अमेरिका और ईरान के बीच समझौता हो गया लगता है, पर यह कैसे लागू होता है, यह समय बताएगा। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर फिर गतिरोध हो सकता है। ईरान और इज़राइल की दुश्मनी क्या रंग लाती है, यह भी समय ही बताएगा। पर यह समझौता दुनिया के लिए और विशेष तौर पर हमारे लिए बड़ी राहत है और बड़ा सबक़ भी है। ज़ख्मी, आहत, लगभग तबाह, ईरान ने सुपरपावर अमेरिका को समझौता करने पर मजबूर कर दिया। जिन डाेनाल्ड ट्रम्प ने समझा था कि एक सप्ताह में ईरान समर्पण कर जाएगा। उन्हें 100 दिन से अधिक समय युद्ध को समाप्त करवाने की मशक्कत करनी पड़ी।
अमेरिका को यह सबक़ 1973 में वियतनाम ने भी सिखाया था कि ज़रूरी नहीं कि बड़ी शक्ति की ही जीत हो। ईरान ने भी बता दिया कि अपने राष्ट्रीय हित के लिए वह कुछ भी पीड़ा बर्दाश्त करने को तैयार है। समर्पण किए बिना ईरान ने महाशक्ति को उसकी जगह दिखा दी और सारी दुनिया को संदेश भेज दिया कि दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए। हमारे लिए भी सबक़ है। दो दशकों से हमने अमेरिका के साथ सम्बंध बेहतर करने में बहुत निवेश किया है। हमने ट्रम्प की बार-बार बदतमीज़ी बर्दाश्त की है,पर हमें मिला क्या? हम खुद को इस क्षेत्र की बड़ी शक्ति समझते हैं, पर हमें शान्ति वार्ता से बाहर रखा गया और उस पाकिस्तान को श्रेय दिया जा रहा है जिसे हम जायज़ आतंकवाद की अम्मा कहते हैं, पर अब हमें अपने भ्रम से बाहर आ जाना चाहिए।
जिस तरह हमारी प्रतिक्रिया की चिन्ता किए बिना अमेरिका ने हमारे तीन नाविकों की हत्या की है उससे हमें पता चल जाना चाहिए कि यह रिश्ता किधर जा रहा है। माफी तो क्या मांगनी थी, अमेरिका ने खेद तक प्रकट नहीं किया। न ही हमने माफ़ी या पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा देने की मांग ही की है। अमेरिका तो साम्राज्यवादी अहंकार दिखा रहा है, पर हमारी प्रतिक्रिया इतनी कमजोर क्यों है? दुनिया देख रही है कि भारत उभरती ताक़त ज़रूर है, पर बराबर राजनीतिक दृढ़ता नहीं है। होर्मुज के जलमार्ग से निकल रहे तीन जहाज़ों पर अमेरिकी नौसेना ने हमला कर दिया जिसमें हमारे तीन नाविक मारे गए। उसके बाद जो हुआ वह और भी बुरा था तो अत्यंत कठोर भाषा में जवाब आया कि, “सभी व्यावसायिक जहाज़ों को अमेरिका के आदेश का पालन करना होगा, अमेरिका के आदेश की अवहेलना बर्दाश्त नहीं की जाएगी”।
हमारे लोगों के मारे जाने पर रूबियो ने कोई शोक प्रकट नहीं किया, न कोई संवेदना ही प्रकट की गई। बाक़ी प्रभावित 21 भारतीय नौसैनिकों को ओमान की नौसेना ने बचाया, अमेरिका ने बचाने की कोई कोशिश नहीं की। यह सारा घटनाक्रम बहुत चिन्ताजनक है। अमेरिका ने जहाज़ पर ‘हैलफॉयर मिसाइल’ दागी जो पहले वह केवल अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, यमन, सोमालिया और इराक़ जैसे दुश्मन देशों पर दाग चुका है। इतिहास में पहली बार ‘हैलफॉयर’ भारतीय नागरिकों पर दागी गई और यह वह अमेरिका है जो भारत का ‘रणनीतिक साझेदार’ है और क्वाड में पार्टनर है। दोनों देश ‘बड़े रक्षा पार्टनर’ भी हैं। दोनों इकट्ठे युद्ध अभ्यास भी करते हैं और भारत-प्रशांत महासागर में सहयोग करते हैं।
