राहुल का लंच, कृष्णा के संग

Summary :

‘तुम मुहब्बत की कसमें खाते हो, फिर नाहक तलवारें क्यों बनाते हो तेरे शाने पर सिर रख दिया है, अब मुझे मेरी औकात क्या बताते हो’ भाजपा और कांग्रेस की कार्यशैली में कुछ तो बुनियादी फर्क है, भाजपा में अगर किसी नेता को कोई अहम जिम्मेदारी दी जाती है और वह उसका ठीक से निर्वहन नहीं कर पाता तो उन्हें उसकी असली जगह दिखाने में पार्टी शीर्ष कोई कोताही नहीं बरतता। वहीं, कांग्रेस में तो जैसे शीर्ष के करीबी नेताओं को सौ खून माफ है। स्वयं राहुल गांधी ने भरी मीटिंग में कभी जिन दुलारों पर पार्टी टिकट बेचने जैसे…

‘तुम मुहब्बत की कसमें खाते हो, फिर नाहक तलवारें क्यों बनाते हो
तेरे शाने पर सिर रख दिया है, अब मुझे मेरी औकात क्या बताते हो’
भाजपा और कांग्रेस की कार्यशैली में कुछ तो बुनियादी फर्क है, भाजपा में अगर किसी नेता को कोई अहम जिम्मेदारी दी जाती है और वह उसका ठीक से निर्वहन नहीं कर पाता तो उन्हें उसकी असली जगह दिखाने में पार्टी शीर्ष कोई कोताही नहीं बरतता। वहीं, कांग्रेस में तो जैसे शीर्ष के करीबी नेताओं को सौ खून माफ है। स्वयं राहुल गांधी ने भरी मीटिंग में कभी जिन दुलारों पर पार्टी टिकट बेचने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे, बाद में वे राहुल के ही बगलगीर नजर आए, उन्हें और भी महत्ती जिम्मेदारियां बदस्तूर मिलती रहीं। पिछले दिनों एक दिलचस्प नजारा देखने को मिला राहुल उसी कृष्णा अल्लावरू को लंच कराने अपने साथ अशोक होटल के एक नामी दक्षिण के रेस्त्रां में लेकर गए। राहुल के साथ उनकी कार में सीपीआई माले नेता दीपांकर भट्टाचार्य भी थे। सनद रहे कि कृष्णा अल्लावरू का कांग्रेस और राजद में ही इतना विरोध था कि बिहार चुनाव के अधबीच उन्हें दिल्ली बुलाना पड़ा, पटना एयरपोर्ट पर कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इनका घेराव कर इनके खिलाफ नारे लगाए। इन पर टिकट बेचने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए। माना गया कि राहुल गांधी भी इनसे बेतरह नाराज हैं, पर राहुल व भट्टाचार्य के साथ अल्लावरू का ‘सागर रत्ना’ लंच इस बात की गवाही नहीं देता। लंच के बाद राहुल ने माले नेता को अपनी गाड़ी में बिठाया और उन्हें उनके दफ्तर तक छोड़ने गए। कहते हैं भट्टाचार्य के आग्रह पर राहुल उनके साथ माले के दफ्तर चले गए जहां दोनों नेताओं ने अपना क्वालिटी वक्त गुजारा। वहीं कांग्रेस के कुछ आला नेताओं का सोचना है कि राहुल एक बड़े दल का प्रतिनिधित्व करते हैं, कम से कम उन्हें वाम दल के दफ्तर तो नहीं जाना चाहिए था। वहीं पार्टी में ही राहुल के कुछ प्रशंसक नेता यह उनकी विनम्रता और बड़प्पन बता रहे हैं।
पीके से क्यों मिली प्रियंका?
