19 मार्च से नवरात्रे शुरू हैं। सभी धूमधाम से नवरात्रे मनाने की तैयारी में हैं। ईद भी आ रही है, उसकी तैयारी में भी हैं। मुझसे मंगलवार को एक सम्मानित व्यक्ति मिलने आए जो पहले नवरात्रे को वैष्णो देवी मां के दर्शन के लिए जा रहे हैं और उन्होंने मुझे कहा कि अगर उनकी वीआईपी व्यवस्था मैं करवा सकूं तो मेरे आभारी होंगे। सबको मालूम है अश्विनी जी वैष्णो माता के बहुत साल तक ट्रस्टी रहे। उन्हें अडवानी जी ने बनवाया था। तब वह सबको चाहे वो अमीर, गरीब, छोटा-बड़ा व्यक्ति हो उन सबको लेटर दे देते थे, दर्शन करवा देते थे। उनका दरवाजा हमेशा माता के भक्तों के लिए खुला रहता था।
मैंने उनको समझाया कि अब वैसा नहीं, फिर भी मैं आपको लेटर दे देती हूं और तब मैंने उनकी मां का हाल पूछा तो उन्होंने कहा मां अकेली उदास हो जाती थी इसलिए उत्तराखंड बहुत अच्छा सीनियर सिटीजन सेंटर खुला है, जहां मैंने उनको वहां छोड़ा है, वो वहां खुश रहती हैं। मैंने उनसे पूछा वो उदास क्यों रहती थीं। आपके बच्चे, पत्नी हैं। तब उन्होंने कहा मेरी पत्नी अपने आप में बहुत व्यस्त रहती है। मेरे बच्चे पहले पढ़ाई करते हैं, फिर घर आकर ट्यूशन, तब उनके खेलकूद का समय हो जाता है, तब उनके पास अपनी दादी के लिए समय नहीं रहता। मैं बड़ी हैरान हुई कि यह क्या है तो मैंने पूछा माता के दर्शन को कौन-कौन जा रहा है। मैं और मेरी पत्नी आैर बच्चे। हम हर महीने जाते हैं। मेरी पत्नी, बच्चे माता के भक्त हैं। मेरी पत्नी और बच्चों को चैन नहीं आता जब तक माता के दर्शन न कर लें। मैं बड़ी हैरान थी कि उनके पास सब बातों के लिए समय है और माता के दरबार भी जाना जरूरी है, परन्तु अपनी मां और दादी के िलए एक मिनट का समय नहीं। क्योंकि मेरा मानना है जिस घर में मां खुश होती है, वहीं सच्चे अर्थों में देवी माता का वास होता है। वैष्णो देवी माता भी तभी खुश होती हैं जब आप अपनी घर की मां को खुश रखो। यही नहीं मैं कुछ महिलाओं और व्यक्तियों को जानती हूं जिनकी जुबान पर जय माता की, जय माता की होता है, परन्तु उठते-बैठते झूठ बोलना, फरेब करना, इधर की बात उधर करना, ऐसे लोगों की माता अस्थाई तौर पर तो सुनती होगी परन्तु सही मायने में साथ नहीं देती होगी या यूं कह लो ऐसी पूजा का क्या फायदा जो हर समय व्यक्ति दूसरों का बुरा करे, झूठ बोले। अगर हम माता रानी की आरती करें लेकिन अपनी मां को अकेला छोड़ दें तो हमारी पूजा अधूरी है। हमें मंदिर में जाकर देवी को ढूंढने से पहले, अपने घर में अपनी मां के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करनी चाहिए। आज के समय में हम देखते हैं लोग मंदिरों में घंटों पूजा करते हैं लेकिन घर में अपनी मां के लिए उनके पास समय नहीं होता, यह कैसी भक्ति है।
शनिवार को ईद का पवित्र त्यौहार मनाया गया, जो हमें प्यार, भाईचारे और इंसानियत का संदेश देता है। क्या हम सच में पूजा और त्योहारों का असली अर्थ समझ रहे हैं। ईद हमें सिखाती है अपनों का ख्याल रखना, भाईचारा रखना। ईद मिलन अर्थात् सबके साथ खुशियां, प्यार बांटना, अपनों का ख्याल रखना, बुजुर्गों का सम्मान करना, जरूरतमंदों की मदद करना। क्या इस बार उन लोगों ने ईद मनाई, जिन्होंने एक युवक की मिलकर हत्या कर दी। क्या उनके मन ने उनको इसकी इजाजत दी। एक समय था जब शहर के बेटा-बेटी या मोहल्ले के बेटा-बेटी अपने होते थे। आज क्या हो रहा है इंसानियत तार-तार हो रही है। अगर किसी से भी कोई गलती हो जाती है, चाहे वो किसी भी धर्म से हो तो हमारा फर्ज बनता है उसे प्यार से, डांट कर उसकी गलती का अहसास कराएं न कि किसी को जान से मार दें, कोई भी धर्म, मजहब यह नहीं सिखाता।
इस नवरात्रे और ईद पर हमें सबको संकल्प लेना होगा कि हम सब मिलकर भाईचारे से रहेंगे और घर की मां या बुजुर्गों को सम्मान देंगे, सेवा करेंगे और समय देंगे। उनके साथ समय बिताएंगे, उनका आशीर्वाद लेंगे, तभी हमारा पूजा और त्यौहारों को मनाने का औचित्य होगा।
सच्ची पूजा और इबादत होगी, यही सच्ची ईद होगी और यही हमारी भारतीय संस्कृति की असली पहचान है। आज हम सभी व्यस्त हैं, मोबाइल, काम और दुनिया में, लेकिन हम भूल जाते हैं अगर हम मां की आरती करें लेकिन अपनी मां का सम्मान न करें, उसको प्यार न दें, उनके साथ समय न बिताएं तो हमारी पूजा अधूरी है। ईद भी हमें यही सिखाती है अपनों को गले लगाना है और दिल से रिश्ता निभाना है।























