मीडिया की सुर्खियां इस समय पश्चिम बंगाल के ‘जायंट किलर’ (बड़े दिग्गजों को हराने वाले) शुभेंदु अधिकारी के एक करीबी सहयोगी पर हुए कायराना हमले की खबरों से भरी हैं। शुभेंदु अधिकारी ने कोलकाता के भवानीपुर स्थित ममता बनर्जी के गढ़ में उन्हें करारी शिकस्त दी थी। ममता बनर्जी इस सीट से 14 बार चुनाव जीत चुकी थीं, लेकिन पश्चिम बंगाल में चली भाजपा की लहर के आगे उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
बहरहाल, ऐसा लगता है कि अधिकारी के सहयोगियों का इतिहास बदकिस्मती और अस्वाभाविक मौतों से भरा रहा है। उनके निजी सहायक रहे प्रदीप झा का शव 2013 में उनके ही घर में फंदे से लटका हुआ मिला था। उस समय शुभेंदु अधिकारी, ममता बनर्जी के सबसे करीबी सलाहकारों में से एक थे और खुद को उनका भावी उत्तराधिकारी भी मानते थे। फिर, 2018 में, उनके निजी अंगरक्षक सुभब्रत चक्रवर्ती की हत्या कर दी गई। तीन साल बाद, 2021 में, उनके एक करीबी सहयोगी और भरोसेमंद काउंटिंग एजेंट पुलक लाहिड़ी की भी हत्या कर दी गई। और अब, भवानीपुर और उनके गृह क्षेत्र नंदीग्राम में अधिकारी की दोहरी जीत के ठीक बाद, उनके सहयोगी चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई। अपने करीबी सहयोगियों के मामले में सुभेंदु अधिकारी का दुर्भाग्य बेहद दुखद रहा है।
अन्नाद्रमुक का बागी गुट जा सकता है टीवीके के साथ
तमिलनाडु में हालात पेचीदा होते जा रहे हैं, ऐसी खबरें आ रही हैं कि अन्नाद्रमुक का एक अलग हुआ गुट सरकार बनाने के लिए विजय की पार्टी टीवीके का समर्थन कर सकता है। इसका मकसद कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखना है। तमिलनाडु में राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस योजना के पीछे भाजपा का हाथ है। राज्य के राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, दिवंगत जयललिता जैसी कद्दावर नेता के बिना अन्नाद्रमुक अनाथ जैसी हो गई है और अब वह कमोबेश राज्य में भाजपा की ‘बी-टीम’ की तरह काम कर रही है।
अन्नाद्रमुक का एक गुट विजय के साथ हाथ मिलाने को तैयार है। दिक्कत यह है कि विजय इस पार्टी के साथ गठबंधन करने को लेकर हिचकिचा रहे हैं। आखिर, उन्होंने अतीत में जयललिता के बारे में बुरा-भला कहा था और वह अपने साथी के तौर पर पांच विधायकों वाली कमजोर कांग्रेस को ही तरजीह देंगे। टीवीके और कांग्रेस ने नई बनी विधानसभा से इस्तीफा देने की धमकी देकर हालात और भी मुश्किल बना दिए हैं, क्योंकि इससे संवैधानिक संकट पैदा हो जाएगा और नए सिरे से चुनाव कराने की नौबत आ जाएगी। अगर विजय को अगली सरकार का नेतृत्व करने का मौका नहीं मिलता है, तो तमिलनाडु में कई लोगों का मानना है कि दोबारा चुनाव होने पर वह पूरे राज्य में शानदार जीत हासिल करेंगे। उम्मीद है कि यह उलझन इस सप्ताहांत तक सुलझ जाएगी।
कांग्रेस के बड़े प्रशंसक रहे हैं थालापति विजय के पिता
ऐसा लगता है कि कांग्रेस और अभिनेता विजय के बीच की करीबी कोई नई बात नहीं है, विजय की पार्टी टीवीके ने तमिलनाडु में अपने पहले ही चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया है। विजय और उनके पिता, फिल्म निर्माता और निर्देशक एस.ए. चंद्रशेखर, कांग्रेस पार्टी के बहुत बड़े प्रशंसक रहे हैं उन दिनों से ही, जब तमिलनाडु में कांग्रेस की ही सरकार हुआ करती थी। चेन्नई में स्थित टीवीके के मुख्यालय में तो कांग्रेस पार्टी के दिग्गज तमिल नेता, दिवंगत के. कामराज की एक प्रतिमा भी लगी हुई है। दरअसल, चुनाव से पहले वरिष्ठ चंद्रशेखर ने कहा था कि वह तमिलनाडु में कांग्रेस को उसके पुराने गौरवशाली दिनों में लौटते देखना चाहते हैं। उन्होंने कांग्रेस और टीवीके के बीच गठबंधन का पूरी तरह से समर्थन किया था।
