तमिलनाडु में विजय की ‘जय’

Summary :

तमिलनाडु में राज्यपाल राजेन्द्र आर्लेकर ने अंततः जोसेफ विजय को नई सरकार बनाने का न्यौता दे ​िदया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि लोकतंत्र में जनमत और सरकार की स्थिरता दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं। क्योंकि दक्षिण भारत के सबसे बड़े राज्य तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों के बाद राजनीतिक दलों की जो तस्वीर उभरी है उसमें राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम की भारी पराजय हुई है और लोगों ने कुछ महीनों पहले ही बनी फिल्म अभिनेता जोसेफ विजय की नई पार्टी तमिलगा वेट्री कषगम को भरपूर समर्थन दिया है। मगर यह समर्थन इतना भी नहीं है कि उन्हें…

तमिलनाडु में राज्यपाल राजेन्द्र आर्लेकर ने अंततः जोसेफ विजय को नई सरकार बनाने का न्यौता दे ​िदया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि लोकतंत्र में जनमत और सरकार की स्थिरता दोनों ही महत्वपूर्ण होते हैं। क्योंकि दक्षिण भारत के सबसे बड़े राज्य तमिलनाडु में विधानसभा चुनावों के बाद राजनीतिक दलों की जो तस्वीर उभरी है उसमें राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम की भारी पराजय हुई है और लोगों ने कुछ महीनों पहले ही बनी फिल्म अभिनेता जोसेफ विजय की नई पार्टी तमिलगा वेट्री कषगम को भरपूर समर्थन दिया है। मगर यह समर्थन इतना भी नहीं है कि उन्हें 234 सदस्यीय विधानसभा में अपने बूते पर पूर्ण बहुमत मिल जाता। श्री विजय की पार्टी के सर्वाधिक 108 विधायक जीते हैं और द्रमुक के उसके सहयोगियों के साथ 69 विधायक जीते हैं जबकि विपक्षी पार्टी अन्ना द्रमुक के विधायकों की संख्या 49 के पास रही है। इससे स्पष्ट है कि तमिलगा कषगम सबसे बड़ी पार्टी है। चुनाव नतीजे विगत 4 मई को ही आ गये थे मगर राज्य में नई सरकार बनाने के लिए राज्यपाल श्री राजेन्द्र आर्लेकर ने श्री विजय को आमन्त्रित नहीं किया है जबकि श्री विजय ने उनसे भेंट करके विगत 6 मई को ही सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया था।
राज्यपाल ने उनसे कहा है कि वह उनके समक्ष बहुमत के लिए पहले जरूरी 117 विधायकों की फेहरिस्त पेश करें तभी वह नई सरकार बना सकते हैं। स्वयं राज्यपाल महोदय ने यह स्वीकारोक्ति एक न्यूज चैनल को दिये गये एक साक्षात्कार में की। अतः इस बारे में अब अटकलबाजी का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। चूंकि श्री विजय दो क्षेत्रों से चुनाव जीते हैं तो विधानसभा की सदस्य शक्ति 233 हो गई है और इसका बहुमत 117 सदस्यों का बैठता है। सवाल यह पैदा हो रहा है कि क्या राज्यपाल ने श्री विजय को सरकार बनाने का निमन्त्रण न देकर भारतीय लोकतन्त्र की किसी परंपरा या नियम को तोड़ा है तो एेसा भी नहीं है क्योंकि भारत में दोनों तरह के उदाहरण हैं। बेशक एेसे उदाहरण अधिक हैं जब राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी के नेता को सीधे सरकार बनाने के लिए आमन्त्रित करके कहा हो कि वह एक निश्चित समयावधि के भीतर विधानसभा में अपना बहुमत साबित करें।
भारतीय संविधान के अनुसार राज्यपाल का यह धर्म व कर्त्तव्य होता है कि वह चुनावों के बाद लोकमत से चुनी गई पार्टी की लोकप्रिय सरकार गठित करायें। मगर यह सरकार स्थायी भी होनी चाहिए। जहां तक बहुमत का सवाल है तो त्रिशंकु विधानसभा बनने पर राज्यपाल को देखना होता है कि कौन-कौन से दलों का गठबन्धन चुनाव पूर्व या चुनाव बाद हुआ है। यदि चुनाव पूर्व बने गठबन्धन को बहुमत मिलता है तो पहला अधिकार उसी गठबन्धन का सरकार बनाने का होता है। यदि एेसा न हो तो चुनाव बाद बने गठबन्धन को यदि