पश्चिम बंगाल में इस सप्ताह तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के साथ जो कुछ हुआ, वह संभवतः आने वाले समय में राज्य की राजनीति की दिशा का केवल शुरुआती संकेत है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह हिमखंड का मात्र ऊपरी हिस्सा है। अभिषेक बनर्जी, जिन्हें बंगाल की राजनीति में ‘भाइपो’ के नाम से भी जाना जाता है, को विरोध और हमलों से खुद को बचाने के लिए क्रिकेट का हेलमेट पहनना पड़ा। बाद में उन्हें वहां से सुरक्षित निकाल लिया गया।
हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के बाद यह अभिषेक बनर्जी की पहली सार्वजनिक उपस्थिति थी। वह चुनावोत्तर हिंसा के एक कथित पीड़ित तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता के परिजनों से मिलने जा रहे थे। हालांकि, इस मामले को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं और मृतक की पृष्ठभूमि को लेकर भी प्रश्न उठाए गए हैं।
इस दौरान अभिषेक बनर्जी को न केवल तीखे विरोध का सामना करना पड़ा, बल्कि उनकी कमीज भी फाड़ दी गई। प्रदर्शनकारियों ने उन पर अंडे, जूते और ईंटें भी फेंकीं। कुछ समाचारों में उनके साथ धक्का-मुक्की और मारपीट किए जाने का भी दावा किया गया है। बताया जाता है कि अभिषेक मोटरसाइकिल के जरिए क्षेत्र तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे, जबकि चारों ओर ‘चोर-चोर’ के नारे गूंज रहे थे।
यह कहना कि यह केवल जनाक्रोश का मामला था, शायद वास्तविक स्थिति को कम करके आंकना होगा। खबरों के अनुसार, आक्रोशित भीड़ में भारतीय जनता पार्टी के समर्थक भी शामिल थे। वहीं तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी खुलकर सामने आई। ऐसे में यह तय कर पाना मुश्किल है कि हमला स्वतःस्फूर्त था, पूर्वनियोजित था या फिर गुस्से और हताशा का परिणाम था।
तृणमूल कांग्रेस ने इस हमले को राजनीतिक साजिश करार दिया है। अभिषेक बनर्जी ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की चेतावनी देते हुए कहा, “पिछले 15 वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ। मुझे इस सरकार से सुरक्षा की कोई उम्मीद नहीं है। रातोंरात बुलडोजर तैनात किए जा सकते हैं, लेकिन मुझे अपनी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं दिखती।”
हमले के बाद अभिषेक बनर्जी को तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई। चिकित्सकीय पर्चे में कहा गया, “रोगी की जांच की गई। सीने पर चोट के कुछ निशान छोड़कर किसी गंभीर शारीरिक चोट के संकेत नहीं मिले हैं। रोगी पूरी तरह सचेत है, सामान्य रूप से चल-फिर रहा है और उसकी स्थिति स्थिर है। इसलिए अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता नहीं है।” हालांकि चिकित्सकों ने उन्हें कुछ दवाएं लेने की सलाह दी। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने सामाजिक माध्यम पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “शासक ही हत्यारे बन गए हैं। भाजपा को शर्म आनी चाहिए।”
तृणमूल कांग्रेस ने भी राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला। पार्टी ने कहा, “बंगाल में भाजपा की राजनीति का असली चेहरा एक बार फिर उजागर हो गया है। हमारे राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला इस बात का प्रमाण है कि मौजूदा शासन में कानून-व्यवस्था कितनी तेजी से बिगड़ी है। यदि दिनदहाड़े एक विपक्षी सांसद को निशाना बनाया जा सकता है, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की क्या गारंटी है? क्या यही भाजपा की लोकतंत्र की परिभाषा है? क्या यही वह ‘सुशासन’ है, जिसकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार चर्चा करते हैं?” तृणमूल सांसद सुष्मिता देव ने भी हमले को सुनियोजित करार दिया। उन्होंने कहा, “यह पूरी तरह पूर्वनियोजित हमला है। यह जनता का आक्रोश नहीं, बल्कि उस जनसमर्थन का भय है जो आज भी तृणमूल कांग्रेस को प्राप्त है, भले ही वह फिलहाल खामोश दिखाई दे रहा हो। इस तरह की कोशिशें सफल नहीं होंगी। भाजपा समर्थित गुंडों की हरकतों के लिए बंगाल के आम लोगों को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।”
तृणमूल कांग्रेस को इस मुद्दे पर अन्य विपक्षी दलों का भी समर्थन मिला। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सामाजिक माध्यम पर लिखा, “बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख नेता अभिषेक बनर्जी पर जानलेवा हमला करवाकर भाजपा सरकार ने साबित कर दिया है कि उसकी राजनीति नफरत, नकारात्मकता और हिंसा तक ही सीमित है। इतने संवेदनशील माहौल में पर्याप्त पुलिस व्यवस्था का अभाव भी एक बड़ी साजिश की ओर संकेत करता है। यह बेहद निंदनीय है।”
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी हमले की कड़ी निंदा की। उन्होंने लिखा, “किसी सांसद पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं होता, बल्कि उन लोगों पर भी हमला होता है जिन्होंने उसे चुनकर संसद भेजा है। यह हमारे लोकतंत्र पर भी आघात है। यह भाजपा की प्रतिशोध की राजनीति का कुरूप चेहरा है। राजनीतिक मतभेद हिंसा का औचित्य नहीं बन सकते। केंद्र और पश्चिम बंगाल, दोनों सरकारों को दोषियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी दल के जनप्रतिनिधि को अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता न करनी पड़े।”
