुसद्दिक ने इस विदेशी शोषण को रोकने के लिए ही अपने देश की सभी तेल कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था जो अमेरिका से सहन नहीं हुआ और उसने मुसद्दिक की सत्ता पलट कर वहां पर ईरान के शाह के शासन को बैठा दिया परन्तु 1979 में ईरान में जो इस्लामी क्रान्ति हुई और आयातुल्लाह खुमैनी ने वहां धार्मिक पद्धति की शासन प्रणाली लागू की उसके पीछे भी पश्चिमी देशों का ही हाथ था क्योंकि तब अफगानिस्तान में अमेरिका सोवियत संघ के खिलाफ धर्मोन्मादी तालिबान को बढ़ावा दे रहा था। वर्तमान समय में ट्रम्प की नजर फिर से ईरान के तेल पर उसी तरह है जिस तरह वेनेजुएला के तेल पर थी। अतः हम यह दिशाविहीन व विनाशकारी युद्ध देख रहे हैं जिसने पूरी विश्व व्यवस्था को ही बदलने की ठान रखी है। इस युद्ध में खाड़ी के वे देश भी बर्बाद हो रहे हैं जिनमें भारत के एक करोड़ लोग रोजी-रोटी कमाने गये हुए हैं।
डोनाल्ड ट्रम्प का ‘अल्टीमेटम’
Summary :
इसमें अब कोई दो राय नहीं हो सकती कि ईरान से छिड़ी लड़ाई को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब अपना सब्र खोते जा रहे हैं और वह उसके खिलाफ न केवल ऊल-जुलूल गन्दी भाषावली का प्रयोग कर रहे हैं, बल्कि उसे केवल एक रात में ही निपटा देने की धमकी भी दे रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी मानी जा रही है कि ट्रम्प ने ईरान में फंसे अपनी वायुसेना के एक अधिकारी को निकालने के लिए जिस बड़े सैन्य अभियान का जिक्र किया वह ईरान के अनुसार वास्तव में इस्फेहान प्रान्त में स्थित परमाणु संयन्त्र से…


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