पंजाब में माहौल एक बार फिर ज़हरीला हो चला है। ऐसे माहौल में एक महान पंजाबी महानायक को याद कर लेना चाहिए। एक बार पंजाब सरकार के आग्रह पर हरियाणा में भी भाई कन्हैया की जन्म-त्रिशताब्दी मनाने की बात चली। विचाराधीन विषय था, ‘भाई कन्हैया’ की त्रिशताब्दी।’ पंजाब के मुख्यमंत्री की ओर से हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री को औपचारिक पत्र भेजा गया जिसमें आग्रह किया गया था कि चूंकि पंजाब व हरियाणा की विरासत सांझी है इसलिए भाई कन्हैया की त्रिशताब्दी हरियाणा में भी पूरे जोश व श्रद्धा के साथ मनाई जाए।
इसके लिए हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने एक विशेष बैठक बुलाई। बैठक में एक प्रश्नात्मक सुझाव आया, ‘क्या हम इसकी शुरुआत भाई कन्हैया की जन्मस्थली से कर सकते हैं?’ इस पर मुख्यमंत्री ने बात आगे बढ़ाई, ‘इस योजना का रोडमैप क्या होगा?’ मुख्यमंत्री के एक अधिकारी अपनी कल्पनाशीलता के कारण अपना होमवर्क कर चुके थे। सुझाव आया कि मुख्यमंत्री के नेतृत्व में एक 51 सदस्यीय शिष्टमण्डल भाई कन्हैया के जन्म-गांव जाएगा। वहां से पवित्र जल कलशों में भर कर एक शोभायात्रा निकाली गई।
तब मुख्यमंत्री ने बैठक में ही कह दिया था कि ‘शिष्टमण्डल में कुछ पढ़े-लिखे विद्वान भी ले लो, कहीं ज्यादातर मेरे जैसे मोलड़ ही न हों।’ एक सुझाव आया कि इस दल में पंडित जसराज, जिनका जन्म जिला हिसार के एक गांव में हुआ था और इसी तरह के कुछ विद्वानों व अदीबों को भी ले जा सकते हैं। सूची बनी। उसमें केंद्रीय साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष प्रो. सतेंद्र सिंह नूर जो कि मैं मूल रूप से अम्बाला के थे, नाटककार डॉ. आत्मजीत, मैं स्वयं और पत्रकारों के वर्ग में इंडियन एक्सप्रेस के विपिन पब्बी, कंवर संधू, अजीत समूह के बरजिंदर सिंह हमदर्द व पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल व हरियाणा के कुछ मंत्री, विधायकों को भी लिया गया। मुख्य सूत्रधार तत्कालीन लोकसंपर्क निदेशक श्री राजेश खुल्लर थे। एक अन्य अधिकारी धनपत सिंह भी शामिल थे। इस यात्रा के मध्य एक दुखद घटना वह भी थी जबकि वरिष्ठ पत्रकार कंवर संधू को वहां से वापिस भेजा गया क्योंकि पाक एजेंसियों की नजर में वह ‘अवांछित’ पत्रकारों की सूची में थे। सभी उदास थे। पहले तो विरोध स्वरूप यात्रा को वहीं छोड़ने का मन बना, मगर बाद में कंवर ने स्वयं ही सबसे आग्रह किया कि यात्रा जिस पवित्र लक्ष्य के लिए है, उसे स्थगित नहीं किया जाए।
बातचीत आगे बढ़ाने के लिए लोकसंपर्क निदेशक ने ही पहलकदमी की। उन्होंने वहां के निदेशक लोक सम्पर्क से फोन पर बातचीत की। वहां के मुख्यमंत्री से हरियाणा के मुख्यमंत्री की बात कराई। पाक-पंजाब के मुख्यमंत्री ने सहर्ष अपनी ओर से औपचारिक निमंत्रण भेजा, जिसके आधार पर वीजा आदि की कार्यवाही हुई। विदेश मंत्रालय से भी स्वीकृति मिल गई। इसी बीच तय यह भी हुआ कि शिष्टमण्डल ननकाना साहब भी जाएगा, वारिस शाह की मज़ार पर भी चादरें चढ़ाई जाएंगी और लौटने से पहले सर छोटूराम के लाहौर स्थित पुराने आवास से भी कुछ स्मृति चिह्न लाने का प्रयास भी किया जाएगा।
लाहौर में यह शिष्टमण्डल तीन दिन तक छाया रहा। वहां भारतीय शिष्टमण्डल पाक-पंजाब के चैम्बर्स आफ कामर्स से भी मुखातिब हुआ। वहां पर रहने वाले हरियाणवी मेव लोगों के साथ एक लंच भी आयोजित किया गया। एक ‘लंच’ की दावत पाक पंजाब के मुख्यमंत्री की ओर से थी। खाने की आदतों के बारे में वहां भी पूरी पाबंदी से रही। भारत के मुख्यमंत्री ने हर बार अपने मेजबानों को स्पष्ट कर दिया था कि ‘मैं शाकाहारी भोजन ही लूंगा और भोजन को ऐसे बर्तनों में पकाया जाए जिनमें पहले मांसाहारी भोजन न पका हो। सभी मेज़बानों ने उनकी इस गुजारिश का सख्ती से सम्मान भी किया। एक आदत यह भी सुखद थी कि श्री खुल्लर कहीं भी जाने से पहले थोड़ा होमवर्क कर लेते थे। भाषा पर पकड़ आरम्भ से ही अच्छी रही थी। पाकिस्तान में इसी गुण के कारण सब लोग छाए रहे।