प्रियंका गांधी राहुल से अलहदा कांग्रेस में एक नई किस्म की राजनीति को बढ़ावा देना चाहती हैं, शायद यही वजह है कि संसद भवन में स्पीकर की चाय पर उन्हें पीएम व राजनाथ के साथ भी हंसते-बतियाते देखा गया और जब उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड में उगने वाली नीली हल्दी को दिल्ली के इस दमघोंटू प्रदूषण का तोड़ बताया तो स्वयं पीएम मोदी भी अपनी हंसी नहीं रोक पाए। अब लौट कर आते हैं प्रशांत किशोर पर जिन्होंने एक दिन अचानक प्रियंका के मोबाइल पर एक मैसेज भेजा जिसका लब्बोलुआब यह था कि ‘हम हारे या जीते, पर असली सवाल यह है कि इस देश में चुनाव लड़ना अन्य पार्टियों के लिए इतना ‘मुश्किल क्यों हुआ जा रहा है?’ प्रियंका को पीके की बात में दम लगा और उन्होंने उन्हें अपने घर मिलने को बुला लिया। कहते हैं यह मीटिंग कोई डेढ़ घंटे चली।
सूत्रों का कहना है कि पीके ने प्रियंका से कहा कि 2029 के संसदीय चुनाव से पहले विपक्ष को एक साझा रणनीति बनानी होगी। तभी हम मौजूदा चुनावी प्रक्रिया के समक्ष कोई चुनौती रख पाएंगे। पीके ने कहा कि अगर प्रियंका चाहें तो वे इस बारे में ममता बनर्जी और स्टालिन से बात कर उन्हें एक कॉमन प्लेटफॉर्म पर ला सकते हैं। पीके ने यह भी कहा कि मौजूदा तंत्र विपक्ष को एक-दो राज्यों में जीतने की छूट दे सकता है ताकि यह भ्रम बना रहे कि देश में लोकतंत्र जिंदा है पर किसी ‘की-स्टेट’ में विपक्षी पार्टियों का जीत पाना खासा मुश्किल है।
कहते हैं पीके ने प्रियंका से यह भी कहा कि बिहार में उन्हें तेजस्वी का मोह छोड़ना होगा, क्योंकि वे अश्वमेध के असली घोड़े नहीं हैं। इस पर प्रियंका ने धीरे से कहा यह फैसला तो भाई (राहुल) को ही लेना है।
कैसे लगा यूपी में पंकज का नंबर
भाजपा ने जब केंद्रीय राज्य मंत्री पंकज चौधरी को यूपी का प्रदेश अध्यक्ष घोषित किया तो इसे एक बड़ा सियासी दांव माना गया। कुर्मी जाति से ताल्लुक रखने वाले पंकज चौधरी सात बार के सांसद हैं। वैसे भी पूर्वांचल और मध्य यूपी में कुर्मी समाज चुनावों में एक निर्णायक भूमिका निभाता है। आमतौर पर यूपी में कुर्मी वोटरांे का लगाव भाजपा से रहा है, पर 2024 के लोकसभा चुनाव में यह वोटर पलट कर सपा के पाले में चले गए थे। आप मान सकते हैं कि पंकज चौधरी के ऊपर यह पहली महती जिम्मेदारी होगी कि वे अपने सजातीय वोटरों की भाजपा में घर वापसी करवाएं। वैसे तो महाराजगंज संसदीय सीट अब तक भाजपा का अभेद किला रही है, पर 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां की फरेंदा विधानसभा सीट पर अनायास ही कांग्रेस के वीरेंद्र चौधरी जीत गए थे। सनद रहे कि उस चुनाव में कांग्रेस प्रदेश में बस दो ही विधानसभा सीट जीत पाई थी, इसमें फरेंदा के अलावा रामपुर खास की सीट मोना उर्फ अराधना मिश्रा ने जीती है, जो वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी की पुत्री हैं। खैर, किसी प्रकार वीरेंद्र चौधरी योगी आदित्यनाथ के संपर्क में आ गए। योगी को उनमें कूवत दिखी कि ये पंकज चौधरी की काट हो सकते हैं। योगी उन्हें भाजपा में लाने में सक्रिय हो गए, वैसे भी कांग्रेस के यहां मात्र दो ही विधायक थे सो, दलबदल कानून का भी कोई खौफ नहीं था।
