ऐतिहासिक वोटिंग लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत

Summary :

पश्चिम बंगाल में पहले चरण और तमिलनाडु चुनाव में ऐतिहासिक वोटिंग हुई है। लोकतंत्र में लोक की भारी भरकम भागीदारी लोकतंत्र के लिए शुभ और सकारात्मक संकेत है। दोनों राज्यों में क्रमश: 92.72 फीसदी और 85.14 फीसदी मतदान के साथ नए कीर्तिमान स्थापित किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में हुए भारी मतदान को देश के मजबूत लोकतांत्रिक प्रक्रिया का संकेत बताया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने यह टिप्पणी उस समय की जब विशेष मतदाता सूची संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर…

पश्चिम बंगाल में पहले चरण और तमिलनाडु चुनाव में ऐतिहासिक वोटिंग हुई है। लोकतंत्र में लोक की भारी भरकम भागीदारी लोकतंत्र के लिए शुभ और सकारात्मक संकेत है। दोनों राज्यों में क्रमश: 92.72 फीसदी और 85.14 फीसदी मतदान के साथ नए कीर्तिमान स्थापित किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में हुए भारी मतदान को देश के मजबूत लोकतांत्रिक प्रक्रिया का संकेत बताया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने यह टिप्पणी उस समय की जब विशेष मतदाता सूची संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही थी।

आजकल 60-70 फीसदी मतदान हो जाए तो राजनीतिक दल और नेतागण राहत की सांस लेते हैं। बंगाल के इस बार के मतदान पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने खुलासा किया है कि आजादी के बाद देश में सबसे अधिक मतदान बंगाल में हुआ है, तो 1967 के बाद पहली बार तमिलनाडु में इतना अधिक मतदान किया गया है। ये बंपर वोटिंग कहती क्या है? क्या संकेत दे रही है? क्या भारत की चुनावी प्रक्रिया में ये नया बदलाव है? कभी 50-55 प्रतिशत वोटिंग में सरकारें बन जाया करती थीं और आज पश्चिम बंगाल में 92 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ है। आखिर वजह क्या है? क्या लोग वोट के प्रति ज्यादा जागरूक हो गए हैं या वजह कुछ और है?

पश्चिम बंगाल में 2001 विधानसभा चुनाव में 75.3 प्रतिशत मतदान हुआ था। 2001 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में 199 सीटों वाली लेफ्ट फ्रंट की सरकार बनी थी। ये उसकी लगातार छठी बार जीत थी। लेफ्ट फ्रंट में सीपीआई—एम 143 सीटें, फॉरवर्ड ब्लॉक को 25 सीटें, आरएसपी को 17 सीटें, सीपीआई को 7 सीटें और बाकी सहयोगियों को 7 सीटें मिली थीं। वहीं विपक्ष को कुल 86 सीटें मिलीं। तृणमूल कांग्रेस को 60 सीटें, कांग्रेस को 26 सीटें, जीएनएलएफ को 3 सीटें और अन्य/निर्दलीय को 6 सीटें मिलीं थीं। तब बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बने थे, जिन्होंने ज्योति बसु के बाद कमान संभाली थी।

फिर 2011 में 84.3 फीसदी हुआ। 2011 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनी थी। ये लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के शासन का अंत था। सरकार यूपीए की बनी थी और उसने कुल 226 सीटें जीती थीं। तृणमूल कांग्रेस को 184 सीटें, कांग्रेस को 42 सीटें मिलीं। वहीं विपक्ष में लेफ्ट फ्रंट को 62 सीटें मिलीं थीं। सीपीआई—एम को 40 सीटें, फॉरवर्ड ब्लॉक को 11 सीटें, आएसपी को 7 सीटें, सीपीआई को 2 सीटें, एसपी को 1 सीट, डीएसपी को 1 सीट मिली। वहीं अन्य में जीजेएम को 3 सीटें, निर्दलीय और अन्य को 2 सीटें मिलीं। ममता बनर्जी पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। लेफ्ट फ्रंट को 136 सीटों का नुक्सान हुआ था।

2016 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। ममता बनर्जी फिर मुख्यमंत्री बनीं। तृणमूल कांग्रेस को कुल 211 सीटें आईं और 44.91 फीसदी वोट शेयर रहा। विपक्ष को कुल 77 सीटें मिलीं। कांग्रेस को 44 सीटें, सीपीआई—एम को 26 सीटें, BJP को 3 सीटें, जीजेएम को 3 सीटें, अन्य लेफ्ट फ्रंट सहयोगी को 4 सीटें मिलीं। कुल मतदान 83.02 फीसदी हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट ने मिलकर “महाजोत” गठबंधन बनाया था, जिसे कुल 74 सीटें मिलीं। 2021 में 81.6 फीसदी मतदान हुआ। तृणमूल कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई।