भाई कन्हैया की जन्म स्थली पर एक धर्म स्थान के समीप, पाक-पंजाब की सरकार ने एक ट्यूबवैल के सामने ‘बोर’ करा दिया था। वहीं से शुद्ध ताज़ा जल हमें अपने कलशों में भरना था। पांच कलश भरे गए। सभी ने स्वयं श्रद्धापूर्वक जल का एक लोटा व कुछ पीतल की गागरें सिर पर रखी, फिर सभी समर्थकों ने भी चंवर डुलाया। फिर उन्हें एक वाहन में रखा गया और लाहौर के होटल में रखा। वहीं पर विधिपूर्वक अरदास भी पढ़ी गई। अरदास की रस्म ननकाना साहब से आए एक ग्रंथी ने अदा की। ग्रंथी से यह भी प्रार्थना की गई कि वे गुरु महाराज से इस पवित्र गांव के लोगों की खुशहाली की अरदास भी करें।
इसी यात्रा के मध्य सदल-बल हम लोग सैयद वारिस शाह की मज़ार पर भी गए। वहां परंपरागत रूप में मज़ार पर चादर चढ़ाई और फिर परंपरागत पुराने गायकों से ‘हीर’ सुनी गई। उसी यात्रा के मध्य ननकाना साहब भी गए। वहां भी वही सिलसिला। उस दिन तीखी गर्मी थी। संगमरमर का फर्श तप रहा था मगर सभी नंगे पांव भीतर तक गए। वहां भी वही अरदास व स्थानीय जनता की समृद्धि की गई। पंडित जसराज जी ने वहां एक ‘सबद’ भी गाया।
लाहौर पहुंचते ही सबसे पहला कार्यक्रम था, दीन बन्धू सर चौधरी छोटूराम के पुराने आवास को देखना। जिस कोठी में संयुक्त पंजाब के राजस्व मंत्री के रूप में सर छोटू राम रहते थे, वह तब नवाब मलेरकोटला के भाई के पास थी। वहां माहौल में तर्क देकर नवाब को इस बात पर भी सहमत कर लिया गया कि यदि चौधरी छोटू राम जी की कुछ स्मृतियां एवं स्मृति चिह्न दे दिए जाएं तो सभी स्मृति चिह्न पूरे सम्मान के साथ हरियाणा के उस ग्रामीण संग्रहालय में रखे जाएंगे जो चौधरी छोटू राम की जन्मस्थली पर ही उनके नाम पर स्थापित किया जाना था। नवाब परिवार को यह भी यकीन दिलाया गया कि उन स्मृति चिह्नों के साथ नवाब परिवार के प्रति कृतज्ञता का ज्ञापन भी दर्ज होगा।
इसी संदर्भ में कुछ बातें भाई कन्हैया के नाम के बारे में। जिला सियालकोट के एक कस्बे वजीराबाद के पास ‘सौदरा’ नामक गांव बसा हुआ था। अब शायद उस गांव का भी महत्व बढ़ गया होगा। तब तक वहां किसी भी मीडिया कर्मी या बड़े अधिकारी के पांव नहीं पड़े थे। गांव में उन दिनों सौ के अासपास घर थे। स्वाभाविक रूप से घरों के सौ दरवाजे भी थे और इसी आधार पर नाम रखा गया ‘सौदरा’।
जिस दिन हम लोग वहां पहुंचे तो वहां के भोले लोग आश्चर्य में डूबे हुए थे कि ऐसा क्या था कि दूर-दूर से लोग उनकी सरज़मीं पर ‘मत्था’ टेकने आ रहे थे। एक ग्रामीण अपने साथियों को समझा रहा था, यार! इनका कोई ‘पानी वाला बाबा था जो हमारे गांव से था और वह लड़ाई के मैदान में घायल शत्रुओं को भी पानी पिलाता था। बस ये लोग उसी बाबे की जन्मस्थली पर जि़यारत करने आए हैं।’ क्या यही करूणा भाव अब भी बहाल हो पाएगा?
भाई कन्हैया के गांव में…
Summary :
पंजाब में माहौल एक बार फिर ज़हरीला हो चला है। ऐसे माहौल में एक महान पंजाबी महानायक को याद कर लेना चाहिए। एक बार पंजाब सरकार के आग्रह पर हरियाणा में भी भाई कन्हैया की जन्म-त्रिशताब्दी मनाने की बात चली। विचाराधीन विषय था, ‘भाई कन्हैया’ की त्रिशताब्दी।’ पंजाब के मुख्यमंत्री की ओर से हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री को औपचारिक पत्र भेजा गया जिसमें आग्रह किया गया था कि चूंकि पंजाब व हरियाणा की विरासत सांझी है इसलिए भाई कन्हैया की त्रिशताब्दी हरियाणा में भी पूरे जोश व श्रद्धा के साथ मनाई जाए। इसके लिए हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने एक…


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