विसंगतियों और विरोधाभासों से भरा है हमारा यह भारतीय उपमहाद्वीप। अब नया विरोधाभास यह उपजा है कि हड़प्पा सभ्यता, जो कि इस समय पाकिस्तान में है, की राजधानी हरियाणा के एक गांव राखीगढ़ी में है। अब राखीगढ़ी-महोत्सव जिला हिसार के इस गांव में मनाया जा रहा है। तीन दिन तक चले इस मेले में लाखों लोगों ने अपनी पुरानी सभ्यता को अपनी आंखों से देखा। मगर हड़प्पा शहर के लोग इसमें शिरकत नहीं कर पाएंगे। वैसे हड़प्पा के नाम पर एक हड़प्पा-ज्ञान केंद्र भी राखीगढ़ी में स्थापित किया गया है। चलिए, आपको पहले आपकी हजारों साल पुरानी शक्ल व तहज़ीब दिखाएं। ऐतिहासिक स्थल हड़प्पा पाक-पंजाब का एक पुरातात्विक स्थल है। यह साहीवाल (पुराना नाम मिंटगुमरी) शहर से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर रावी नदी के किनारे स्थित है।
सिंधु घाटी सभ्यता में खोजी गई यह सबसे पुरानी व सबसे पहले खोजी गई सभ्यता है। वर्ष 1921 में जान मार्शल, दया राम साहनी और मार्टिन व्हीलर नामक पुरातत्व विशेषज्ञों ने इसे खोजा था। पहली खुदाई में ही गरूड़ का चित्र, अवलोकितेश्वर व कुछ अन्य अवतारों की पुरानी मूर्तियां मिली थीं। बाद में वहां एक संग्रहालय भी स्थापित हुआ जो अब भी मौजूद है। इसी हड़प्पा सभ्यता की राजधानी राखीगढ़ी है, जहां हाल ही में एक तीन दिवसीय मेला लगा और अब संग्रहालय स्थापित हो गया। ‘हैरीटेज वॉक’ कार्यशालाएं, हस्तशिल्प मेले, स्थायी प्रदर्शनी आदि सभी कुछ यहां मौजूद हैं। विलुप्त सरस्वती की तलाश का क्रम न जाने कब कहां पहुंचे, मगर पुरातत्व वैज्ञानिक अब इस निष्कर्ष पर लगभग पहुंच गए हैं कि सिंधु-घाटी सभ्यता की राजधानी हरियाणा के जि़ला हिसार में स्थित गांव राखीगढ़ी में थी।
डक्कन कॉलेज पुणे के खुदाई व पुरातत्व विशेषज्ञ प्रो. वसंत शिंदे और हरियाणा के पुरातत्व विभाग द्वारा किए गए अब तक के शोध व खुदाई के अनुसार लगभग 5500 हैक्टेयर में फैला यह शहर ईसा से लगभग 3300 वर्ष पूर्व सक्रिय स्वरूप में मौजूद था। इन प्रमाणों के आधार पर यह तो तय हो ही गया है कि इस राखीगढ़ी की स्थापना 5000 वर्ष से भी सैकड़ों वर्ष पूर्व हो चुकी थी। प्रो. शिंदे के अनुसार खुदाई के मध्य पाए गए नर कंकालों से लिए गए डीएनए नमूनों का अध्ययन जारी है और अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर राखीगढ़ी के अवशेषों का विश्लेषण किया जा रहा है।
अब तक यही माना जाता रहा है कि इस समय पाकिस्तान में स्थित हड़प्पा व मोहेन्जोदाड़ो ही सिन्धुकालीन सभ्यता के मुख्य नगर थे। अब इस गांव में खुदाई व शोध का काम पिछले कई वर्षों से चल रहा है और यह शहर उनसे भी पुराना है। जि़ला हिसार का यह गांव दिल्ली से 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस गांव में शोध व उत्खनन का कार्य 1963 में पहली बार शुरु हुआ और तब इसे सिन्धु-सरस्वती सभ्यता का सबसे बड़ा नगर माना गया। उस समय के शोधार्थियों ने सप्रमाण घोषणाएं की थीं कि अतीत में यह लापता शहर, मोहेन्जोदाड़ो और हड़प्पा से भी बड़ा था। अब लापता हो चुकी सरस्वती नदी के किनारों पर ही स्थित था यह शहर। पुरातत्व-विदों के अनुसार, हड़प्पा सभ्यता का प्रारंभ इसी राखीगढ़ी से माना जा सकता है।
1997 में यहां से, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को जो कुछ भी उत्खनन के मध्य मिला, उससे पहला तथ्य यह उभरा कि ‘राखीगढ़ी’ शहर लगभग साढ़े तीन किलोमीटर की परिधि में फैला हुआ था। यहां से जो भी पुराने अवशेष मिले उनकी उम्र 5000 वर्ष से भी अधिक है। राखीगढ़ी में कुल नौ टीले हैं। उनका नामकरण, शोध की सूक्ष्मता के मद्देनज़र आरजीआर-1 से आरजीआर-9 तक किया गया है। आरजीआर-5 का उत्खनन बताता है कि इस क्षेत्र में सर्वाधिक घनी आबादी थी। वैसे भी इस समय यहां पर आबादी घनी है इसलिए आरजीआर-5 में ज़्यादा उत्खनन संभव नहीं है।