पूर्ण बहुमत प्राप्त हो रहा हो तो सरकार वही बनायेगा। जहां तक लोकप्रिय सरकार का प्रश्न है तो राज्यपाल को अपने विवेक से यह देखना होता है कि जनता ने चुनावों में किस दल या गठबन्धन के खिलाफ मत दिया है। तमिलनाडु में द्रमुक की सरकार थी, वह चुनावों में हार गई, विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक के पक्ष में लोगों ने द्रमुक से भी कम समर्थन दिया जबकि श्री विजय की पार्टी के सर्वाधिक प्रत्याशी जीते। इसलिए यदि द्रमुक व अन्ना द्रमुक मिलकर सरकार बनाने की बात करते हैं तो वह जनमत के विरुद्ध और संविधान को चोट पहुंचाने वाला होगा। अतः जनमत श्री विजय के पक्ष में रहा। इसलिए सरकार बनाने के उनके दावे को खारिज नहीं किया जा सकता। मगर राज्यपाल उनसे आवश्यक बहुमत का प्रमाण चाहते हैं जो कि असंवैधानिक भी नहीं है क्योंकि स्थायी सरकार के बनने को देखना भी राज्यपाल का ही काम है। इसी वजह से भारतीय लोकतन्त्र में दोनों तरह के उदाहरण ही विद्यमान हैं।
1996 में जब भाजपा के श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 13 दिन की सरकार बनाई थी तो तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. शंकर दयाल शर्मा ने उन्हें सरकार बनाने की दावत इसी वजह से दी थी कि भाजपा के उन चुनावों में सर्वाधिक 166 सांसद जीतकर आये थे। मगर 1998 में जब केन्द्र में भाजपा नीत एनडीए की सरकार श्री वाजपेयी के नेतृत्व में ही गठित हुई तो राष्ट्रपति ने उनसे लोकसभा में जरूरी बहुमत होने का लिखित प्रमाण मांगा था। तब श्री वाजपेयी ने उनका समर्थन करने वाले कई दलों की चिट्ठियां दिखाई थीं। इसी प्रकार इसी वर्ष जब श्री वाजपेयी की सरकार केवल एक वोट से लोकसभा में गिर गई तो कांग्रेस नेता श्रीमती सोनिया गांधी सरकार बनाने का दावा करने के लिए राष्ट्रपति श्री के.आर. नारायणन के पास गई थीं तो उन्होंने भी कहा था कि पहले वह जरूरी बहुमत के लिए 272 सांसदों के दस्तखत उन्हें दिखायें लेकिन इसके विपरीत बहुत से राज्यों में त्रिशंकु विधानसभा बनने पर सबसे बड़े दल को आमन्त्रित किये जाने के भी ढेर उदाहरण हैं। इसमें यह भी महत्वपूर्ण है कि चुनाव बाद लोकप्रिय सरकार गठित करने के दायित्व से राज्यपाल बन्धे होते हैं। अतः वह त्रिशंकु विधानसभा के गठित होने पर सबसे पहले सबसे बड़े दल के नेता से ही पूछते हैं कि क्या वह बहुमत की सरकार बनाने में सक्षम हैं? उनके ना कहने पर ही फिर वह अन्य विकल्पों को तलाशते हैं। एेसा 2000 में बिहार में हो चुका है जब स्व. बूटा सिंह इस राज्य के राज्यपाल थे। मगर यह भी हकीकत है कि राज्यपाल श्री विजय से यह नहीं कह सकते कि पहले वह उनके समक्ष बहुमत साबित करें। इस बारे में सरकारिया आयोग की सिफारिशें बहुत स्पष्ट हैं और सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसले भी शीशे की तरह साफ हैं कि बहुमत का फैसला केवल विधानसभा के भीतर ही हो सकता है। राज्यपाल ने भी स्वयं यही कहा। वास्तव में सदन के भीतर बहुमत इस बात पर भी निर्भर करता है कि विश्वास मत के समय सदन में विधायकों की उपस्थिति कितनी है। जब सरकार विश्वास मत प्राप्त करती है तो बहुत से विरोधी पक्ष के विधायक अनुपस्थित भी रह सकते हैं जिससे सदन की शक्ति कम हो जाती है। श्री विजय को कांग्रेस के पांच विधायकों ने अपना समर्थन दे दिया है जिससे तमिलगा कषगम के पक्ष में 112 विधायक हो गये हैं। अब बहुमत के लिए केवल सात और विधायक चाहिए। अब द्रमुक गठबन्धन में शामिल चार कम्युनिस्ट पार्टियों के विधायकों व वी.सी.के. पार्टी के दो विधायकों ने भी श्री विजय को समर्थन देने का फैसला कर लिया है।

Aditya Chopra

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