भारत में गर्मी के रूप में आसमान से आफत बरस रही है। तापमान की त्यौरियां लगातार चढ़ रही हैं और सूरज आग बरसा रहा है। पिछले दो-ढाई दशकों से मौसम विज्ञानी चेतावनी देते आ रहे हैं लेकिन वैश्विक तापक्रम वृद्धि को रोकने के लिए सरकारों और आम जनमानस ने कोई खास ध्यान नहीं दिया है। कई देशों में गर्मी के रिकॉर्ड टूट रहे हैं। इन हालात का असर न सिर्फ़ इंसानों की सेहत पर पड़ रहा है बल्कि अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि आखिरकार मौसम का मिजाज लगातार गर्म क्यों हो रहा है?
वास्तव में हर साल रिकॉर्ड तोड़ती भीषण गर्मी और असंतुलित होता मौसम सिर्फ एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व पर मंडराता हुआ एक बड़ा खतरा है।
औद्योगिक क्रांति के बाद से धरती का तापमान जिस तेजी से बढ़ा है, उसने प्रकृति के पूरे चक्र को बिगाड़ कर रख दिया है। पानी के स्रोतों का सूखना, ग्लेशियरों का पिघलना और मिट्टी की नमी का खत्म होना इस बात का साफ संकेत हैं कि पृथ्वी का प्राकृतिक रिचार्ज सिस्टम अब दम तोड़ रहा है। ऐसे में यह सवाल बेहद गंभीर हो जाता है कि आखिर इंसानी गलतियों के कारण हमारी धरती कब तक जीवन का बोझ उठा पाएगी। औद्योगिक गतिविधियों और जीवाश्म ईंधन के अंधाधुंध इस्तेमाल से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है।
संयुक्त राष्ट्र की जलवायु रिपोर्टों के मुताबिक, औद्योगिक काल की तुलना में धरती का औसत तापमान पहले ही 1.1 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ चुका है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि वैश्विक तापमान में बढ़ौतरी का यह आंकड़ा 1.5 या 2 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया, तो पृथ्वी का पूरा इकोसिस्टम ढह जाएगा जिससे जीवन को वापस पटरी पर लाना नामुमकिन हो जाएगा। 1901 से 1930 के मुकाबले इस सदी के पिछले दशक 2015 से 2024 में भारतीय भू-भाग का औसत तापमान लगभग 0.9 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है। तापमान में यह बढ़ौतरी एक जैसी नहीं रही है।
उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में पिछले तीन दशकों के दौरान तापमान में हर दशक 0.2 डिग्री सेल्सियस की तेजी से बढ़ौतरी दर्ज की गई है। जहां एक ओर भारतीय क्षेत्र में तापमान में बढ़ौतरी, मौजूदा वैश्विक तापमान वृद्धि के स्तर लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस के मुकाबले कम है, वहीं भारत में तापमान की चरम स्थितियां लगातार बढ़ रही हैं। भारत के अधिकतर हिस्सों में गर्म दिनों की संख्या में बढ़ाैतरी देखी गई है। गर्म दिन की संख्या में हर दशक 5 से 10 दिनों तक की बढ़ौतरी हुई है। गर्म दिन परिभाषा के मुताबिक, उन दिनों को कहा जाता है जब अधिकतम तापमान 1995-2014 की अवधि के दौरान के दैनिक अधिकतम तापमान के 90वें परसेंटाइल से अधिक होता है बीती मई दिन का तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस के बीच रहा, और जून, जुलाई और अगस्त के महीनों में गर्मी और उमस से राहत मिलने की ज्यादा उम्मीद नहीं है।
दुनिया भर के सबसे गर्म 100 शहरों में ज्यादातर भारत के हैं। यूपी के बांदा में तापमान 48 डिग्री सेल्यिस को पार कर चुका है। आज से साढ़े पांच सौ वर्ष पूर्व, श्री गुरु नानक देव जी ने पवन गुरु, पाणि पिता, माता धरती महातु का संदेश देकर प्रकृति के इन उपहारों से प्रेम करने, उनका सम्मान करने और उन्हें संरक्षित करने पर जोर दिया था, लेकिन आम लोग और अमीर लोग मनोरंजन, फैशन, बातचीत, पर्यटन और मौज-मस्ती के लिए धरती माता की गोद से निकलने वाले पैट्रोलियम उत्पादों, बिजली, पानी, धातुओं, रसायनों और परमाणु ऊर्जा जैसे अनगिनत बहुमूल्य संसाधनों का दुरुपयोग कर रहे हैं। लोग मनोरंजन और पर्यटन के लिए पहाड़ों और धार्मिक स्थलों पर जाने के लिए लाखों लीटर पैट्रोल, तेल, प्लास्टिक और धन का उपभोग करके पर्यावरण को नष्ट कर रहे हैं। भोजन, पानी और हवा को संरक्षित करने के बजाय, वे लगातार नष्ट हो रहे हैं।
