ऊर्जा संकट और मोदी सरकार

Summary :

पश्चिम एशिया में युद्ध संकट के दौरान भारत ने जिस तरह ऊर्जा सप्लाई के संकट का सामना किया और देश में ईंधन, पैट्रोल व डीजल सहित गैस की आपूर्ति को सुनिश्चित किया वह वास्तव में नीतिगत स्तर से लेकर व्यावहारिक स्तर तक नागरिकों की समस्याओं को समाधान करने वाला था। अतः इस कथन में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं है कि 21वीं सदी के अभी तक के इस सबसे बड़े ऊर्जा संकट के समय सत्तारूढ़ मोदी सरकार ने बहुत संयम और धैर्य से काम लेते हुए अपने कूटनीतिक सम्बन्धों के जरिये पैट्रोल व डीजल सहित ईंधन गैस की सप्लाई के वैकल्पिक…

पश्चिम एशिया में युद्ध संकट के दौरान भारत ने जिस तरह ऊर्जा सप्लाई के संकट का सामना किया और देश में ईंधन, पैट्रोल व डीजल सहित गैस की आपूर्ति को सुनिश्चित किया वह वास्तव में नीतिगत स्तर से लेकर व्यावहारिक स्तर तक नागरिकों की समस्याओं को समाधान करने वाला था। अतः इस कथन में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं है कि 21वीं सदी के अभी तक के इस सबसे बड़े ऊर्जा संकट के समय सत्तारूढ़ मोदी सरकार ने बहुत संयम और धैर्य से काम लेते हुए अपने कूटनीतिक सम्बन्धों के जरिये पैट्रोल व डीजल सहित ईंधन गैस की सप्लाई के वैकल्पिक मार्ग खोजते हुए भारत के लोगों को वे कष्ट नहीं होने दिये जो विश्व के अन्य देशों के लोग झेल रहे थे।

ईरान- इजराइल व अमेरिका युद्ध के दौरान सरकार ने एक तरफ देश के हर पैट्रोल पंप पर पैट्रोल व डीजल की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित की और दूसरी तरफ इनके खुदरा दामों को भी नहीं बढ़ने दिया। हालांकि ईंधन गैस सप्लाई के मोर्चे पर कुछ दिक्कतें आयीं और इसकी सप्लाई में भी देश के सुदूर क्षेत्रों में अवरोध पैदा हुए और कुछ दाम भी बढ़ाने पड़े परन्तु कमोबेश तरीके से इस पर भी नियन्त्रण रखने की पूरी कोशिश की गई। इसलिए प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी का यह कहना पूरी तरह तार्किक है कि ‘संकट के समय भारत की कूटनीति का जलवा दिख गया। दूसरे देशों के साथ अच्छे सम्बन्ध ही संकट की घड़ी में बहुत काम आये’।

श्री मोदी ने ये शब्द तब कहे जब वह बीते दिन राजस्थान के बलोत्तरा संभाग के पचपदरा में देश के पहले ग्रीन फील्ड एकीकृत तेल शोधन व पैट्रोकेमिकल परियोजना परिसर को देश को समर्पित कर रहे थे। इस परियोजना के चालू होने से भारत विश्व का चौथा ऐसा सबसे बड़ा देश हो जायेगा जिसकी तेल परिशोधन की क्षमता सर्वाधिक है जबकि दूसरी तरफ भारत अभी भी अपनी ऊर्जा सप्लाई की जरूरत 80 प्रतिशत आयात करके ही करता है। इसका मतलब यह निकलता है कि भारत कच्चे तेल के परिशोधन के मामले में दुनिया का एक बड़ा केन्द्र होने में तेजी से अग्रसरित हो रहा है।

जहां तक भारत की कूटनीति का प्रश्न है तो पश्चिम एशिया युद्ध के समय देश के विपक्षी दलों व इनके नेताओं ने मोदी सरकार की विदेश नीति की कटु से कटुतम आलोचना यहां तक की कि इसे अमेरिका का पिछलग्गू तक बता दिया परन्तु मोदी सरकार ने इस सबकी परवाह न करते हुए ऊर्जा सप्लाई के अन्य वैश्विक स्रोतों को खोजा और फारस की खाड़ी के समुद्री मार्ग के बन्द होने के बावजूद उनसे कच्चे तेल की सप्लाई के अन्य समुद्री मार्ग खोले। युद्ध से पहले जहां भारत लगभग 25 देशों से तेल का आयात करता था वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 45 के लगभग हो गई है। इसके समानान्तर युद्ध की वजह से अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के अनाप-शनाप दाम बढ़ने की वजह से घरेलू बाजार में पैट्रोल व डीजल के भाव बढ़ने का खतरा अलग से था जिसे केन्द्र सरकार ने उत्पाद शुल्क में दस रुपये प्रति लीटर की कमी करके सन्तुलित करने का प्रयास इस तरह किया कि पैट्रोल पंपों पर इनके दाम स्थिर बने रहें।