कहते हैं योगी ने वीरेंद्र चौधरी से वादा किया कि अगली बार यानी 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा का टिकट दिया जाएगा। योगी से मिले आश्वासन के बाद वीरेंद्र चौधरी महाराजगंज में घूमने लगे, लोगों से मेल-जोल बढ़ाने भी लगे, लेकिन तब तक यह खबर पंकज चौधरी को लग चुकी थी। उन्हें 24 में चुनाव भी लड़वाया गया और जीतने पर केंद्र में मंत्री भी बनाया गया, और हैरत की बात देखिए 24 के चुनाव में उनकी टक्कर भी कांग्रेस के उसी वीरेंद्र चौधरी से हुई जिन्हें योगी भाजपा के टिकट पर लड़वाना चाहते थे। पंकज चौधरी इस चुनाव में वीरेंद्र चौधरी से मात्र 35,451 वोटों के अंतर से ही जीत पाए, क्योंकि कांग्रेस उम्मीदवार को सपा का समर्थन हासिल था और कुर्मी वोटरों का ज्यादा झुकाव भी सपा की ओर देखा गया। पंकज चौधरी ‘राहत रूह’ तेल कंपनी के मालिक भी हैं, जिनके बारे में उनके प्रतिद्वंद्वी वीरेंद्र चौधरी ने एक कार्यक्रम में कह दिया था-‘आप तो कुबेर के खजाने के मालिक हैं।’ क्या अब इस खजाने की चाभी से योगी को ‘डिकोड’ किया जा सकेगा? यही महती जिम्मेदारी तो पंकज चौधरी को सौंपी गई है।
क्यों रंग बदलेंगे सिद्धू?
सूत्रों की मानें तो कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू सपत्नीक पिछले दिनों पंचकूला स्थित मोरनी हिल्स पहुंचे, जहां पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और अब भाजपा नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह का निवास है। कहते हैं यहां इन नेताओं की एक लंबी मुलाकात हुई। सिद्धू ने इशारों-इशारों में कैप्टन को बता दिया कि वे फिर से भाजपा में आने को तैयार हैं अगर भाजपा पंजाब के आने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें सीएम फेस प्रोजेक्ट कर चुनाव लड़े। कहते हैं कैप्टन ने सिद्धू को बता दिया कि इस दफे का विधानसभा चुनाव भाजपा यहां अकालियों के साथ मिलकर लड़ेगी और अकाली कभी सिद्धू को सीएम फेस बनाने को राजी नहीं होंगे। सो, कैप्टन ने सिद्धू को सुझाव दिया है कि उन्हें जो भी निर्णय लेना है वह जल्दी लें, वरना कांग्रेस में भी उनकी संभावनाएं धूमिल होती चली जाएंगी।
…और अंत में
अभी पूर्णिया के पूर्व भाजपा सांसद उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह के पारिवारिक समारोह आहूत था। पप्पू सिंह पीके की पार्टी ‘जन सुराज’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। सो, प्रशांत किशोर भी उस समारोह में पधारे। जहां पत्रकारों ने उन्हंे घेर लिया, नानादि प्रकार के सवाल उनसे पूछे जाने लगे इन सवालों के झुरमुठ में एक सवाल यह भी था कि ‘क्या वे अब भी राजनैतिक पार्टियों को सलाह देने का काम पहले की तरह करते रहेंगे?’
कहते हैं इस सवाल पर पीके ने चुटकी लेते हुए कहा कि ‘अगर कोई डाक्टर अपनी दवा से ही और ज्यादा बीमार हो जाए तो उसके पास इलाज कराने कौन मरीज आएगा?

त्रिदीब रमण