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने इस घटना में किसी भी प्रकार की संलिप्तता से इनकार किया है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने कहा, “इस घटना से हमारी पार्टी का कोई संबंध नहीं है। अभिषेक बनर्जी ने जिस पुलिस अनुपस्थिति का आरोप लगाया है, उसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। जब सुवेंदु अधिकारी विपक्ष के नेता थे, तब उत्तर बंगाल में उन पर भी हमले की कोशिशें हुई थीं। वर्षों तक भाजपा कार्यकर्ताओं ने अत्याचार झेले हैं, फिर भी उन्होंने संयम बनाए रखा। यदि परिस्थितियां उलट होतीं और तृणमूल कांग्रेस सत्ता में होती, तो संभवतः कई विपक्षी नेता घटनास्थल तक सुरक्षित पहुंच भी नहीं पाते। फिर भी किसी भी प्रकार की हिंसा स्वीकार्य नहीं है।”
घटना चाहे जिस कारण से हुई हो, उसने पश्चिम बंगाल की राजनीति में मौजूद गहरी दरारों को खुलकर सामने ला दिया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि भाजपा शासन के तहत तृणमूल कांग्रेस के लिए अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखना आसान नहीं होगा। भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता तृणमूल कांग्रेस को लगातार घेरने और उसकी राजनीतिक गतिविधियों को कठिन बनाने का प्रयास करेंगे।
उधर, तृणमूल कांग्रेस के भीतर भी असंतोष के संकेत दिखाई देने लगे हैं। पार्टी सांसद काकोली दस्तीदार ने नाराजगी जताते हुए अपने सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दे दिया है। इसके बाद पूर्व राज्यसभा सांसद शांतनु सेन ने भी तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया। सेन ने आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज दुष्कर्म एवं हत्या प्रकरण, भ्रष्टाचार, कथित कट मनी और अन्य घोटालों को लेकर पार्टी नेतृत्व की आलोचना की। गौरतलब है कि शांतनु सेन उन चुनिंदा नेताओं में शामिल थे जिन्होंने मेडिकल कॉलेज में कथित अनियमितताओं की ओर प्रारंभिक स्तर पर ही ध्यान दिलाया था। उन्होंने अपने “अंतर्मन की आवाज” का हवाला देते हुए पार्टी पद से इस्तीफा दिया। दूसरी ओर, काकोली दस्तीदार ने शारदा चिटफंड घोटाला, नारदा प्रकरण, शिक्षक भर्ती में कथित धन के बदले नौकरी देने के आरोप, आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल दुष्कर्म-हत्या कांड समेत कई मुद्दों को लेकर पार्टी नेतृत्व पर निशाना साधते हुए इस्तीफा दिया। असंतोष के संकेत उस समय से ही दिखने लगे थे, जब उन्होंने पार्टी के निर्देशों की अनदेखी करते हुए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी की जिला समीक्षा बैठक में भाग लिया था। बैठक के बाद सुवेंदु अधिकारी का यह दावा कि तृणमूल सांसद ने उनसे कहा था कि उन्हें “आखिरकार आज़ादी मिल गई है”, राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। इससे उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलों को भी बल मिला।
हालांकि वह भाजपा में शामिल होती हैं या नहीं, इससे अलग एक तथ्य स्पष्ट है कि तृणमूल कांग्रेस लगातार आंतरिक टूट और नेताओं के पलायन का सामना कर रही है। ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट बनाए रखने की है, जो फिलहाल आसान नहीं दिखती।
दल-बदल और संगठन को एकजुट रखने की चुनौती के अलावा ममता बनर्जी के सामने कई अन्य राजनीतिक चुनौतियां भी हैं। इनमें सबसे बड़ी चुनौती जनता, विशेषकर महिलाओं का विश्वास दोबारा हासिल करना है। निस्संदेह, उनकी और उनकी पार्टी की राजनीतिक प्रासंगिकता इस समय कठिन दौर से गुजर रही है, लेकिन राजनीति में अंतिम निर्णय कभी स्थायी नहीं होता। फिलहाल परिस्थितियां उनके प्रतिकूल अवश्य हैं, फिर भी संघर्ष और वापसी की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता। एक समय ममता बनर्जी का दिया गया नारा ‘खेला होबे’ बंगाल की राजनीति में गूंजता था। आज भले वह नारा दूर की कौड़ी प्रतीत हो, लेकिन राजनीति की अनिश्चितताओं को देखते हुए यह कहना जल्दबाजी होगी कि खेल पूरी तरह समाप्त हो चुका है। संभव है कि कठिन संघर्षों के बाद ममता बनर्जी एक बार फिर राजनीतिक राख से उठ खड़ी हों।
पश्चिम बंगाल में खेला होबे
Summary :
पश्चिम बंगाल में इस सप्ताह तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के साथ जो कुछ हुआ, वह संभवतः आने वाले समय में राज्य की राजनीति की दिशा का केवल शुरुआती संकेत है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह हिमखंड का मात्र ऊपरी हिस्सा है। अभिषेक बनर्जी, जिन्हें बंगाल की राजनीति में ‘भाइपो’ के नाम से भी जाना जाता है, को विरोध और हमलों से खुद को बचाने के लिए क्रिकेट का हेलमेट पहनना पड़ा। बाद में उन्हें वहां से सुरक्षित निकाल लिया गया। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के बाद…


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