घरेलू बाजार में दाम स्थिर रखने की कवायद में भारत की तेल कम्पनियों को हालांकि 75 हजार करोड़ रुपये का नुक्सान हुआ परन्तु सरकार ने इसका भार उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ने दिया और छिटपुट रूप से ही पैट्रोल व डीजल के दाम बढ़ाये तथा इनकी निर्बाध सप्लाई जारी रखी। श्री मोदी इस बाबत यह कहने से नहीं चूके कि जब भारत के लोग पश्चिम एशिया के संकट से जूझ रहे थे तो कुछ राजनैतिक दल व नेता लोगों में घबराहट पैदा करने व उन्हें भड़काने के काम में लगे हुए थे और उनमें असुरक्षा की भावना को बल दे रहे थे परन्तु उनकी सरकार की नीतियों व जमीनी व्यावहारिक कदमों की वजह से ऐसा नहीं हो सका और विरोधियों को मुंह की खानी पड़ी। इसका प्रमुख कारण यह है कि श्री मोदी की सरकार की नीतियां सामान्यतः जन कल्याण को केन्द्र में रख कर बनाई जा रही हैं।

अर्थव्यवस्था के इस बाजारीकरण के दौर में ‘कल्याणकारी राज’ की संवैधानिक परिकल्पना को मूर्त रूप देना आसान काम नहीं है क्योंकि इस व्यवस्था में हर क्षेत्र में निजी क्षेत्र व विदेशी निवेश को महत्ता देना सरकार की मजबूरी होता है अतः इस वातावरण में समाज के सबसे गरीब व पिछड़े व्यक्ति के हितों का संरक्षण करने के साथ विकास का सौपान चढ़ना बहुत ही पेचीदा होता है। यही वजह है कि मोदी सरकार देश के 80 करोड़ लोगों को आज भी मुफ्त राशन की सुविधा दे रही है जिसे प्रायः आलोचक भारत की गरीबी से जोड़ कर देखते हैं मगर वे भूल जाते हैं कि किसी भी लोकतन्त्र में सरकार का पहला धर्म आर्थिक रूप से विपन्न जनता की भूख से लेकर उसकी आवास व स्वास्थ्य सेवाओं को सुनिश्चित करने का ही होता है।

इस मोर्चे पर मोदी सरकार अपने सत्तारूढ़ होने के पहले वर्ष से ही बहुत सतर्क है और उसने विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं चला रखी हैं जिनमें पांच लाख रुपये तक की वार्षिक चिकित्सा सुविधा भी शामिल है। लोकतन्त्र में सरकार के इकबाल की सबसे बड़ी पहचान भी यही होती है कि गरीब जनता के मन में उस सरकार की छवि कैसी है। अतः पश्चिम एशिया संकट के दौरान केन्द्र सरकार द्वारा उठाये गये कदमों की समीक्षा हम इसी पैमाने से करेंगे। बेशक इस संकट की वजह से भारत में महंगाई बढ़ी है और आवश्यक खाद्य वस्तुओं व सेवाओं के दाम तेज हुए हैं मगर इन पर काबू तभी पाया जा सकता है जब समन्वित रूप से सरकारी व निजी क्षेत्र मिल कर काम करें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।

अतः श्री मोदी जब यह कहते हैं कि उनकी सरकार के लिए ‘नागरिक देवो भव:’ एक मन्त्र के रूप में काम करता है तो उनके पिछले 12 वर्ष की शासन पद्धति की समालोचना आसानी से हो जाती है। इस मामले में देश की जनता की सूझबूझ की भी सराहना करनी पड़ेगी कि वह भी संकट के समय विचलित करने वाले भ्रामक प्रचार के चक्कर में नहीं पड़ी और उसने संयम बनाये रखा।

Aditya Chopra

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