विजय द्वारा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को सार्वजनिक करने और अपनी पार्टी टीवीके बनाने से काफी पहले ही, उनकी और राहुल गांधी की मुलाकात हो चुकी थी। यह बात साल 2009 की है, जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में थी। यह मुलाकात राहुल गांधी की पहल पर हुई थी। उन्होंने विजय को दिल्ली बुलाया था। मीडिया ने इस मुलाकात पर कोई खास ध्यान नहीं दिया था, क्योंकि उस समय विजय को केवल उनकी फिल्मों के लिए ही जाना जाता था।
तमिलनाडु में कांग्रेस के कई युवा नेता, जिन्हें राहुल गांधी का करीबी माना जाता है – जैसे कि माणिक टैगोर और प्रवीण चक्रवर्ती -ने टीवीके के साथ चुनाव से पहले गठबंधन करने की वकालत की थी। राहुल गांधी हिचकिचा रहे थे, लेकिन आखिरकार उन्हें सावधानी भरा रास्ता अपनाने और डीएमके के साथ जाने के लिए मना लिया गया। उन्हें यह सलाह देने वालों में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम शामिल थे, जिन्हें इस बात पर यकीन नहीं था कि राजनीति में नया-नया आया कोई व्यक्ति क्या हासिल कर पाएगा।
राजनीति में प्रवेश की योजना काफी पहले ही बना चुके थे विजय
जिन लोगों ने विजय के फिल्मी करियर को करीब से देखा है, उनका कहना है कि उन्होंने अपनी फिल्मों के ज़रिए राजनीति में अपनी एंट्री की योजना बहुत सोच-समझकर और होशियारी से बनाई थी। उन्होंने फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत एक आम रोमांटिक हीरो के तौर पर की थी, जो अपनी हीरोइनों का पीछा करता था और उनके लिए प्यार भरे गाने गाता था। लेकिन पिछले एक दशक से भी ज़्यादा समय में, उन्होंने पर्दे पर अपनी छवि को पूरी तरह से बदल दिया। वे फिल्मों में ज़्यादातर एक ‘व्यवस्था-विरोधी’ किरदार के रूप में नज़र आने लगे, भ्रष्टाचार से लड़ते हुए, गरीबों और वंचितों के लिए आवाज़ उठाते हुए, और उन गुंडों-बदमाशों का मुकाबला करते हुए जो हर तरफ आतंक फैलाते थे।
यह कुछ-कुछ वैसी ही ‘एंग्री यंग मैन’ वाली छवि थी, जिसे अमिताभ बच्चन ने 1970 और 1980 के दशक में गढ़ा था। इस नई छवि में विजय का फिल्मी करियर आसमान छूने लगा; उन्हें पहले से भी बड़ी सफलताएं मिलीं और वे युवाओं के बीच एक ‘कल्ट फिगर’ (आइकॉन) बन गए। शायद इसी ने राजनीति में उनकी एंट्री की नींव रखी एक ऐसे नए चेहरे के तौर पर, जो अपने साथ नए वादे लेकर आया था। अब यह तो वक्त ही बताएगा कि तमिलनाडु की राजनीति में वे एक और एमजीआर (अन्नाद्रमुक के संस्थापक एम.जी. रामचंद्रन) जो खुद भी फिल्मों के एक बड़े आइकॉन थे) बन पाते हैं, या फिर दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल की तरह अपनी चमक खो बैठते हैं।
शुभेंदु के नजदीकी अधिकारियों की मौतों पर उठे सवाल
Summary :
मीडिया की सुर्खियां इस समय पश्चिम बंगाल के ‘जायंट किलर’ (बड़े दिग्गजों को हराने वाले) शुभेंदु अधिकारी के एक करीबी सहयोगी पर हुए कायराना हमले की खबरों से भरी हैं। शुभेंदु अधिकारी ने कोलकाता के भवानीपुर स्थित ममता बनर्जी के गढ़ में उन्हें करारी शिकस्त दी थी। ममता बनर्जी इस सीट से 14 बार चुनाव जीत चुकी थीं, लेकिन पश्चिम बंगाल में चली भाजपा की लहर के आगे उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बहरहाल, ऐसा लगता है कि अधिकारी के सहयोगियों का इतिहास बदकिस्मती और अस्वाभाविक मौतों से भरा रहा है। उनके निजी सहायक रहे प्रदीप झा का शव…


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