लेकिन आरजीआर-4 के कुछ भागों में उत्खनन संभव है। 2014 में राखीगढ़ी की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं की ‘रेडियो-कार्बन डेटिंग’ के अनुसार इन अवशेषों का संबंध हड़प्पा-पूर्व और प्रौढ़-हड़प्पा काल के अलावा उससे भी हज़ारों वर्ष पूर्व की सभ्यता से भी है। आरजीआर-6 से प्राप्त अवशेष इस सभ्यता को लगभग 6500 वर्ष पूर्व (6420+100) तक ले जाते हैं। अब सभी शोध विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि राखीगढ़ी, भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान का, आकार व आबादी की दृष्टि से सबसे बड़ा शहर था। इस क्षेत्र में विकास की तीन-तीन परतें मिलीं हैं। लेकिन अभी भी इस क्षेत्र का विस्तृत उत्खनन बकाया है। प्राप्त विवरणों के अनुसार इस समुचित रूप से नियोजित शहर की सभी सड़कें 1.92 मीटर चौड़ी थीं। यह चौड़ाई काली बंगा की सड़कों से भी ज़्यादा है। कुछ चारदीवारियों के मध्य कुछ गढ्ढे भी मिले हैं, जो संभवत: किन्हीं धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी बलि-प्रथा के लिए प्रयुक्त होते थे।
एक ऐसा बर्तन भी मिला है, जो सोने और चांदी की परतों से ढका है। इसी स्थल पर एक ‘फाउंड्री’ के भी चिन्ह मिले हैं, जहां संभवत: सोना ढाला जाता था। इसके अतिरिक्त टैराकोटा से बनी असंख्य प्रतिमाएं तांबे के बर्तन व कुछ प्रतिमाएं और एक ‘फर्नेस’ के अवशेष भी मिले हैं। एक श्मशान-गृह व कब्रगाह के अवशेष भी मिले हैं, जहां 8 कंकाल भी पाए गए हैं। उन कंकालों का सिर उत्तर दिशा की ओर था। उनके साथ कुछ बर्तनों के अवशेष भी हैं। संभवत: यह उन लोगों की कब्रगाह थी, जो मुर्दों को दफ्नाते थे। अप्रैल 2015 में आरजीआर-7 की खुदाई के मध्य चार नर-कंकाल भी मिले। इनमें से तीन की पहचान पुरुषों व एक की स्त्री के रूप में की जा सकी है। इनके पास से भी कुछ बर्तन व कुछ खाद्य-अवशेष मिले। इस सारी खुदाई के मध्य नवीनतम टैक्नोलॉजी का प्रयोग किया गया ताकि संभव हो तो इन अवशेषों का डीएनए टैस्ट भी हो सके। इससे यह भी पता चल पाएगा कि लगभग 5500 वर्ष हड़प्पन लोगों के शारीरिक संरचना कैसी थी।
राखीगढ़ी में ‘हाकड़ा वेयर’ नाम से चिन्हित ऐसे अवशेष भी मिले हैं, जिनका निर्माण काल सिन्धु घाटी सभ्यता और सूख चुकी सरस्वती नदी घाटी के काल से मेल खाता है। इस क्षेत्र में आठ ऐसी समाधियां व कब्रें भी मिली हैं, जिनका निर्माण काल लगभग 5 हज़ार वर्ष पूर्व तक तो ले ही जाता है। एक कंकाल तो लकड़ी के भुरभुरे हो चुके ताबूत में मिला है। कुछ विशिष्ट समाधियों एवं कब्रों पर छतरियां बनाने की प्रथा भी थी। राखीगढ़ी में कुछ वर्षों से उत्खनन बंद रहा है, क्योंकि इस क्षेत्र में राजकीय अनुदानों का दुरुपयोग संबंधी आरोपों की सघन जांच इन दिनों सीबीआई कर रही है।
मई 2012 में ‘ग्लोबल हैरिटेज फंड’ ने इसे, एशिया के 10 ऐसे ‘विरासत-स्थलों’ की सूची में शामिल किया है, जिनके नष्ट हो जाने का खतरा है। ‘संडे-टाइम्स’ की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र में कुछ ग्रामीणों व कुछ पुरातत्व-तस्करों ने अवैध रूप से कुछ क्षेत्रों में खुदाई की थी और यहां से कुछ दुर्लभ अवशेष अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में भी बेचे गए हैं। आसपास के कुछ क्षेत्रों में नए निजी निर्माण भी देखे जा सकते हैं। वैसे 1997 से लेकर अब तक सर्दियों के मौसम में तीन बार अधिकृत रूप में भी खुदाइयां हो चुकी हैं और जो कुछ भी मिला है, वह सिन्धु-सरस्वती सभ्यता की एक खुली एवं विस्तृत दृष्टि से देखने पर विवश करता है। इस केंद्र के लिए 500 करोड़ का सरकारी अनुदान घोषित किया गया और इसकी देखरेख का दायित्व हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी को सौंपा गया है।


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