ममता बनर्जी फिर मुख्यमंत्री बनीं। टीएमसी को कुल 215 सीटें मिलीं और 48.02 फीसदी वोट शेयर मिला। विपक्ष को कुल 78 सीटें मिलीं। बीजेपी को 77 सीटें और राष्ट्रीय सेक्युलर मजलिस पार्टी को 1 सीट मिली। कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट को एक भी सीट नहीं मिली। ममता बनर्जी खुद नंदीग्राम से चुनाव हार गई थीं लेकिन बाद में भवानीपुर उपचुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनी रहीं। तमिलनाडु में भी ऐसा ही कुछ हुआ है। 2001 विधानसभा में 59.1 फीसदी मतदान हुआ। 2011 में 78.0 फीसदी मतदान हुआ। 2021 में 72.7 फीसदी मतदान हुआ। 2001 में एआईएडीएमके गठबंधन की सरकार बनी।

मुख्यमंत्री जे. जयललिता और फिर ओ. पन्नीरसेल्वम बने। एआईएडीएमके गठबंधन को 196 सीटें मिलीं। अकेले एआईएडीएमके को 132 सीटें मिलीं। फिर 2011 चुनाव में भी एआईएडीएमके की सरकार बनी। मुख्यमंत्री जे. जयललिता बनीं। एआईएडीएमके गठबंधन ने बहुमत हासिल किया। 2016 में भी एआईएडीएमके 136 सीटों के साथ सत्ता में लौटी थी। 2021 में डीएमके गठबंधन की सरकार बनी। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन. डीएमके गठबंधन को 159 सीटें मिलीं। अकेले डीएमके को 133 सीटें मिलीं। एआईएडीएमके का 10 साल का शासन खत्म हुआ। अब 2026 में 85.1 फीसदी मतदान हुआ है।

ये आंकड़े भी बताते हैं कि जरूरी नहीं कि ज्यादा मतदान का मतलब सरकार बदल रही हैं। हां, चांसेज इसी के ज्यादा होते हैं। बात 2026 की जाए तो इस बार अतीत के तमाम कीर्तिमान बौने हो गए हैं और लोकतंत्र की निर्णायक भागीदारी ने नए मील-पत्थर गाड़ दिए हैं। ये मतदान इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि बंगाल में कुल 91 लाख से अधिक और तमिलनाडु में 57 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम, एसआईआर के जरिए, काट दिए गए थे। अब भी लाखों के मताधिकार अधर में लटके हैं। एसआईआर का खौफ और भय था, ऐसी आशंकाएं भी जताई जा रही थीं कि यदि वोट नहीं देंगे तो अंतत: नागरिकता भी जा सकती है! यहां हम स्पष्ट बता दें कि न तो संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है और न ही देश का कानून है कि वोट न देने से नागरिकता रद्द की जा सकती है।

आप बहकावे में न आएं, भ्रमित न हों और डरने की कोई जरूरत नहीं है। आपकी भारतीयता कोई खैरात नहीं है। वह आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। बहरहाल बंपर मतदान की व्याख्याएं शुरू हो गई हैं। प्रधानमंत्री मोदी का ‘एग्जिट पोल’ दावा कर रहा है कि भाजपा प्रथम चरण की 152 सीटों में से 100 सीटें पार कर चुकी है। हालांकि भाजपा ने 125 सीटों पर प्रचंड जीत का दावा किया है। ये आंकड़े सरकार बनने या बदलने से ज्यादा इस बात का संकेत दे रहे हैं कि भारत के चुनावी प्रक्रिया में समय के साथ तेजी के साथ सुधार हो रहा है। कभी 50-55 फीसदी मतदान को अच्छा मतदान माना जाता था, लेकिन अब 90 फीसदी से भी ज्यादा मतदान हो रहा है।

एसआईआर के जरिए चुनाव आयोग ने मर चुके वोटरों, एक ही वोटर के कई राज्यों में बने वोटर कार्ड और दूसरे देशों से आकर फर्जी तरीके से वोटर कार्ड बनवाने पर नकेल कस दी। नतीजा ये हुआ कि जो जहां रह रहा है उसका वोटर कार्ड अब वहीं का है। यही कारण है कि मतदान का परसेंटेज अब बढ़ा हुआ नजर आ रहा है।

Team Desk