अमेरिका हमारी बंदरगाहों का इस्तेमाल लॉजिस्टिक मक़सद के लिए करता है। फिर भी अंतर्राष्ट्रीय जल में हमारे नाविकों को निशाना बनाया गया। जहाज़ को रोकने के और तरीक़े भी हो सकते थे, पर यहां तो बिना चेतावनी, जो बात चालक दल के कैप्टन ने कही है,दो हैलफॉयर मिसाइल मार दी गई और घमंड में कहा जा रहा है कि यह तो होना ही था। अमेरिकी नौसेना का तीनों जहाज़ों के चालक दल के साथ सीधा संचार था और उन्हें मालूम था कि चालक भारतीय नागरिक हैं, पर फिर भी वह मिसाइल दागी गई जो दुश्मन देशों पर दागी जाती है। माफ़ी मांगने की जगह इनकी हत्या को उचित ठहराया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि अभी तक अमेरिका ने किसी भी टैंकर, जो चीन या रूस से आ रहा या जा रहा था, पर हमला नहीं किया।
अमेरिका की तरफ़ से लगातार नकारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। हम पर 50% टैरिफ़ थोपा गया। ट्रम्प वहां हमारे प्रोफेशनल को ‘टैरेरिस्ट विद लैपटॉप’ कह चुके हैं। यहां से गए अवैध प्रवासियों को ज़ंजीरों में जकड़ कर वापस भेजा गया। ज़ंजीरों की क्या ज़रूरत थी, वैसे ही भेजा जा सकता था। पाकिस्तान के नेतृत्व की वह लगातार प्रशंसा कर रहे हैं। यह दोस्ती उन्हें मुबारक, पर हमारे साथ अनुचित व्यवहार क्यों हो रहा है ? पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल अरुण प्रकाश ने अमेरिकी कार्यवाही को “भारतीय भावना की लापरवाह अनदेखी” कहते हुए लिखा है, “विदेश मंत्री का केवल यह कहना कि व्यावसायिक जहाजरानी पर ऐसी प्राणघाती कार्यवाही न्यायोचित नहीं है, देश में जो आक्रोश है उसे व्यक्त नहीं करता”। याद किया जा रहा है कि जब यूपीए की सरकार थी तो अमेरिका में हमारी राजनयिक देवयानीखोब्रागडे के साथ घोर दुर्व्यवहार किया गया था।
तब भारत सरकार ने अमेरिकी दूतावास के बाहर से सुरक्षा हटा ली थी। अमेरिका के दूतावास के कर्मचारियों के विशेषाधिकार वापिस ले लिए थे। वर्तमान सरकार की कूटनीति रही है कि सम्बंधों को किसी तरह टूटने से बचाया जाए, पर नवीनतम घटना बताती है कि अमेरिका को चिन्ता नहीं कि इन रिश्तों का क्या होता है? डाेनाल्ड ट्रम्प कह ही चुके हैं कि वर्षों से भारत ने हमारा फ़ायदा उठाया है अब हम बराबर कर रहे हैं। यह बहुत आपत्तिजनक नहीं है, मिसाइल दागना तो बिल्कुल अस्वीकार्य होना चाहिए। आशा है इस सप्ताह जब प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस में ट्रम्प से मिले तब भारतीय नाविकों की मौत का मामला उठाया। हम क्वाड पार्टनर नहीं हो सकते अगर समुद्र में हमारे लोगों से ऐसा बेरहम बर्ताव होता है। अगर ट्रम्प को पाकिस्तान प्यारा है, तो ऐसा ही सही।