दोपहिया वाहन एक या दो लोगों के लिए उपयोगी हैं, लेकिन वाहनों में केवल एक ही व्यक्ति को यात्रा करते देखा जाता है। साइकिल और पैदल चलना लगभग बंद हो गया है। लेकिन 90 प्रतिशत लोग पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, संवर्धन और विकास के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं। दुनिया के कुछ रेगिस्तानी देशों का तापमान 50 से 55 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है, जो सामान्य सहनीय तापमान से 10 से 15 डिग्री सेल्सियस अधिक है। बढ़ते तापमान, गर्मी और उमस को कम करने के बजाय, उन्होंने और भारतीयों ने एसी का उपयोग बढ़ा दिया। हर घर, संस्थान, इमारत, वाहन, कारखाने, होटल, मैरिज पैलेस, सिनेमा हॉल, ढाबे में एसी लगा दिए गए, जो दिन-रात ऑक्सीजन और नमी को नष्ट कर रहे हैं और गर्मी बढ़ा रहे हैं।
गर्मी बढ़ने का सबसे पहला और सीधा प्रहार पृथ्वी के जल चक्र (वाटर साइकिल) पर हो रहा है। कंक्रीट के बढ़ते जंगलों और जंगलों की अंधाधुंध कटाई के कारण बारिश का पानी जमीन के भीतर नहीं जा पा रहा है, जिससे भूजल (ग्राउंडवाटर) का रिचार्ज पूरी तरह रुक गया है। नीति आयोग की रिपोर्टों के अनुसार, भारत सहित दुनिया के कई बड़े शहरों में ग्राउंडवाटर का स्तर शून्य के करीब पहुंच रहा है। यदि पानी का यह प्राकृतिक रिचार्ज सिस्टम पूरी तरह खत्म हो गया, तो अगले कुछ दशकों में ही पीने के पानी का भयंकर अकाल पड़ जाएगा। धरती के बढ़ते तापमान का सबसे बड़ा और खतरनाक असर हमारे मीठे पानी के मुख्य स्रोतों यानी ग्लेशियरों पर देखने को मिल रहा है।
हिमालय और ध्रुवीय क्षेत्रों के ग्लेशियर रिकॉर्ड रफ्तार से पिघल रहे हैं, जिससे शुरुआत में तो समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और तटीय शहरों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है, लेकिन इसका दूसरा और डरावना पहलू यह है कि एक बार जब ये ग्लेशियर पूरी तरह खत्म हो जाएंगे तो गंगा, यमुना जैसी सदानीरा नदियों का अस्तित्व भी समाप्त हो जाएगा जिससे करोड़ों लोगों का जीवन संकट में आ जाएगा। इस गर्मी का सीधा असर अब लोगों की सेहत पर दिखाई देने लगा है। कई राज्यों के अस्पतालों में डिहाइड्रेशन, कमजोरी और लू लगने के मामले बढ़ रहे हैं। सबसे ज्यादा असर मजदूरों, बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ रहा है। सामान्य तापमान 37 डिग्री सेल्सियस या 98 डिग्री फारेनहाइट माना जाता है। थर्मामीटर पर 35 से 42 डिग्री सेल्सियस और 95 से 108 डिग्री फारेनहाइट के निशान होते हैं।
इसका मतलब यह है कि यदि मनुष्यों, बच्चों और बुजुर्गों का तापमान बहुत कम हो जाता है, तो रक्त संचार और रक्तचाप में कमी के कारण हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े, यकृत आदि अंगों में रक्त की आपूर्ति बहुत कम हो सकती है, जिससे दिल का दौरा, हृदय गति रुकना, बेहोशी और कोमा जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। मस्तिष्क को ऑक्सीजन, ग्लूकोज और पानी की आपूर्ति बंद होने से मस्तिष्क निष्क्रिय हो सकता है। सांस रुक सकती है। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययनों और कंप्यूटर मॉडलों के अनुसार, यदि इंसानों ने कार्बन उत्सर्जन को तुरंत नियंत्रित नहीं किया, तो अगले 100 से 200 सालों के भीतर पृथ्वी के कई हिस्से इंसानी आबादी के रहने लायक नहीं बचेंगे। अत्यधिक हीटवेव के कारण इंसानी शरीर का तापमान झेलने की क्षमता जवाब दे जाएगी।
हालांकि, पृथ्वी से जीवन पूरी तरह खत्म होने में लाखों साल लग सकते हैं, लेकिन इंसानी सभ्यता और बड़े जीवों का अस्तित्व महज कुछ सदियों में ही भीषण गर्मी, सूखे और भुखमरी के कारण पूरी तरह समाप्त हो सकता है। यदि वर्तमान रुझान जारी रहे तो वैश्विक तापमान में 2050 तक लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस और 2100 तक 2-4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने का अनुमान है। विज्ञान स्पष्ट है कि यदि उत्सर्जन में भारी कमी की जाए, तो तापमान वृद्धि धीमी हो सकती है और अंततः स्थिर हो सकती है। हम अभी तापमान को पूरी तरह से कम तो नहीं कर सकते, लेकिन इसे और बढ़ने से रोक सकते हैं।


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