कहते हैं मुसीबत जब आती है अकेली नहीं आती वह अपने साथ कई और चुनौतियां भी लाती है। बढ़ते प्रदूषण ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित है, यह बात हर कोई जानता है लेकिन हमें आपदा अर्थात बुरे वक्त से लड़ने का जज्बा खुद ही तैयार करना होगा। यह इसलिए जरूरी है कि हमें जो कुछ करना है वह नोनिहाल अर्थात नन्हें-मुन्ने बच्चों को जहरीली हवा से बचाने के लिए और उनके भविष्य को सुरक्षित रखने की खातिर है। मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से सामाजिक रूप से एक बड़ा सवाल यह है कि नन्हें-मुन्ने बच्चों का मानसिक विकास करना कितना जरूरी है। कोई भी आपदा यह मुसीबत बच्चों के स्वच्छंद विचारों और उसकी सुन्दर सोच पर असर न कर सके। पिछले दिनों मुझे डिबेेट के दौरान यह बात दिल तक छू गई जब मुझसे सवाल किया गया कि आखिरकार हमारे नन्हें-मुन्ने बच्चे कब तक घरों में कैद रहेंगे। कोरोना के दौरान क्या बच्चे, क्या बूढ़े और क्या नौजवान हर कोई घरों में कैद होकर रह गया था। बड़ों को हालात देखकर समझना आता है लेकिन जो नन्हें-मुन्ने बच्चे गोदी में खेल रहे हैं या जिनकी उम्र महज पांच-छह या दस साल तक की है, वे बहुत मासूम होते हैं। उन्हें हम यह कहें कि पाल्यूशन की वजह से आप घर पर ही रहेंगे, घर से बाहर नहीं निकलेंगे तो नर्सरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों का मासूम सवाल दिल को हिला कर रख देता है जब वे पूछते हैं- पाल्यूशन क्या होता है। जरा सोचिए हम बच्चों को अच्छा हष्ट-पुष्ट बनाने और अच्छा स्वस्थ बनाने के लिए ताजी हवा में सैर करने और कसरत करने की बात करते हैं लेकिन बड़ा सवाल यह है कि हवा में जहर घुलता जा रहा है तो सीधी सी बात है कि बच्चे के मन-मस्तिष्क पर बुरा असर पड़ता है। वैज्ञानिकों ने चिंता व्यक्त की है कि बच्चों को जीवन में खुला और मुक्त वातावरण चाहिए। उन पर किसी किस्म की बंदिश यह रोक-टोक नहीं होनी चाहिए लेकिन जब हम उन्हें घर से बाहर ही नहीं निकलने देंगे तो फिर उनका मानसिक विकास कैसे होगा?
मेरा मानना है कि हालात के मुताबिक हमें बच्चों को प्रदूषण से लड़ने के लिए उनका मानसिक विकास कराना ही होगा। घर के अन्दर बच्चों को यह नहीं लगना चाहिए कि वे कैद कर दिए गए हैं। यह सोच नाकारात्मक असर डाल सकती है। अगर घर के अन्दर खेलों की गतिविधियां चाहे वे टेबल टैनिस, अन्य हल्का रस्साकूद जैसी खेलें हों तो उन्हें बिगड़ते और प्रदूूषण जैसे हालात से लड़ने में मानसिक रूप से ताकत मिल सकती है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम बच्चों को किस तरह हालात से लड़ना सिखा रहे हैं। एक अमरीकी रिपोर्ट बताती है कि भारत में कड़ी मेहनत करने वाले मजदूरों के बच्चे गर्मी-सर्दी के बीच और कोरोना तथा पाल्यूशन जैसी समस्याओं के चलते ज्यादा मजबूत रहते हैं और वे इतने ज्यादा शक्तिशाली हैं कि उनका इम्यूनिटी सिस्टम बहुत मजबूत हो जाता है। जब बच्चों पर बंदिशें लगाकर उन्हें घर पर ही टीवी और मोबाइल देकर छोड़ दिया जाएगा तो फिर वे हालात से नहीं लड़ पाएंगे।
मुझे यह भी लगता है कि यह हालात संवेदनशील हैं, इसलिए हमें खुद सतर्क रहते हुए बच्चों की मजबूती के लिए उनके भविष्य के बारे में सोचना है। हम लोग अपने बचपन में कभी-कभी महीने में एक बार या दो बार उस पिकनिक के बारे में सोचा करते थे जहां हम साइकिलें चलाकर कई मनोरंजनपूर्ण गतिविधियों में शामिल होते थे। साइकिल चलाने के दौरान अगर हम गिर भी जाते थे और चोट लग जाती थी तो हमारे शिक्षक हमें ताकतवर कहकर खड़ा कर देते थे और हमें फिर से दौड़कर दिखाने या साइकिल तेज चलाने की बात कहकर हौसला बढ़ाते थे। यह जज्बात आज हमें अपने बच्चों में ऐसे ही भरना होगा। महान समाज सुधारक रविन्द्र नाथ टैगोर कहा करते थे कि बच्चों को कभी भी ज्यादा देर तक घरों में न रखते हुए उन्हें बाग-बगीचे यह जंगलों में जाने की इजाजत देकर उन्हें कुछ भी करने की अनुमति दी जानी चाहिए ताकि उनके दिलोंदिमाग में स्वच्छ वातावरण की मस्ती छाई रहनी चाहिए। आज बच्चों पर तनाव हावी है। जब हम कोरोना काल से उभर चुके हैं तो बहुत जल्द इस प्रदूषण पर भी विजय पा लेंगे लेकिन यह सच है कि पाल्यूशन से लड़ने के लिए खुद ही पहल करनी पड़ेगी।
बच्चों को स्वच्छ और खुला वातावरण उनके बौद्धिक विकास के लिए बहुत जरूरी है। इस लिहाज से केन्द्र व राज्य सरकार बहुत कुछ कर सकती है तथा सब कुछ बच्चों के भविष्य को लेकर फोकस करना होगा। हमारी और सरकार की पहल इस दिशा में बहुत कुछ कर सकती है, हमें इसका इंतजार रहेगा।
कब तक घरों में कैद रहेगा ‘बचपन’
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कहते हैं मुसीबत जब आती है अकेली नहीं आती वह अपने साथ कई और चुनौतियां भी लाती है। बढ़ते प्रदूषण ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित है, यह बात हर कोई जानता है लेकिन हमें आपदा अर्थात बुरे वक्त से लड़ने का जज्बा खुद ही तैयार करना होगा। यह इसलिए जरूरी है कि हमें जो कुछ करना है वह नोनिहाल अर्थात नन्हें-मुन्ने बच्चों को जहरीली हवा से बचाने के लिए और उनके भविष्य को सुरक्षित रखने की खातिर है। मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से सामाजिक रूप से एक बड़ा सवाल यह है…



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