अमेरिका का रवैया इतना बदला क्यों है? एक राय है कि अमेरिका हमें भावी प्रतिद्वंद्वी समझता है इसलिए हमारा उभार रोकना चाहता है। रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि “अब अमेरिका भारत को रणनीतिक साझेदार जिससे सहयोग करना चाहिए कम, और क्षेत्रीय तथा आर्थिक प्रतिद्वंद्वी जिसे रोकना है, अधिक समझता है। हमें अपनी रणनीतिक सोच में मूलभूत बदलाव लाना चाहिए”। नई दिल्ली आकर अमेरिका के उपिवदेश मंत्री क्रिस्टोफ़र लॉनडाऊ कह गए हैं कि कि अमेरिका भारत के बारे वही गलती नहीं दोहराएगा जो चीन के बारे दोहराई गई। अर्थात वह भारत को भी चीन की तरह आर्थिक प्रतिद्वंद्वी नहीं बनने देंगे।जैसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने लिखा है, “अमेरिका अब भारत के प्रति परिणाम की चिन्ता किए बिना कदम उठा रहा है”।
पहले ट्रेड का इस्तेमाल हथियार के तौर पर किया गया था, पर अब उन वास्तविक हथियारों का इस्तेमाल किया गया जो दुश्मन देश करते हैं। अमेरिका अब समझता है कि उसे भारत की ज़रूरत नहीं है। प्रोफैसर कान्ति बाजपेयी का विचार है कि भारत और अमेरिका का ‘स्पेशल रिलेशनशिप’ ख़त्म हो चुका है… अमेरिका ने भारत के प्रति नज़रिया बदल लिया है”। एक समय ज़रूर था कि अमेरिका को आशा थी कि भारत धीरे-धीरे चीन से फ़ासला कम कर लेगा, पर ऐसा हुआ नहीं। चीन और भारत में न केवल आर्थिक, बल्कि सैनिक और यहां तक कि टैक्नाेलाॅजी में फ़ासला बढ़ता जा रहा है, इसलिए अमेरिका ने तय कर लिया है कि भारत की चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है। यही कारण भी है कि हमारी भावना को नज़रअंदाज़ करते हुए ट्रम्प ने असीम मुनीर को गोद में उठा लिया है।
हां, भारत के बड़े बाज़ार में उन्हें दिलचस्पी ज़रूर है, पर रणनीतिक साझेदारी के दिन ख़त्म हो चुके लगते हैं। क्वाड का कोई भविष्य नहीं है। डाेनाल्ड ट्रम्प खुद चीन से सम्बंध बेहतर करने में लगे हैं, चाहे उनकी चीन यात्रा फीकी रही है। भारत ने भी स्पष्ट कर दिया कि वह चीन के विरुद्ध क्वाड में संयुक्त मोर्चे के खिलाफ है। इज़राइल ने अमेरिका और ईरान के बीच समझौता स्वीकार करने से इंकार कर दिया है। उनका रवैया सही है या ग़लत यह अलग बात है, पर जिसे वह अपना राष्ट्रीय हित समझते हैं, उस पर वह अड़े हुए हैं।
भारत की प्रतिक्रिया को कुछ विशेषज्ञ ‘मैच्योर’ (परिपक्व) कहते हैं। समय आ गया है कि हम यह कथित परिपक्वता छोड़ अनुचित को अनुचित कहना शुरू करें। इज्जत प्रदान नहीं की जाती, कई बार उसे हासिल करने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। अमेरिका को उनकी ही कठोर भाषा में बताया जाना चाहिए कि भारतीयों की ज़िन्दगियां भी मायने रखती हैं। जब तक वह यह स्वीकार नहीं करते तब तक सम्बंध सामान्य नहीं होंगे। हम कोई मामूली देश नहीं हैं जो अमेरिका की मेहरबानी पर आश्रित हो। अमेरिका के साथ अच्छे सम्बंध चाहिए, पर ताली एक हाथ से नहीं बजती।























