मध्य प्रदेश के इन्दौर महानगर में दूषित जल पीने से जिस प्रकार 15 लोगों की मृत्यु हुई है वह भारत में बेतरतीब हुए शहरी विकास का भी एक लक्षण है। स्वतन्त्रता के बाद से देश में जिस प्रकार लगातार शहरीकरण बढ़ रहा है और गांवों में भौतिक विकास की आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ी हैं, उसी का परिणाम है कि आज शहरों पर लगातार आबादी का बोझ बढ़ रहा है और इनमें मूलभूत साफ-सफाई से लेकर शुद्ध पेयजल व खाद्य सामग्री का संकट खड़ा हो जाता है। बेशक लोकतन्त्र में लोगों की मूल आवश्यकताओं जैसे भोजन, शिक्षा व स्वास्थ्य की सुविधा उपलब्ध कराना सरकारों का मुख्य कार्य होता है मगर शहरीकरण के दबाव में इन मूलभूत सुविधाओं की समुचित सुलभता न होना भी असामान्य नहीं होता है क्योंकि जैसे-जैसे इन सुविधाओं का विकास प्रतिवर्ष होता है वैसे-वैसे ही इनकी आबादी में वृद्धि होती जाती है लेकिन इसके बावजूद सरकारें अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकती हैं क्योंकि उनकी राजस्व उगाही में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी होती है। शहरों के विकास के लिए और समयानुरूप आधुनिकीकरण के लिए कालान्तर से ही केन्द्र से लेकर राज्य सरकारें विभिन्न परियोजनाएं चलाती रही हैं लेकिन इनकी गति वह नहीं होती जिस गति से इन शहरों की आबादी का विस्तार होता है।
मध्य प्रदेश में कुल 16 शहर एेसे हैं जहां नगर निगम हैं। इन्हीं में से एक इन्दौर के इलाके भगीरथ पुरा में दूषित जल सप्लाई की वजह से 15 लोगों की मृत्यु हो गई जिनमें बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक शामिल हैं। नगर निगम द्वारा सप्लाई किये जा रहे पानी में सीवर लाइन का पानी मिल जाने की वजह से जल दूषित हुआ और इस तरफ स्थानीय निवासियों द्वारा जब विगत अक्तूबर महीने में निगम अधिकारियों से शिकायत की गई तो उनके कान पर जूं तक नहीं रेंगी। परिणामस्वरूप दिसम्बर महीने के अन्त तक इस समस्या ने भयंकर रूप ले लिया और अपने घरों में लगे नल का पानी पीने से उनकी मृत्यु होने लगी। जब लोग दूषित जल पीने की वजह से बीमार होकर स्थानीय अस्पतालों के चक्कर काटने लगे और वहां से ये खबरें आने लगीं कि बीमार लोगों में से कुछ की मृत्यु का कारण दूषित जल है तो स्थानीय नगर निगम अधिकारियों के कान खड़े हुए और उन्होंने समस्या का संज्ञान लिया।
भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में त्रिस्तरीय प्रशासनिक प्रणाली केन्द्र, राज्य व स्थानीय निकाय इसीलिए स्थापित की गई थी जिससे इसके नागरिकों को हर स्तर पर जीवन जीने की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हो सकें। इन तीनों में स्थानीय निकाय या नगर पालिका की बहुत मूलभूत जिम्मेदारी रहती है। वह सामुदायिक विकास की योजनाओं पर ध्यान देती है और नागरिकों के जीवन-मरण का हिसाब-किताब भी रखती है। नगर निगमों व पालिकाओं का अपना बजट होता है जिन्हें राज्य सरकारें संपोषित करती है। यह बजट नागरिकों की दैनन्दिन की जरूरतों को पूरा करने के लिए ही बनाया जाता है। इनमें साफ-सफाई का विशेष महत्व होता है। शहरीकरण बढ़ने से इसके हर इलाके में सीवर लाइन बिछाने व पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराने को विशेष वरीयता दी जाती है क्योंकि इन दोनों के बिना नागरिकों का जीवन नहीं चल सकता है परन्तु ये दोनों ही कार्य इतनी वैज्ञानिक विशिष्टता के साथ किये जाते हैं कि किसी भी स्तर पर दोनों की लाइनों में प्रवाहित होने वाले जल का मिश्रण न हो सके परन्तु इन्दौर के भगीरथ पुरा इलाके की पेयजल व सीवर लाइनों का पानी आपस में मिल गया जिसकी वजह से भयावह स्थिति पैदा हो गई। एेसा नहीं है कि एेसी घटना इन्दौर शहर में पहली बार हुई है क्योंकि भारत के बहुत से महानगरों से एेसी खबरें पहले भी आती रही हैं मगर इन्दौर नगर निगम के अधिकारियों ने जिस प्रकार से इस बारे में लोगों की शिकायतें मिलने पर नजरंदाजी की उसे अक्षम्य कहा जा सकता है।
जाहिर है कि 15 लोगों की दूषित जल पीने से मृत्यु होने के बाद घटना की हुंकार ऊपर तक पहुंचनी लाजिमी थी अतः मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री श्री मोहन यादव का सिंहासन भी डोला और उन्होंने इन्दौर नगर निगम के अपर आयुक्त को निलम्बित करने के साथ अन्य दो बड़े अधिकारियों के विरुद्ध भी कार्रवाई की। मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार है और इन्दौर नगर निगम पर भी पिछले तीन दशकों से इसी पार्टी का कब्जा है अतः इस पार्टी की जिम्मेदारी बनती है कि उसके नेता इस घटना की सीधी जिम्मेदारी लें क्योंकि इससे सीधे भाजपा की प्रशासनिक क्षमता पर सवालिया निशान लगा है और राज्य की विपक्षी पार्टी कांग्रेस को यह कहने का मौका मिल गया है कि भाजपा में प्रशासन कला की दक्षता नहीं है। इसलिए भाजपा की शीर्ष नेता व राज्य की पूर्व मुख्यमन्त्री सुश्री उमा भारती द्वारा अपनी ही पार्टी की सरकार की आलोचना किये जाने को गैर वाजिब नहीं कहा जा सकता। भगीरथ पुरा इलाके में दूषित पेय जल का प्रकोप किस कदर हुआ, इसका अन्दाजा इसी से हो सकता है कि अभी तक इस क्षेत्र में 13 घरों के 66 हजार लोगों की जांच में उनमें इस जल के कीटाणुओं का प्रकोप पाया गया। अभी भी अस्पतालों में तीन सौ से अधिक लोग गंभीर रूप से इसी वजह से बीमार पड़े हुए हैं। इन्दौर की इस घटना का राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्व है क्योंकि भारत के विभिन्न महानगरों में एेसी समस्या को रोकने के लिए आपातकालीन टीमें तैयार होनी चाहिए और सीवर लाइनों के रखरखाव का परीक्षण निश्चित अन्तराल के बाद होते रहना चाहिए।
इन्दौर का दूषित जल संकट
Summary :
मध्य प्रदेश के इन्दौर महानगर में दूषित जल पीने से जिस प्रकार 15 लोगों की मृत्यु हुई है वह भारत में बेतरतीब हुए शहरी विकास का भी एक लक्षण है। स्वतन्त्रता के बाद से देश में जिस प्रकार लगातार शहरीकरण बढ़ रहा है और गांवों में भौतिक विकास की आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ी हैं, उसी का परिणाम है कि आज शहरों पर लगातार आबादी का बोझ बढ़ रहा है और इनमें मूलभूत साफ-सफाई से लेकर शुद्ध पेयजल व खाद्य सामग्री का संकट खड़ा हो जाता है। बेशक लोकतन्त्र में लोगों की मूल आवश्यकताओं जैसे भोजन, शिक्षा व स्वास्थ्य की सुविधा…



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